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पुस्तकायनः भ्रष्टाचार पर ‘खुली किताब’

अभागे हैं वे जो रिश्वत को समाजविरोधी बताते हैं। अरे रिश्वत तो वह संपर्क सूत्र है जो खडूस से खडूस अफसर को विनम्रता की शैली सिखाता है’।

Author February 9, 2018 2:03 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अभागे हैं वे जो रिश्वत को समाजविरोधी बताते हैं। अरे रिश्वत तो वह संपर्क सूत्र है जो खडूस से खडूस अफसर को विनम्रता की शैली सिखाता है’। अनुज गर्ग जब वाणी प्रकाशन से आई ‘खुली किताब’ में एक सरकारी दफ्तर के बाहर लगे इस बोर्ड का वर्णन करते हैं तो हम समझ सकते हैं कि आज भारत जैसे देश का नभ, जल और थल भ्रष्टाचार की जद में क्यों और कैसे है। ‘वादों की दहलीज पर रिश्वत की वकालत’ करते भारत के संस्थान किस तरह का समाज बना चुके हैं इसका पूरा कोलाज है अनुज गर्ग की ‘खुली किताब’। स्कूल से लेकर कॉलेज, रोजगार के लिए निकले युवा का उद्यमी बनना और इस बनने की प्रक्रिया में संस्थागत भ्रष्टाचार। जीवन के जिन सहज अनुभवों को अनुज गर्ग ने लिखा है वह हर भारतीय के रोजनामचे का हिस्सा है। इसे पढ़ते हुए कोई कह सकता है कि यह तो होता ही है, इसमें लिखने वाली क्या बात है? प्रेमचंद के ‘नमक का दारोगा’ का पिता तो हर घर में है जो नौकरी लगने के बाद अपने बेटे को यही शिक्षा देता है कि ऐसा काम ढूंढ़ना जहां कुछ ऊपरी आय हो।

मासिक आय को पूर्णमासी का चांद समझने वाले भारतीय कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हैं। हमारे यहां ही वे लोग हैं जो वेतन को मनुष्य और ऊपरी आमदनी को ईश्वर की देन समझते हैं। दिल्ली-मथुरा एक्सप्रेसवे पर रफ्तार मारती इस भ्रष्टाचार की कहानी के किरदार तो हम सब हैं फिर यह किताब क्यों?कभी-कभी कोई किरदार रंगमंच पर ठिठक जाता है कि उसकी यह भूमिका क्यों, उसका यह संवाद क्यों? अनुज गर्ग भी ठहर कर पूछते हैं कि ये कैसा देश है जहां हर शपथ की पीठ पर एक कपट सवारी कर रहा है। लेखक को चिंता होती है समाज की उस 80 फीसद आबादी की जो रिश्वत नहीं दे सकती।

बीस फीसद आबादी ही रिश्वत दे रही है, रिश्वत ले रही है और हम सब चुप हैं कि ऐसा होता ही है। आज यहां कफनचोर कफन बेचते हैं। लेखक कहते हैं ‘हर वो जगह जहां हवा है, वहां भ्रष्टाचार है’। उत्तर प्रदेश के शहर मथुरा में लेखक के जन्म के साथ शुरू होती है कहानी। सरस्वती शिशु विद्या मंदिर से लेकर शैक्षणिक संस्था के प्रमुख बनने तक का सफर। छोटे पंखों की बड़ी उड़ान और छोटे कस्बे से महानगर की छलांग में रिश्तव ही रिश्वत। अनुज गर्ग कहते हैं कि देशविरोधी और जनविरोधी सभी कामों का रास्ता राजनीति से होकर गुजरता है। भ्रष्टाचार के राजनीतिक संरक्षण के बारे में सब जानते हैं। हम सबके पैर में भ्रष्टाचार की बिवाई पड़ी है और हम इसको लेकर पीर पराई जानते हैं।

लेखक मानते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार का जन्म ब्रितानी हुकूमत के साथ हुआ था। यह उनका देश नहीं था, उनकी जन्मभूमि नहीं थी जिसे वे लूट कर खोखला कर रहे थे, अंग्रेजों को इसकी कोई फिक्र नहीं थी। लेखक सवाल करते हैं, ‘लेकिन यह हमारा देश था, यह हमारी मातृभूमि थी, ये हमारे लोग थे और यह हमारा संसाधन था, फिर क्यों हम भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे थे?’ यह सवाल तो आज आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी जब उठता है तो एक संवेदनशील नागरिक अपने हिस्से की ‘खुली किताब’ लिख बैठता है।

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