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पुस्तक समीक्षाः सामंती सत्ता के रेशे उधेड़ता ‘हसीनाबाद’

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ‘हसीनाबाद’ महज उपन्यास नहीं शब्दचित्रों की एक पेंटिंग है। इस पूरे उपन्यास में गीताश्री की एक राजनीतिक समझ दिखती है।

गोलमी के चरित्र को एक नई ऊंचाई दी 

गीताश्री ने यहां गोलमी के चरित्र को एक नई ऊंचाई दी है। मीडिया और विपक्ष ने तमाम हथकंडे अपनाए, गोलमी की सगी रज्जो को तोड़ कर जासूस बना दिया गया पर गोलमी नहीं बदली। वह पद, पैसा, शोहरत पाने के बाद भी बेचैन रही कि जिस कला के जरिए वह यहां तक पहुंची है उसी कला के लिए वह कुछ नहीं कर पा रही है। नचनियां के धरातल से उठ कर सांसद की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद वह और ज्यादा अकेली हो उठी है।और तब गीताश्री गोलमी के इस चरित्र को एक और ऊंचाई तक ले जाती हैं जब गोलमी राजनीति की इस उठा-पटक और नोच-खसोट वाली दुनिया से निकल कर लोक से जुड़ने का फैसला कर लेती है। वह तमाम रोक और दबाव के बाद भी तय करती है अपने पद से इस्तीफा देकर इस मोह से निकलने का और अपने सपनों के संग उड़ने का, जहां उसके साथ उसके बाबा हैं, मां हैं और है लोक रंग।

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ‘हसीनाबाद’ महज उपन्यास नहीं शब्दचित्रों की एक पेंटिंग है। इस पूरे उपन्यास में गीताश्री की एक राजनीतिक समझ दिखती है। गोलमी और सुंदरी के संघर्ष के जरिए स्त्री शरीर सामंती सत्ता का उपनिवेश बनने से इनकार कर रहा है। रज्जो और उसके भाई खेंचरू का घाघपन गोलमी की उड़ान को और हवा देते दिखते हैं। गोलमी के मुंहबोले पिता सगुन महतो और गोलमी के बाल सखा अढ़ाई सौ की छाया इस पेंटिंग में मनुष्यता के रंग हैं। इस पेंटिंग को राजनीति के बारीक रेशे और लोक संघर्ष का तानाबाना भाव की वह ऊंचाई देते हैं, जो आपके जेहन में लंबे समय तक कौंधती रहती है।

अगर कोई उपन्यास जीवंत (लाइव) पेंटिंग की तरह लगे, तो यह लेखकीय कौशल का कमाल होता है। गीताश्री चाहतीं तो इसे फिल्म की तरह भी पेश कर सकती थीं, पर इस उपन्यास से गुजरते हुए दिखता है कि गीताश्री ने पाठकों को बार-बार दिखाया कि यह देखो एक रेखा मैंने यूं खींची, इससे यह चरित्र बना और अब उसमें रंग भर रही हूं, उसके पोर-पोर में इस तरह धूप-छांह, उतार-चढ़ाव की ‘शेड’ दे रही हूं। हसीनाबाद के हर प्रमुख पात्र की यही पारदर्शिता हमें इस उपन्यास से जोड़े रखती है। हम अपने इर्द-गिर्द उसके पात्रों को महसूस करने लगते हैं, उस पूरे इलाके में लेखिका के साथ घूमने लगते हैं।

हसीनाबाद के कैनवस पर दो नायिकाएं हैं, सुंदरी और गोलमी। शुरुआती दौर में सुंदरी और बाद में उसकी बेटी गोलमी। एक उपन्यास में दो नायिकाएं। शायद इसलिए कि स्त्री किसान की तरह खुद ही नहीं, बल्कि दूसरों की आंखों में भी सपने बोती है। जाहिर सी बात है कि पहले पहर की नायिका सुंदरी अपनी सोन चिरइया यानी बेटी गोलमी को ठाकुरों की निगाह से बचा ले जाने के लिए सुख-सुविधा को छोड़ संघर्ष का जीवन चुनती है। वैसा ही संघर्ष बाद के हिस्से में हमें गोलमी में दिखता है। सुंदरी धुआंती हुई चरित्र है। पर इस धुएं के बीच भी उसके इरादे बुलंद हैं। यह अलग बात है कि हालात और बेबसी के कारण पैदा आक्रोश, गुस्से का गुबार वह अक्सर अपने बच्चों पर उतार दिया करती है। गीताश्री सुंदरी की मनोस्थिति बयां करती हैं, ‘अक्सर घुटती हुई स्त्रियां अपना गुस्सा बच्चों पर ही निकाला करती हैं।

ऐसा न करें तो वह कभी भी फट सकती हैं बारूद की तरह, अपने ही चिथड़े उड़ जाएं। बच्चे उन्हें ऐसे अवसर अक्सर देते रहते हैं। उनकी घुटन निकलती रहती है’। जबकि इसी सुंदरी की बेटी गोलमी धुआंने के बजाए सुलगती हुई नजर आती है। बकौल लेखिका, गोलमी सपने नहीं देखती, वह तो सपने बुनती है। गोलमी का जन्म 1963 का है। इसी आधार पर यह बात 1975 के आसपास की दिखती है जब गोलमी अपने स्कूल के लड़के रजुआ को कबड्डी खेलने के लिए चुनौती देती है। थोड़ी बकझक के बाद रजुआ ‘नचनिया’ गोलमी की चुनौती स्वीकार लेता है। अपनी बारी आने पर रजुआ हुंकार भरता है, ‘चल कबड्डी एत्ता…भगत हउन बेट्टा…भगताइन है रंडी…उठा ले बेटा झंडी…’ इसके बाद गोलमी इस रजुआ को लपक कर पकड़ लेती है और दोहे को सुनकर पैदा हुआ सारा क्षोभ उसे पीट कर निकालती है।
गोलमी की आग अब सोन चिरइयां आर्केस्ट्रा के रूप में पहचान बना चुकी थी।

रज्जो से लेकर अढ़ाई सौ अपनी-अपनी भूमिका में लगे हुए थे। इसी बीच रज्जो की मेहनत से इस आर्केस्ट्रा को शिक्षा के प्रसार-प्रचार के लिए सरकार की ओर से अवसर मिल जाता है। गोलमी की दिलकश आवाज और प्रभावकारी नाच का असर यह रहा कि उस इलाके के स्कूलों में बच्चों का आना बढ़ गया। सोन चिरइयां आर्केस्ट्रा की पूरी टीम की लगन और उससे मिलने वाले नतीजे पर सबकी नजर टिकी हुई थी। इसी बीच एक नाटकीय घटनाक्रम में इस टीम की मुलाकात होती है इलाके के नेता रामबालक सिंह से, जो पिछले चुनाव में रामखिलावन सिंह से हार चुके थे। रामबालक जी रामखिलावन के सोशल इंजीनियरिंग की काट खोज रहे थे। उन्हें गोलमी के रूप में एक संभावना मिल चुकी थी। सोन चिरइयां आॅर्केस्ट्रा टीम को उन्होंने अपना अतिथि बनाया और फिर अपनी संपन्नता, पहुंच और ताकत से भरमाया। गोलमी ने जिस काम को लोकसेवा समझ कर करना स्वीकार किया उसे ही रज्जो ने अपनी महत्त्वाकांक्षा पूर्ति रास्ते के तौर पर देखा और रामबालक तो इसके सूत्रधार थे ही।

11वीं लोकसभा चुनाव के दिन करीब आ चले थे और राजनीति उफान पर थी। इस दृश्य में गीताश्री ने रंग नहीं चढ़ाए बल्कि इन राजनीतिक चरित्रों और घटनाक्रमों पर से रंगों के आवरण उतार कर अंदर के रंग दिखाए। हसीनाबाद ने दिखाया कि अब समाज की आंखों में किसी की छवि झोंकना कितना आसान है। और फिर वह छवि भावनात्मक और कलात्मक रूप से समाज को इस कदर प्रभावित करेगी कि समाज टुकड़ों में बंट जाएगा और उसे पता भी नहीं चलेगा। 11वीं लोकसभा चुनाव की वैतरणी रामबालक ने गोलमी के सहारे पार कर ली। हर तरफ गोलमी की चर्चा थी। यह जीत रामबालक से ज्यादा गोलमी की थी। यह अलग बात है कि यह सरकार लंबी पारी नहीं खेल सकी और कुछ ही दिनों में 12वीं लोकसभा के चुनाव सामने आ गए।
12वीं लोकसभा के चुनाव में आलाकमान ने प्रत्याशी बदला, क्योंकि सवर्णों के खिलाफ पिछड़े गोलबंद होने लगे थे। कुछ दिन पहले ही राजनीति में कदम रखने वाली गोलमी के नाम पर इस बार जातिगत समीकरण बैठाए गए। प्रत्याशी के तौर पर उसे खड़ा कर उसकी जाति दांव पर लगाई गई। रज्जो ने पाला बदला। विरोधी खेमे से जा मिली। बचपन से जवानी तक की मिठास भूल गोलमी के खिलाफ उसने जहर उगला। पर इस चुनाव में भी गोलमी की लहर काम आई और गोलमी सांसद के रूप में चुनी गई। सांसद बनते ही विरोधी खेमे में जा मिली सखी भी वापस आई।

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