2013 का मुजफ्फरनगर दंगा केस: आठ साल में बरी हुए 1100 लोग, अब तक केवल सात को मिली सजा, यह था पूरा मामला

दंगों में 60 से अधिक लोग मारे गए थे और 40 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए थे। 264 आरोपी अभी अदालती कार्यवाही का सामना कर रहे हैं।

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अगस्त और सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के क्षेत्रों में सांप्रदायिक झड़पों में 60 लोगों की मौत हो गयी थी जबकि 40,000 से ज्यादा लोग विस्थापित हुए थे। (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में 2013 के सांप्रदायिक दंगों को आठ साल हो चुके हैं और इस दौरान हत्या, बलात्कार, डकैती एवं आगजनी से संबंधित 97 मामलों में 1,117 लोग सबूतों के अभाव में बरी हो गए। इन आठ वर्षों में सिर्फ सात लोग दोषी पाए गए। इन लोगों को कवाल गांव में सचिन और गौरव नामक दो युवकों की हत्या से जुड़े मामलों में दोषी करार दिया गया।

इन दो युवकों की हत्या और 27 अगस्त, 2013 को शाहनवाज नामक एक अन्य युवक की चाकू मारकर हत्या के बाद दंगे भड़क गए थे।
दंगों से जुड़े मामलों की जांच के लिए राज्य सरकार द्वारा विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया था। एसआईटी के अधिकारियों के मुताबिक, पुलिस ने 1,480 लोगों के खिलाफ 510 मामले दर्ज किए और 175 मामलों में आरोप पत्र दायर किया।

एसआईटी के एक अधिकारी ने बताया कि 97 मामलों में अदालत ने फैसला किया और 1,117 लोगों को सबूतों के अभाव में बरी किया।उन्होंने कहा कि अभियोजन ने अभी इन मामलों में अपील दायर नहीं की है। कवाल गांव में दो युवकों की हत्या के मामले में सात लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है।

एसआईटी 20 मामलों में आरोप पत्र दायर कर नहीं सकी, क्योंकि राज्य सरकार की ओर से उसे मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं मिली।इस बीच, उत्तर प्रदेश सरकार ने दंगों से जुड़े 77 मामलों को वापस लेने का फैसला किया है, लेकिन अदालत ने उत्तर प्रदेश के मंत्री सुरेश राणा, भाजपा विधायक संगीत सोम समेत 12 भाजपा विधायकों के खिलाफ सिर्फ एक मामला वापस लेने की अनुमति दी है।

एसआईटी के अधिकारियों के अनुसार, 264 आरोपी अभी अदालती कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। दंगों में 60 से अधिक लोग मारे गए थे और 40 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए थे।

मुजफ्फरनगर के मलिकपुरा के ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की 27 अगस्त 2013 को जानसठ कोतवाली क्षेत्र के गांव कवाल में हत्या के बाद ही वहां दंगे भड़क उठे थे। यह गांव जाट और मुस्लिम बहुल है। दंगे के दौरान यहां कर्फ्यू लगा दिया। बाद में सेना बुला ली गई। करीब 20 दिनों तक कर्फ्यू रहा। 17 सितम्बर को दंगा प्रभावित स्थानों से कर्फ्यू हटा लिया गया और सेना वापस बुला ली गयी।

हिंसा के पीछे की बात यह है कि जाट और मुस्लिम समुदाय के बीच झड़प के बाद कवाल गांव में कथित तौर पर एक जाट समुदाय की लड़की के साथ एक मुस्लिम युवक ने छेड़खानी कर दी थी। उसके बाद लड़की के दो ममेरे भाइयों गौरव और सचिन ने उस मुस्लिम युवक को पीट-पीट कर मार डाला। जवाबी हिंसा में मुस्लिमों ने दोनों युवकों की जान ले ली।

इसके बाद मामले में राजनीति शुरू हो गई थी। दोनों पक्षों ने अपनी अपनी महापंचायत बुलाई। इसके बाद ही बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई। नंगला मंदौड़ में हुई महापंचायत में भाजपा के स्थानीय नेताओं पर आरोप लगा कि उन्होंने जाट समुदाय को बदला लेने के लिए उकसाया था। जबकि भाजपाई इससे इंकार करते हैं।

07 सितंबर को महापंचायत से लौट रहे किसानों पर जौली नहर के पास दंगाइयों ने घात लगाकर हमला कर दिया था। दंगाइयों ने किसानों के 18 ट्रैक्टर और तीन मोटरसाइकिलें भी फूंक दी थीं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक उन लोगों ने शवों को नहर में फेंक दिया। छह शवों को खोजकर निकाला गया। दंगे में एक फोटोग्राफर और पत्रकार की भी मौत हो गई थी।

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