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केजरीवाल सरकार का एक साल: काम कम किए, विवाद ज्यादा

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आम आदमी पार्टी की सरकार ने साल भर में काम कम किए विवाद ज्यादा।

Author नई दिल्ली | Updated: February 11, 2016 12:21 PM
अरविंद केजरीवाल ने चुनाव में जो वादे किए थे, उनमें से एक साल में जितने पूरे हो सकते थे, वह उतना भी नहीं कर सके।

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आम आदमी पार्टी की सरकार ने साल भर में काम कम किए विवाद ज्यादा। चार सौ यूनिट तक हर महीने बिजली की खपत करने वालों को आधी कीमत पर और हर महीने बीस हजार लीटर पानी की खपत करने वालों को फ्री में पानी देने की घोषणा, सम-विषम अभियान से सरकार को लोकप्रियता मिली। सरकार इसे ही सबसे बड़ी उपलब्धि मान कर प्रचारित कर रही है। इसके साथ ही सम-विषम योजना को फिर से लाने का एलान भी किया है।

बिजली-पानी सस्ता करने के लिए सरकार को करीब 1690 करोड़ की सबसिडी देनी पड़ी है। एक तरफ पानी फ्री करने और दूसरी तरफ पानी मुहैया करवाने के लिए निजी कंपनी को पानी के एटीएम लगाने के लिए जमीन लगभग मुफ्त देने पर सवाल उठाए गए हैं। सरकार की अन्य लोकप्रिय घोषणाएं अभी तक सिरे नहीं चढ़ पाई हैं। पांच सौ स्कूल, 20 नए कॉलेज और एक लाख टॉयलेट समेत 25 लाख सीसीटीवी कैमरे और दिल्ली भर में मुफ्त वाई फाई आदि तमाम वादे पूरे होने के इंतजार में हैं। साल भर में चार बार निगमों के सफाई कर्मचारियों की हड़ताल ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ाई हैं।

दूसरी बार 14 फरवरी को रामलीला मैदान में केजरीवाल की अगुआई में सरकार ने शपथ ली तो साल भर में ही काफी चीजें बदल गर्इं। इस बार मुख्यमंत्री न तो मेट्रो रेल से शपथ लेने आए, न ही निजी कार से चले और न ही सरकारी कोठी न लेने की जिद की। सरकारी गाड़ी और पूरी सुरक्षा लेने के बाद भी जब 26 जनवरी के समारोह में उन्हें एक लड़की ने स्याही लगा दी तो आप के नेताओं ने उन्हें ज्यादा सुरक्षा देने की मांग की। लेकिन मीडिया से दूरी इस बार भी बनाए रखी। उन्हीं पत्रकारों से आप की सरकार का संपर्क है जिन्हें वे अपने पक्ष का मानते हैं। विपक्ष का आरोप है कि मीडिया को पक्ष में करने के लिए सरकार ने कुछ करोड़ के बजट को 526 करोड़ कर दिया। वैसे उसमें से चार सौ करोड़ रुपए खर्च नहीं हो पाए हैं।

सरकार बनने के साथ ही आप के नेताओं में भारी विवाद शुरू हो गया और महीने भर में पार्टी के संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, प्रोफेसर आनंद कुमार, अजीत झा समेत कई नेताओं को पार्टी से बाहर निकाला गया। पार्टी के लोकपाल एडमिरल (अवकाशप्राप्त) रामदास और संस्थापक पूर्व केंद्रीय मंत्री शांति भूषण जैसे दिग्गजों की भी विदाई की गई। लोकसभा चुनाव में पंजाब से जीते चार सांसदों में से दो पार्टी से बाहर हो चुके हैं। दिल्ली के एक विधायक पंकज पुष्कर भी बागी बने हुए हैं।

दूसरे कार्यकाल में भी आप सरकार की उपराज्यपाल से जंग जारी रही। पहले गैर आरक्षित विषयों की फाइल राजनिवास न भेजने का फरमान जारी किया। उपराज्यपाल ने उसे न मानने का आदेश दिया। दिल्ली सरकार के इतिहास में पहली बार मुख्य सचिव और गृह सचिव को दिल्ली सरकार ने कारण बताओ नोटिस दिया। असली विवाद मई में मुख्य सचिव केके शर्मा के दस दिन के लिए छुट्टी पर जाने के दौरान हुआ। दिल्ली सरकार ने पांच आला अफसरों की सूची उपराज्यपाल को भेजी। प्रमुख सचिव ऊर्जा शकुंतला गैमलिन की नियुक्ति पर हंगामा हुआ। विवाद बढ़ने पर सरकार ने आइएसए के बजाए दानिक्स को महत्त्व देना शुरू किया। उनके वेतन बढ़ाने की घोषणा की जिसे केंद्र ने नहीं माना। उन्होंने भ्रष्टाचार निरोधर शाखा (एसीबी) को अपना हथियार बनान चाहा जिसे उपराज्यपाल ने होने नहीं दिया। दिसंबर में उपराज्यपाल की ओर से आदेश जारी हुआ कि अधिकारी किसी भी गैरकानूनी आदेश को न मानें।

ऐसा न करने पर सरकार ने दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों की फरियाद न सुनी तो पहली बार दानिक्स ही नहीं दिल्ली सरकार में तैनात आइएएस अफसरों ने एक दिन सामूहिक छुट्टी लेकर अपना विरोध जताया। उससे नाराज होकर दिल्ली सरकार ने दास कैडर को तरक्की देनी शुरू की। पहली बार एक इंजीनियर को लोकनिर्माण विभाग का प्रमुख बनाया। इतना ही नहीं उन्होंने बाहर से लोगों की नियुक्ति करने की भी धमकी दे रखी है और कई विभागों में इसे अमल में भी ला रहे हैं। आप के कई कार्यकर्ताओं के ऊंचे वेतन पर सलाहकार में नियुक्ति भी की गई है। दिल्ली सरकार के सबसे चहेते अधिकारी राजेंद्र कुमार पर सीबीआइ के छापे पड़े। सरकार के सीएनजी फिटनेस घोटाले और डीडीसीए घोटाले की जांच के लिए बनाए गए आयोगों को केंद्र की मंजूरी नहीं मिली। इसके बावजूद सरकार ने आयोगों को जारी रखा है।

सरकार ने 24 मार्च को लेखानुदान और जुलाई में 41,149 करोड़ का पूरा बजट पेश किया। उसमें सर्वाधिक 9,836 करोड़ शिक्षा पर प्रावधान किया गया। स्कूलों में सुधार के दावे तो किए गए लेकिन वे अमल में नहीं दिखे। नए स्कूल, कॉलेज नहीं शुरू हुए। निजी स्कूलों पर नकेल डालने की कोशिश में कई ऐसे फैसले हुए जिसे अदालत ने नहीं माना। बिजली के दाम नहीं बढ़ने और निजी बिजली कंपनियों पर नकेल कसने के लिए बिजेन्द्र सिंह कमेटी की रिपोर्ट से लोगों का विश्वास सरकार में बढ़ा। लेकिन जनलोकपाल विधेयक समेत अन्य विधेयक कानून नहीं बन पाए हैं। सरकार ने विधायकों के वेतन-भत्ते चार गुणा बढ़ाकर करीब ढाई लाख रुपए कर दिया। इसके साथ ही अन्य मुद्दों पर घिरने के बाद फिर से सम-विषम की तारीखों के एलान का फैसला किया।

साल भर में नए निर्माण करने के बजाए कांग्रेस शासन में बने बीआरटी कॉरिडोर तोड़ने और पुराने दो फ्लाई ओवर को कम लागत में बनाने का जश्न सरकार ने मनाया। सरकार और आप के नेता अब भी यही दावा कर रहे हैं कि दिल्ली में एक ईमानदार और पारदर्शी सरकार ने साल पूरे करके मजबूत बुनियाद रखी है। लेकिन बड़ी ही तैयारी से लड़े गए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव में आप की छात्र शाखा छात्र युवा संघर्ष समिति के तीसरे नंबर पर आने से आप को झटका लगा। अप्रैल तक नगर निगमों के तेरह सीटों के उप चुनाव में आप का एक और इम्तहान होना है।

 

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