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10 साल भटकने के बाद भी नहीं मिला आश्रय, बुजुर्ग दंपति ने बस स्टॉप को बनाया ठिकाना

घर से निकलने के बाद एक बुजुर्ग दंपति 10 साल तक इधर-उधर भटकते रहे लेकिन कहीं सर छिपाने की जगह नहीं मिली। आखिरकार बस स्टॉप को उन्होंने अपना आश्रय स्थल बना लिया।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

जवान थे तो नौकरी की। बच्चे को पाला-पोसा, उन्हें पढ़ाया लिखाया। लेकिन जब वे बच्चे अपने पैर पर खड़े हो गए और उनकी शादी हो गई तो घर में किचकिच शुरू हो गई। आखिरकार बुढ़ापे में भी मां-बाप बेटे की खातिर घर छोड़कर निकल गए। 10 साल तक इधर-उधर आश्रय की तलाश में भटकते रहे। कभी वन विभाग के परिसर में शरण ली तो कभी सड़क किनारे ही रात गुजार ली। कुछ लोगाें ने दोनों को वृद्धाश्रम भी पहुंचाया लेकिन मात्र तीन दिनों में ही वहां से निकाल दिया गया। आखिरकार उम्र के आखिरी पड़ाव में अपनी पत्नी और खुद को बारिश, धूप व ठंड से बचाने के लिए उन्होंने बस स्टॉप को ही अपना आशियाना बना लिया। इनकी सहायता के लिए न तो कोई वृद्धाश्रम वाले आगे आ रहे हैं और न हीं सबका साथ सबका विकास का दावा करने करने वाली सरकार कोई मदद कर रही है। यह कहानी है भाजपा शासित प्रदेश छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के जेल रोड स्थित सिटी बस स्टॉप के नीचे फटे-पुराने बोरी और प्लास्टिक के सहारे पत्नी के साथ जिंदगी काट रहे बृजभूषण की।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बृजभूषण की शुरू से ऐसी हालत नहीं थी। रायपुर के कांपा में उनका खुद का मकान था। वे एक फैक्ट्री में सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी करते थे। लेकिन मकान छोटा होने की वजह से आये दिन बहू के साथ घर में तनाव होता था। इस वजह से दोनों पति-पत्नी ने घर छोड़ दिया। लेकिन सबसे बड़ी समस्या सामने आयी रहने और खाने की। जब तक शरीर साथ दिया, बृजभूषण ने मजदूरी की।  लेकिन वे इतना ही कमा पाते थे कि पेट भर सकें। घर किराया पर लेने जितना पैसा नहीं कमा पाते थे। कई जगहों पर आश्रय लेने की कोशिश की, लेकिन नई-नई मुसीबतों से सामना होता रहा। कभी असामाजिक तत्वों ने परेशान किया तो कभी स्थानीय लोगों ने। वे सड़क किनारे ही गुजारा करते रहे। इस दौरान एक सज्जन व्यक्ति की नजर इन दोनों पर पड़ी और इन्हें वृद्धाश्रम पहुंचा दिया। पर अफसोस! यहां से भी तीन दिनों बाद दोनों को निकाल दिया गया।

आखिरकार जिंदगी के इस अंतिम पड़ाव में बृजभूषण ने रायपुर के जेल रोड के समीप बस स्टॉप को ही अपना ठिकाना बना लिया। फटी-पुरानी बोरी और तिरपाल के सहारे जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं। अभी भी वे थोड़ी बहुत मेहनत मजदूरी कर एक समय के भोजन का इंतजाम कर लेते हैं। वहीं, आते-जाते लोग भी उन्हें कभी भोजन तो कभी फटे-पुराने कपडे़ दे जाते हैं।

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