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नए विषयों पर नृत्य पेश करती हैं कविता

डिशी नृत्यांगना कविता द्विवेदी ने नृत्य रचना पिंगला की परिकल्पना की है।

डिशी नृत्यांगना कविता द्विवेदी

डिशी नृत्यांगना कविता द्विवेदी ने नृत्य रचना पिंगला की परिकल्पना की है। यह श्रीजगन्नाथ दास की उड़िया भागवत की एक कथा विशेष पर आधारित थी। इसके संदर्भ में कविता द्विवेदी बताती हैं कि इसमें एक वेश्या को सामान्य नायिका के रूप में चित्रित किया गया था। वह ऐश्वर्य और धनलिप्सा में तल्लीन रहती है। एक दिन उसकी एक रईस व्यक्ति से भेंट होती है। वह उसे अपने घर आमंत्रित करती है। जब वह नहीं आता है तब उसे आत्मग्लानि होती है। उसे अहसास होता है कि वह गलत है। वह भौतिक जगत को त्याग कर भगवत शरण लेती है।
इस नृत्य रचना की शुरुआत वायलिन की सुरीली धुन पर होती है। यहां नृत्यांगना कविता पिंगला के भाव को दर्शाती है। नायिका पिंगला के आत्मबोध का चित्रण महज बांसुरी की धुन पर पेश करना चुनौतीपूर्ण तरीके से कविता ने रखा। वास्तव में, नृत्य में नृत और अभिनय का तालमेल बहुत ही सुरुचिपूर्ण था। कविता का पात्रानुकूल अभिनय सहज और भाव प्रवण था। कविता के नृत्य को देखकर अनुभूति होती है कि वे उसमें पूरी तरह निमग्न हो जाती हैं। उनके अंगों की थिरकन और लयात्मक गतियां देखने वाले को खुद आकर्षित करती हैं। इससे दर्शक उनके साथ नृत्य के भावों के साथ खुद को बहता हुआ पाता है। यह उनके नृत्य की खासियत है, जो युवा नृत्यांगनाओं में विरले ही नजर आती है।

कविता ने नृत्य रचना श्वेत मुक्ति में गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़ी पांच महिलाओं-गौतमी, यशोधरा, मागंधी, आम्रपाली और प्राकृति को कविता ने चित्रित किया। इसे उन्होंने दिल्ली समेत कई शहरों में पेश किया। कविता द्विवेदी बताती हैं कि मैंने मां गौतमी के भावों को दर्शाने के लिए रचना तू मोरा ममतारो फूलो का प्रयोग किया। इसमें वात्सल्य रस को दर्शाया। दूसरे अंश में गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा को नृत्यांगना ने बतौर नायिका निरूपित किया। मैथिलीशरण गुप्त की रचना सखी, वो मुझसे कह कर जाते, उड़ि जिबो प्रियतम श्वेत कपोत और काव्यांश दूरे बहुत दूरे ज्योतिरो आकाशे के जरिए यशोधरा की मनोदशा को अभिनय के माध्यम से दर्शाना मेरे लिए भावपूर्ण था। यशोधरा को अभिसारिका और विरहिणी नायिका के रूप में वर्णित किया।

वहीं मैंने गर्विता नायिका के रूप में मागंधी के चरित्र को दिखाया। मैंने रचनाओं तुम मेरे हो सिर्फ मेरे और अहंकार अंधार तमे मोर पर मागंधी के रूप का विवेचन किया। बुद्ध की शिष्या व नगरवधू आम्रपाली को नृत्य में प्रभावी अंदाज से चित्रित करने के लिए मैंने रचनाओं शून्यता क्यों धरे, अचिन्हा आकर्षण, छम-छम घुंघुरूर गीत, केहू न हो मोरा का सहारा लिया। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की चंडालिका के अंश से प्रकृति को निरूपित किया। अस्पृश्य प्रकृति को बौद्ध संघ ने दीक्षित किया और उसे सम्मानित जीवन प्रदान किया।
भुवनेश्वर में दिसंबर के अंतिम सप्ताह में ओडिशी नृत्य समारोह होता है। इस उत्सव में देश-विदेश के ओडिशी नृत्य के कलाकार नृत्य पेश करते हैं। पिछले दिसंबर में नृत्यांगना कविता द्विवेदी ‘तुलसी’ की जीवन कथा को निरूपित किया। इस प्रस्तुति में नायिका तुलसी के पति़ जरासंध, भगवान विष्णु और शिव के चरित्रों के माध्यम से पेश किया। इसे भी दर्शकों ने काफी सराहा। इस अनुभव के बारे में नृत्यांगना कविता बताती हैं कि उस शाम जैसे ही मैं परफॉर्मेंस खत्म करके ग्रीन रूम में आई, वैसे ही प्रसिद्ध नृत्यांगना कुमकुम मोहंती ने शाबाशी दी। यह मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं है।

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