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नृयोत्सवः शिव की गोद में शक्ति

जहां हर पल सम हैं। उस सम रात्रि में शिव की गोद में बैठकर, शक्ति शिव को जानने को उत्सुक हैं। इस परिकल्पना को नृत्यांगना गौरी दिवाकर ने कथक नृत्य में पिरोया। उनका नृत्य और नृत्य रचना दोनों ही रसात्मक और मार्मिक अंदाज लिए हुए थे।

कथक नृत्यांगना गौरी दिवाकर

कथक नृत्यांगना गौरी दिवाकर ने हाल ही में इंडिया हैबिटेट सेंटर में नृत्य रचना ‘समरात्रि नाइट ऑफ डिवाइन यूनियन’ पेश किया। इस प्रस्तुति में नृत्यांगना ने शिव और पार्वती को भैरव और भैरवी के रूप को दर्शाया। शिव रात्रि को समरात्रि बनाया यानी ऐसी रात जिसमें रात और दिन समान हैं। जहां हर पल सम हैं। उस सम रात्रि में शिव की गोद में बैठकर, शक्ति शिव को जानने को उत्सुक हैं। इस परिकल्पना को नृत्यांगना गौरी दिवाकर ने कथक नृत्य में पिरोया। उनका नृत्य और नृत्य रचना दोनों ही रसात्मक और मार्मिक अंदाज लिए हुए थे।
नृत्य रचना समरात्रि चार अंशों में विभाजित थी। नृत्य के आरंभ में विलंबित लय में नृत्यांगना गौरी ने नृत्य पेश किया। सरगम के बोलों ‘ग-पा-ध-नि-सा’ पर आधारित नृत्य में शिव के मिलन की आशा में पार्वती खुद को सजाती-संवारती हैं।

इस नृत्य में उन्होंने हस्तकों से सर्प, पक्षी, केश, डमरू को दर्शाया। वहीं पैर के काम और अंग संचालन से नृत्य को प्रभावकारी तरीके से पेश किया। यहीं, नृत्यांगना ने शिव के डमरू, त्रिशूल, नीलकंठ, चंद्रशेखर, भस्मांग, मुंडमाल धारण रूप का विवेचन भी किया। रचना ‘सनिरूद्ध नयने हर्षिता शुक’ व ‘किं रूपम तत्वको’ पर आधारित नृत्य रोचक था। इस अंश में शिव के बाघांबर, पार्वती की चाल व घूंघट की गत को बहुत ही प्रभावकारी अंदाज में दर्शाया गया। वहीं, पार्वती के नजर फेंकने का ढंग काफी सुघढ़ था। नृत्य में कथक की उठान, उत्प्लावन, पलटे, तिहाइयों, परणों का बेहद ही सुंदर प्रयोग था।

दूसरे अंश में, देवी भगवान शिव से पूछती हैं कि आपका यथार्थ क्या है। शिव और पार्वती आलिंगनबद्ध हैं। शिव बताते हैं कि मोर पंख के पांच रंग पंचतत्व हैं। यही तो हम हैं। इसी अंश में, गौरी दिवाकर ने संवाद और रचनाओं के जरिए इस प्रसंग को पेश किया। संवाद-‘मोर पंख के इन पांच रंगों में पंच तत्व समाहित है’ व ‘कंपित नयन कंपित अधर’ और रचना ‘शिव प्रिये तुम ठहरो’ पर नृत्यांगना गौरी ने भाव प्रदर्शित किए। उन्होंने नृत्य में आलिंगन, मयूर, घंूघट का प्रयोग किया। साथ ही, शिव के जटा और उससे प्रवाहित गंगा का चित्रण मोहक तरीके से किया।

यह परमानंद है। अपने अस्तित्व के यथार्थ की अनुभूति का एहसास ही महाशिव रात्रि अथवा समरात्रि है। शिव और पार्वती दोनों समरूप और समान हैं, जो भैरव और भैरवी रूप हैं। ध्रुपद ‘देव देव महादेव’ और ‘जय शिव शंकर जय अभयंकर’ पर नृत्यांगना गौरी ने प्रभावकारी नृत्य पेश किया। नृत्य में सवाल-जवाब, पैर का काम लासानी था।
अंत में, नृत्यांगना पान-अपान वायु के बारे में कहती हैं कि इन्हीं सांसों में पार्वती में शिव और शिव में पार्वती समाहित हैं। यह अंश रचना ‘मृगाक्षणे संग संग चलो’ पर आधारित था। गौरी दिवाकर नृत्य करती हुई स्टेज पर पूरी तरह छा गई थीं। उनका नृत्य शुरू से अंत तक दर्शकों को बांधे रहा, यही उसकी खासियत रही।

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