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जिस चीनी शख्स ने भारत के खिलाफ लड़ा 1962 का युद्ध, अब वही मांग रहा पीएम नरेंद्र मोदी से मदद

सन 1962 में हुए भारत चीन युद्ध के दौरान एक चीनी सैनिक ऐसा भी है जो आज तक भारत का शरणार्थी बना हुआ है। वांग शी उर्फ राजबहादुर नाम का यह पूर्व चीनी सैनिक सन 1974 से भारत की पनाह में है।

Author Updated: February 4, 2017 3:32 PM
पूर्व चीनी सैनिक राजबहादुर अपने परिवार के साथ

सन 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध के दौरान एक चीनी सैनिक ऐसा भी है जो आज तक भारत का शरणार्थी बना हुआ है। वांग शी उर्फ राजबहादुर नाम का यह पूर्व चीनी सैनिक सन 1974 से अपने वतन जाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन वो अब तक वो सफल नहीं हो सका है। सन 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध में इस चीनी सैनिक को नहीं पता था कि वो जिस देश के खिलाफ लड़ रहा है आगे चलकर वही देश उसको पनाह देगा। राजबहादुर उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं। उनकी तमन्ना है कि वो जिंदगी के आखिरी लम्हों में अपने वतन जाकर अपने परिजनों से मिलें। इसके लिए वांग शी उर्फ राजबहादुर कई बार भारत सरकार से गुहार लगा चुके हैं। 1962 के युद्ध के बाद यह चीनी सैनिक सन 1969 में मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के मॉयल नगरी तिरोड़ी में पूरी तरह से बस गया है। राजबहादुर आज भी इसी आस में जी रहे हैं कि कब भारत सरकार की नजरें उस पर पड़ेगी और वह वापस अपने वतन चीन जा सकेगा। पूर्व चीनी सैनिक ने अब पीएम नरेन्द्र मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से गुहार लगाई है।

गौरतलब है कि सन 1962 में चीनी सेना ने भारत पर हमला कर दिया था। इसी चीन की सेना में वांग शी उर्फ राजबहादुर भी बतौर सैनिक शामिल था। जो युद्ध विराम की घोषणा होने के बाद गलती से भारत की सीमा के अंदर इतना प्रवेश कर गया कि उसे असम छावनी में गिरफ्तार कर लिया गया था। युद्ध के दौरान घायल हुआ चीनी सैनिक वांग शी को रेडक्रॉस के सदस्य अपने कैंप लेकर आए और मानवता का परिचय देते हुए दुश्मन देश के सैनिक का उपचार भी कराया। सुधार होने के बाद उसे असम सेना के हवाले कर दिया।

शुरुआत में इस चीनी सैनिक को जासूस समझकर असम सेना सहित अन्य सैनिक बटालियन ने अलग-अलग जगहों पर पूछताछ की। इसके बाद उस पर दोष न पाए जाने के बाद भारत सरकार ने अपनी उदारता का परिचय दिया और उसे महज 7 वर्ष तक ही सजा सुनाई। इसके बाद वर्ष 1963 से 1969 तक वह तिब्बत के लाभा जिले में, पंजाब के चंडीगढ़, दिल्ली छावनी और अजमेर सहित अन्य जेलों में सजा काटता रहा। साल 1969 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने उसे रिहा कर दिया। इसके बाद भारत सरकार ने उसका पुनर्वास करते हुए भोपाल पुलिस के हवाले कर दिया। जहां से उसे बालाघाट के तिरोड़ी भेजा गया है और तब से यह यहीं रह रहा है।

वर्ष 2009 में जब पूर्व सैनिक के बारे में उसके परिजनों को जानकारी मिली तो उसके परिजन दिल्ली आये और इनसे दिल्ली में मुलाकात करने के बाद चीन सरकार को इसकी जानकारी दी। जिसके बाद चीन सरकार ने वांग शी का पासफोर्ट बनाकर भारत भेजा। इसके बावजूद भी वह अपने वतन नहीं जा सका। क्योंकि भारत सरकार द्वारा उसे वीजा नहीं दिया गया। इस वजह से पूर्व चीनी सैनिक का पूरा परिवार व्यथित है और वे चाह रहे हैं कि वह एक बार चीन जाकर अपने परिजनों से मिले।

आपको बता दें कि वांग शी उर्फ राजबहादुर वर्ष 1969 से बालाघाट जिले में निवास कर रहा है। चीनी दूतावास के माध्यम से उसका पासपोर्ट भी तैयार हो गया है। हालांकि, अभी इसे भारत की नागरिकता नहीं मिली है और इस संबंध में पत्राचार लगातार जारी है। चीन जाने के लिए अनुमति का मामला मुख्यालय और नई दिल्ली स्तर पर लंबित पड़ा हुआ है। बालाघाट के मॉयल नगरी तिरोड़ी में आने के बाद पूर्व चीनी सैनिक स्थानीय एक सेठ के यहां मजदूरी का काम करते हुए सन 1975 में सुशीला नाम की महिला के साथ विवाह हो गया। उसके बाद उसके 4 बच्चे हुए। जिसमें से एक बच्चे की समुचित इलाज नहीं मिलने से मौत हो गई। आज वह अपने बेटे विष्णु बहादुर के साथ अपना जीवन यापन कर रहा है, लेकिन उसे इस बात का दुख है कि उसे आज तक भारत की नागरिकता नहीं दी गई है। जिसके लिये वो लगातार इतने वर्षों से प्रयास कर रहा है। अब उसकी अंतिम उम्मीद पीएम नरेन्द्र मोदी एवं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से है।

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