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अब केनरा बैंक से 515 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी

केनरा बैंक ने कोलकाता के आरपी इंफोसिस्टम और उसके निदेशकों के खिलाफ 515.15 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का केस दर्ज करवाया है। 26 फरवरी को सीबीआइ में पीएनबी के डिप्टी मैनेजर प्रसाद राव ने प्राथमिकी दर्ज करवाई।

Author Published on: March 1, 2018 4:01 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

पंजाब नेशनल बैंक के बाद अब केनरा बैंक से 515 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। केनरा बैंक ने कोलकाता के आरपी इंफोसिस्टम और उसके निदेशकों के खिलाफ 515.15 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का केस दर्ज करवाया है। 26 फरवरी को सीबीआइ में पीएनबी के डिप्टी मैनेजर प्रसाद राव ने प्राथमिकी दर्ज करवाई। बैंक ने शिवाजी पांजा, कौस्तुभ रे, विनय बाफना और देवनाश पाल के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई है। इसमें कहा गया है कि इन लोगों ने केनरा बैंक और नौ दूसरे बैंकों के साथ 515 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की है। केनरा बैंक के साथ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, यूनियन बैंक, इलाहाबाद बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, सेंट्रल बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, फेडरल बैंक के कॉन्सोर्टियम ने कर्ज दिया है। ज्यादा स्टॉक और डेटर्स के फर्जी कागजात जमा कराकर कंपनी की पात्रता से ज्यादा कर्ज बैंक से ले लिया गया।

अपनी प्राथमिकी में केनरा बैंक ने आरोप लगाया है कि आरपी इंफोसिस्टम ने बेईमानी से बिक्री को लोन एकाउंट के जरिए नहीं दिखाया और पूरा पैसा उड़ा दिया। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 750 करोड़ रुपए के बैंक कर्ज के गबन के मामले में सुभिक्षा रिटेल चेन समूह के संस्थापक और सुभिक्षा ट्रेडिंग सर्विसेज के प्रमोटर आर. सुब्रह्मण्यम को गिरफ्तार कर लिया है। इस समूह ने 1997 में देश भर में कारोबार शुरू किया था। वर्ष 2009 में यह कंपनी बंद कर दी गई। सुब्रह्मण्यम की कंपनी ने 13 बैंकों के समूह से कर्ज लिया था। उन्हें चेन्नई में गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें पुझल जेल भेज दिया गया है।

बैंक ऑफ बड़ौदा ने 2015 में उनके खिलाफ 77 करोड़ रुपए के गबन का मामला सीबीआइ के पास दर्ज कराया था। जांच एजंसियों की पड़ताल में यह बात सामने आई कि इसने 13 अन्य बैंकों से भी कर्ज लिया है। यह कर्ज राशि 750 करोड़ रुपए है। प्रक्रिया के अनुसार ईडी ने भी जांच शुरू कर दी है। इस मामले में इस समूह की 4.5 करोड़ रुपए की संपत्ति ईडी ने कुर्क की थी। ईडी की जांच में पता चला कि सुभिक्षा समूह ने 2007 में बैंकों से टर्म लोन और नकद उधारी सुविधा (कैश क्रेडिट) ली थी। उसके बाद उसने फंड का इस्तेमाल दूसरे मद में कर लिया और कई नामों से संपत्तियां खरीद लीं।
ईडी के अधिकारियों के अनुसार, धनशोधक निरोधक अधिनियम के तहत उनके खिलाफ मुकदमा चल रहा था। 2015 में तमिलनाडु पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने सुब्रह्मण्यम को गिरफ्तार किया था। सुब्रह्मण्यम के खिलाफ चिट फंड कंपनी खोलकर लोगों के 150 करोड़ रुपए के गबन का एक मुकदमा 1991 से चल रहा है। साथ ही, कई बैंकों के कर्ज में गबन को लेकर सीबीआइ की जांच भी जारी है।

बैंक ऑफ बड़ौदा से 70 करोड़ रुपए का कर्ज लेकर उसे अन्य मद में खर्च किए जाने का मुकदमा भी चल रहा है। इस मामले में कंपनी के चेन्नई स्थित दफ्तर और सुब्रह्मण्यम के अवास पर छापे मारे गए। आइआइटी और आइआइएम से पढ़े सुब्रह्मण्यम ने मुंबई की सिटी बैंक और एनफिल्ड इंडिया में काम करने के बाद 1997 में सुभिक्षा शुरू की। 2008 में कंपनी नुकसान में चली गई और उसे देश भर में फैले अपने 1600 स्टोर्स बंद करने पड़े। कंपनी के सिर पर 750 करोड़ रुपए से ज्यादा का बैंकों का कर्ज जमा हो गया। उसके बाद बैंकों के साथ ही अजीम प्रेमजी की कर्जदाता (प्राइवेट इक्विटी) कंपनी जैश इंवेस्टमेंट ने मुकदमे दायर कर दिए।

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