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जयपुरः स्कूलों में पढ़ने वाले हैं नहीं, पढ़ाने वाले बैठे-ठाले पा रहे वेतन

राजस्थान में प्राथमिक स्तर की सरकारी शिक्षा के हाल बेहाल है। प्रदेश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गरीबों के बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल ही सबसे बड़ा संस्थान है पर प्रदेश के कई इलाकों में इन स्कूलों में एक भी बच्चा नहीं है।
Author जयपुर | February 7, 2018 03:18 am
फाइल फोटो

राजस्थान में प्राथमिक स्तर की सरकारी शिक्षा के हाल बेहाल है। प्रदेश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गरीबों के बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल ही सबसे बड़ा संस्थान है पर प्रदेश के कई इलाकों में इन स्कूलों में एक भी बच्चा नहीं है। फिर भी सरकार वहां तैनात शिक्षकों को वेतन बांट रही है। इसके साथ ही अब सरकार ने कई सरकारी विद्यालयों को पीपीपी परियोजना पर चलाने की तैयारी कर ली है। इससे भी आर्थिक दृष्टि से कमजोर अभिभावकों को अपने बच्चों को शुरूआती शिक्षा दिलाना मुश्किल हो जाएगा।
राज्य में शिक्षा सत्र शुरू होने पर सरकार ने बड़े जोर-शोर से विद्यालयों में प्रवेशोत्सव के आयोजन कर बच्चों के नामांकन पर जोर दिया था। इसके बावजूद प्रदेश के ढाई सौ से ज्यादा ऐसे स्कूल अब सामने आए हैं, जहां एक भी बच्चे का नामांकन नहीं हुआ और वहां तैनात मास्टरजी मुफ्त में ही वेतन उठा रहे है। प्रदेश में बिना बच्चों वाले सरकारी स्कूलों में 29 तो राजधानी जयपुर में ही हैं जो सरकार के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।

शिक्षा विभाग ने भी माना कि शिक्षा सत्र शुरू होने के पांच महीने बाद पड़ताल की गई तो प्रदेश भर में 238 विद्यालय ऐसे निकले जहां एक भी बच्चे का नामांकन नहीं हुआ। इस तरह की शिकायतें हाल में प्रदेश में हुए उपचुनावों के दौरान बड़ी संख्या में सामने आई। ग्रामीण इलाकों के सरपंचों की शिकायत है कि उनके विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक ही नहीं है तो ऐसे भी स्कूल हैं जहां बच्चे ही नहीं हैं और शिक्षकों की संख्या खूब है। इसके बाद ही शिक्षा विभाग चेता और उसने अब बिना बच्चों वाले स्कूलों से शिक्षक हटाने की तैयारी कर ली। शिक्षा विभाग के आंकड़ों के हिसाब से सबसे ज्यादा जयपुर जिले में 29 विद्यालय बिना बच्चों वाले हैं। इसके अलावा जोधपुर में 15, चूरू व सीकर में 14, बाड़मेर में 13, बांसवाड़ा में 12, बीकानेर और दौसा में 11, हनुमानगढ़, धौलपुर, झुंझनूं और करौली जिले में 10 स्कूल बिना बच्चों वाले हंै। श्रीगंगानगर,अलवर और जैसलमेर में 9 स्कूलों में एक भी बच्चा नहीं है। भीलवाड़ा में 7, पाली, नागौर, झालावाड़, जालोर जिलों में 6 विद्यालय बगैर बच्चों के ही संचालित हो रहे हैं। इसी तरह सवाई माधोपुर में 5, उदयपुर में 4, बूंदी व अजमेर में 3, टोंक, सिरोही, कोटा जिलें 2-2 विद्यालयों में कोई बच्चा ही नहीं है।

प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा हो रही दुर्दशा के लिए शिक्षक सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। शिक्षक संघ प्रगतिशील के गिरीश शर्मा का कहना है कि बच्चे नहीं होने पर स्कूल बंद करना समस्या का कोई समाधान नहीं है। शिक्षा से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता बनवारी लाल शर्मा का कहना है कि स्कूल बंद करना कभी भी बेहतर विकल्प नहीं है। सरकार को ऐसे स्कूलों को संसाधन मुहैया कराने चाहिए और सत्र की शुरुआत से पहले ही इलाके के सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए।
शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी का कहना है कि बच्चे नहंीं आने पर सरकार के सामने उन्हें बंद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसे विद्यालयों के शिक्षकों को निकट के स्कूलों में समायोजित किया जा रहा है। सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों का नामांकन बढ़ाने के लिए प्रवेशोत्सव के साथ ही ग्रामीण इलाकों में कई आयोजन किये जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि पिछले कुछ सालों में प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया गया है। इससे ही कई स्कूलों में तो क्षमता से ज्यादा बच्चों का नामांकन हुआ है पर दुर्भाग्य से कुछ विद्यालय बच्चों से वंचित रह गए।

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