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सरहद की सुरक्षा में बीमार को बिस्तर भी नहीं नसीब

देश की सुरक्षा में अपने प्राणों की भी बाजी लगाने के लिए तत्पर सेना के जवान को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में इलाज के लिए एक अदद बिस्तर नहीं मिल रहा है।

Author नई दिल्ली | September 30, 2016 3:13 AM
एम्स में स्ट्रेचर पर लेटे जवान नरेश कुमार।

देश की सुरक्षा में अपने प्राणों की भी बाजी लगाने के लिए तत्पर सेना के जवान को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में इलाज के लिए एक अदद बिस्तर नहीं मिल रहा है। भारत-चीन सीमा सिक्किम के केंराग पीक पर बर्फबारी के बीच काम के दौरान दिमाग व पैर की नसों में खून जम जाने से गंभीर रूप से बीमार हुए इस जवान को यहां एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर लगवाया जा रहा है। एम्स के न्यू इमरजेंसी वार्ड में इलाज के लिए आए भारत-तिब्बत सीमा बल के सब इंस्पेक्टर नरेश कुमार (51) को हर थोड़ी देर में आकर कोई न कोई डॉक्टर यहां से कहीं और जाने का हुक्म जारी करके चला जाता है। सही तरीके से बोलने व चलने में अक्षम इस जवान के बेटे नीरज कभी यहां कभी वहां गुहार लगा रहे हैं, पर कोई सुनवाई नहीं हो रही है। बिस्तर नहीं है, कह कर यहां से सफदरजंग या दूसरे अस्पताल जाने का लिखित फरमान एम्स कैजुअलिटी का इमरजेंसी मेडिसिन विभाग 28 सितंबर को ही जारी कर चुका है। तब से यहीं पर बार-बार डॉक्टरों से इलाज के लिए गुहार लगाते इनके बेटे नीरज ने यह भी दलील दी कि सफदरजंग पहले ही कुमार को एम्स रेफर कर चुका है फिर वहीं वापस जाने से क्या होगा?


नीरज ने बताया कि कि मूलत: हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के निवासी उनके पिता आइटीबीपी में रेडियो आॅपरेटर हैं। उनकी तैनाती केंराग पीक पर थी। चीन की सीमा वाला यह पीक देश का सबसे ऊंचा दूसरा पोस्ट है, जहां जवान तमाम विषम परिस्थितियों में काम करते हैं। 18000 फुट से भी अधिक ऊंचाई पर बर्फीली हवाओं व शून्य से 15-16 डिग्री सेल्सियस तापमान में काम करना पड़ता है। नीरज ने बताया कि काम के दौरान तेज ठंड और आॅक्सीजन की कमी के कारण उनके दिमाग की नसों में खून जमा होने के कारण वे बेहोश हो गए थे। उनके पैरों की नसों में भी खून जमा हो गया है। जिससे दाहिना पैर पूरी तरह सुन्न और ठंडा हो गया है। इनका पहले सेना के फील्ड अस्पताल में फिर सेना के बेस अस्पताल में इलाज किया गया, लेकिन सुधार नहीं हुआ। इस बीच हिमाचल प्रदेश में स्थित इनके परिवार को 14 सितंबर को सूचना दे दी गई थी। नीरज ने बताया कि उन्हें जिस दिन सूचना मिली उसके अगले दिन चल कर तीसरे दिन वे सिक्किम पहुंच पाए। वहां के डॉक्टरों ने कोलकाता जाने को कहा लेकिन वहां किसी से क ोई जान-पहचान नहीं होने व दिल्ली के हिमाचल के पास होने से हमने तय किया कि दिल्ली लाना ठीक रहेगा। सेना के डॉक्टरों ने भी इसे ही ठीक कहा। इन्हें पहले सेना के बेस अस्पताल लाया गया। बेस अस्पताल ने सफदरजंग जाने को कहा। सफदरजंग अस्पताल के इमरजेंसी में 22 सितंबर को लाए गए।

दो दिन अस्पताल में रखने व कुछ जांच कराने के बाद सफदरजंग ने 26 सितंबर को अस्पताल से यह कह कर छुट्टी दे दी कि न्यूरोलॉजी व न्यूरोसर्जरी विभाग में दिखाएं। नीरज ने यह भी बताया कि गंभीर हाल में अपने पिता को लेकर वे सफदरजंग अस्पताल में भी खूब भटके। जांच के लिए स्पोर्ट्स इंजरी सेंटर भेजा गया। जहां पार्क में काफी देर तक गंभीर हाल में पिता को कभी बिठाए, कभी लिटाए रखा। किसी तरह 26 सितंबर को सफदरजंग के डॉक्टर ने इसे सेंट्रल वीनस साइनस थ्रोंबोसिस विद पीए थ्रोंबोसिस का केस बता कर एम्स की सर्जरी विभाग की डॉक्टर अनिता धर के पास भेज दिया। डॉक्टर धर ने इसे न्यूरोलॉजी मे इमरजेंसी तौर पर दिखाने को भेजा। लेकिन इमरजेंसी में आने पर 28 सितंबर को ही डॉक्टरों ने बिस्तर नहीं है यह कह कर वापस सफदरजंग या किसी दूसरे अस्पताल जाने को भेज दिया है।

पहले अपने बेटे को भी पहचानने में असमर्थ इस जवान की कुछ-कुछ याददाश्त लौट रही है। लेकिन वे कुछ भी बोल पाने में असमर्थ हैं। बेटे की चिंता है कि कहीं उनके दिमाग में स्थाई नुकसान न हो जाए, या पैर काटने की नौबत न आए। एमबीए की पढ़ाई कर रहे बेटे ने बताया कि मां घरेलू महिला हैं, तीन भाई-बहन की परवरिश का जिम्मा पिता के ही कंधों पर है। हिमाचल के भंदर गांव के रहने वाले इस परिवार को सरकार से बड़ी उम्मीदे हैं। मामले में संपर्क करने पर एम्स के प्रवक्ता डॉक्टर अमित गुप्ता न दफ्तर में मिले, न फोन उठाया न ही एसएमएस का जवाब दिया।

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