बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने के बाद पटना में राजनीतिक गतिविधियां काफी तेज हो गई हैं। बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा इस सवाल पर चर्चा के बीच नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार भी जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल हो गए। इस बीच कई लोगों को यह बात समझ नहीं आई कि नीतीश कुमार ने दो दशकों से अधिक समय तक जिस कुर्सी को अपने पास रखा था, उसे छोड़कर राज्यसभा जाने के लिए सहमति क्यों दे दी?
नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री पद को वे सबसे अधिक महत्व देते थे। इस पद पर बने रहने के लिए उन्होंने बिना किसी झिझक के पाला बदला। इसी वजह से नीतीश कुमार पटना में 21 वर्षों तक सत्ता के शिखर पर बने रहे और उन्हें पलटू राम (दलबदलू) का उपनाम भी मिला। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर राज्य की सत्ता को संसद के उच्च सदन की सदस्यता से कौन बदलना चाहेगा?
नीतीश कुमार का खराब स्वास्थ्य
पिछले चार-पांच सालों से नीतीश का खराब स्वास्थ्य किसी से छिपा नहीं था, हालांकि जानकारों का कहना है कि पिछले साल से उनकी हालत और बिगड़ गई थी। फिलहाल बिहार सरकार उनके नाम पर नौकरशाहों और उनके राजनीतिक विश्वासपात्रों के एक समूह द्वारा चलाई जा रही थी। बीजेपी उन्हें किसी न किसी समय जरूर हटाएगी यह भी कोई रहस्य नहीं था क्योंकि भाजपा बिहार की सबसे बड़ी पार्टी है और बिहार पर सत्ता हासिल करने की उसकी महत्वाकांक्षाएं प्रबल हैं। हालांकि, भाजपा से उम्मीद थी कि वह सही समय पर संभवतः साल के अंत तक यह कदम उठाएगी न कि नीतीश के नाम पर चुनाव जीतने के तीन महीने बाद।
कुछ लोगों का मानना है कि भाजपा ने पटना में अपना कार्यक्रम आगे बढ़ाने का फैसला बिहार और वैश्विक घटनाक्रमों से संबंधित कारणों से लिया है। पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण मोदी सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जटिल स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। संघर्ष शुरू होने से कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री की इज़रायल यात्रा, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर नई दिल्ली की शुरुआती चुप्पी (जिसे बाद में विदेश सचिव विक्रम मिसरी द्वारा ईरानी दूतावास में शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करके कुछ हद तक नरम किया गया) और भारत द्वारा अपने प्रभाव क्षेत्र माने जाने वाले अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक ईरानी जहाज का डूबना, ये सभी घटनाएं सरकार के सामने मौजूद चुनौतियों के संकेत हैं।
बीजेपी के अधिकांश सहयोगी दलों का समर्थन आधार अल्पसंख्यकों में है
बीजेपी के अधिकांश सहयोगी दलों का समर्थन आधार अल्पसंख्यकों में है और ईरान पर सरकार का शुरुआती रुख उन्हें रास नहीं आया। ऐसे में, लोकसभा में मात्र 240 सांसदों वाली और बहुमत के लिए सहयोगियों पर निर्भर भाजपा ने शायद यह सोचा होगा कि उसे संसद में अपनी स्थिरता बनाए रखनी होगी। जेडीयू भी उनमें से एक है, जिसके पास 12 लोकसभा सांसद हैं। नीतीश को बिहार से इस्तीफा देने के लिए मजबूर करके भाजपा ने यह सुनिश्चित कर लिया है कि उत्तराधिकार के मुद्दे पर उसके सहयोगी दल में फूट पड़ने की संभावना नहीं है क्योंकि वह अपने बेटे निशांत को उपमुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करने पर सहमत हो गए हैं।
बिहार के लिए नीतीश का योगदान
नीतीश के मुख्यमंत्री पद से हटने के साथ ही उनके और लालू प्रसाद के 35 वर्षों के प्रभुत्व वाले युग का अंत हो जाएगा जिसने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के उत्थान को जन्म दिया। लालू ने जहां उन्हें आवाज दी, वहीं नीतीश ने उनके उत्थानको स्थिर किया और यह सुनिश्चित किया कि सत्ता का हस्तांतरण केवल पिछड़े वर्गों के बड़े और अधिक प्रभावशाली लोगों तक सीमित न रहे। जेडीयू प्रमुख ने यह सुनिश्चित किया कि ओबीसी के उन पिछड़े वर्गों को भी उनका हक मिले जो वास्तव में हाशिये पर थे।
इन समुदायों को सिर उठाने में सक्षम बनाने के साथ-साथ, नीतीश कुमार का सबसे महत्वपूर्ण योगदान मंडल व्यवस्था को संयमित करना और चरमपंथियों को हावी होने दिए बिना इसे मुख्यधारा की वास्तविकता बनाना था। हालांकि, नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ गठबंधन किया लेकिन उन्होंने बिहार में धार्मिक ध्रुवीकरण को कुशलतापूर्वक रोका। “सुशासन बाबू” ने विकास, सुशासन, कल्याणकारी नीतियों, महिला सशक्तिकरण और कानून के शासन पर ध्यान केंद्रित करने और प्रतिद्वंद्वी पार्टी आरजेडी को कमजोर होने से बचाकर ऐसा किया। अगर पिछले साल के चुनावों में आरजेडी का प्रदर्शन बेहतर होता तो भाजपा के लिए आज उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाना और भी मुश्किल होता।
लालू-नीतीश युग के अंत के साथ, बिहार में द्विध्रुवीय राजनीति की संभावना बढ़ रही है जिसमें भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन के खिलाफ खड़ा होगा और अन्य दलों को हाशिए पर धकेल देगा।
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नीतीश अगर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते हैं तो यह न केवल जेडीयू बल्कि एनडीए के लिए भी एक बड़ी चुनौती होगी। इस सबके बीच बिहार में नीतीश के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए जिन नामों की चर्चा सबसे ज्यादा है उनमें पांच नाम प्रमुख हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
