Bihar Politics: हाल ही में बिहार की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक बिहार की राजनीति से बाहर निकलने का ऐलान कर दिया। इसके चलते उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड को नेतृत्व परिवर्तन के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। जेडीयू के लिए ये एक ऐसी स्थिति है जिसके लिए पार्टी नेताओं का कहना है कि कुछ हद तक नीतीश कुमार स्वयं ही जिम्मेदार हैं।

जेडीयू के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार एक साल से अधिक समय से जेडीयू के कई नेता, नीतीश कुमार से अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति में आने अनुमति देने का आग्रह कर रहे थे, क्योंकि उनके स्वास्थ्य और पार्टी के भावी नेतृत्व को लेकर चिंताएं बढ़ रही थीं। नीतीश कुमार वंशवादी राजनीति के प्रति अपने लंबे समय से चले आ रहे विरोध का हवाला देते हुए इस कदम का विरोध करते कर रहे थे।

निशांत कुमार के आने में हो गई देरी

नीतीश कुमार ने जब अपने बिहार की राजनीति से बाहर निकलने के ऐलान किया और अपने स्वयं के संन्यास के संकेत दिए, तब जाकर उन्होंने निशांत कुमार को राजनीति में आने के लिए अनुमति दी। 8 मार्च को जेडीयू में शामिल हुए निशांत कुमार राजनीति में नए हैं और उन्हें राजनीति की बारीकियां सीखने में समय लग सकता है।

सूत्रों ने बताया कि पिछले एक साल में नीतीश के स्वास्थ्य में गिरावट शुरू होने के साथ ही, निशांत को राजनीति में लाने के लिए पार्टी के भीतर दबाव बढ़ रहा था। जेडीयू के ही कई नेता उन्हें एकमात्र ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते थे जिनके इर्द-गिर्द पार्टी एकजुट हो सकती थी। जेडीयू के ही एक नेता ने कहा, “पिछले एक साल में जब नीतीश जी का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा, तो निशांत कुमार को पार्टी में शामिल करने की हर संभव कोशिश की गई। हमें लगा कि पार्टी को बचाने का यही एकमात्र तरीका है लेकिन नीतीश जी टालमटोल करते रहे।”

साल भर से हो रही थी कवायद

जेडीयू के ही एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी पिछले एक साल से निशांत को राजनीति में लाने की कोशिश कर रही है। लेकिन नीतीश कुमार का यह स्पष्ट रुख था कि जब तक वह मुख्यमंत्री हैं और पार्टी की बागडोर सक्रिय रूप से संभाल रहे हैं, तब तक उनका बेटा राजनीति में नहीं आएगा। इसके अलावा एक अन्य नेता ने कहा कि अपने पूरे राजनीतिक जीवन में नीतीश जी वंशवाद की राजनीति के खिलाफ रहे हैं। उनका मानना ​​था कि अगर उनके बेटे ने पार्टी में तब शामिल हो जाएं जब वे राज्य में राजनीतिक रूप से सक्रिय हों, तो यह ठीक नहीं लगेगा।

जेडीयू नेता ने कहा कि अगर निशांत पहले ही पार्टी में शामिल हो गए होते, तो नीतीश के पार्टी छोड़ने पर पार्टी को इतना बड़ा झटका नहीं लगता। जेडीयू के नेताओं ने स्वीकार किया है कि इस अनिच्छा ने अब पार्टी के शीर्ष पर नेतृत्व का शून्य पैदा कर दिया है, ठीक उसी समय जब नीतीश ने पद छोड़ दिया है।

‘निशांत को मिला कम समय, अभी तैयार नहीं’

जेडीयू के एक अन्य नेता ने निशांत कुमार को लेकर कहा कि वह अभी तैयार नहीं हैं। आदर्श रूप से, उन्हें कुछ साल पहले ही पार्टी में शामिल हो जाना चाहिए था, कोई संगठनात्मक पद संभालना चाहिए था या विधान परिषद का हिस्सा बनकर कुछ अनुभव प्राप्त करना चाहिए था। तब बदलाव सुचारू रूप से हो पाता। उन्होंने कहा कि शुक्र है कि अभी तुरंत चुनाव नहीं हैं और उनके पास तैयारी करने का समय है। वह एक प्रतिभाशाली और तेजतर्रार युवा हैं।

OBC नेता की कमी

सामाजिक न्याय आंदोलन से उभरी जेडीयू पार्टी के पास वर्तमान में अन्य पिछड़ा वर्ग से ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी राज्यव्यापी लोकप्रियता हो। पार्टी के तीन प्रमुख नेता संजय झा, राजीव रंजन सिंह और विजय कुमार चौधरी, तीनों ही नीतीश कुमार के करीबी माने जाते हैं लेकिन तीनों ही सभी उच्च जाति के हैं।

सूत्रों ने बताया कि पिछले साल विधानसभा चुनावों के बाद जब नीतीश ने गठबंधन को ऐतिहासिक जनादेश दिलाया, तो उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं और बढ़ गईं और गठबंधन के भीतर नेतृत्व परिवर्तन को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं। चुनाव से पहले ही बीजेपी आंतरिक बैठकों में नीतीश कुमार के स्वास्थ्य का मुद्दा उठा रही थी और नेतृत्व परिवर्तन को लेकर लगातार प्रयास कर रही थी।

बीजेपी बना रही थी दबाव

एक बीजेपी नेता ने कहा कि नीतीश कुमार के बिना चुनाव लड़ना संभव नहीं था। इसलिए पच्चीस से तीस, फिर से नीतीश के नारे पर चुनाव लड़ा गया, जबकि हम नेतृत्व परिवर्तन के लिए दबाव बनाते रहे। हालांकि, जेडीयू के वरिष्ठ नेताओं ने इस सुझाव को खारिज कर दिया कि नीतीश ने बीजेपी के दबाव में पद छोड़ा, और बताया कि गठबंधन के भारी जनादेश के साथ सत्ता में लौटने के महज तीन महीने बाद ही उन्होंने पद छोड़ा है।

जेडीयू के ही एक नेता ने कहा कि मैं कहूंगा कि उन्हें दबाव में नहीं, बल्कि समझाया गया था। आखिरकार, यह नीतीश जी का खुद लिया गया एक सोच-समझकर लिया गया फैसला था। बीजेपी अच्छी तरह जानती है कि नीतीश जी को दबाव में कुछ भी करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को भी अपने विधेयकों को पारित करवाना होगा। इसके लिए उसे अपने सहयोगियों के समर्थन की जरूरत है।

बीजेपी बनाएगी अपना मुख्यमंत्री

नीतीश कुमार के बाद बीजेपी के मुख्यमंत्री बनने और निशांत के उपमुख्यमंत्री के रूप में सरकार में शामिल होने की संभावना है। ऐसे में जेडीयू नेताओं को उम्मीद है कि आने वाले कुछ वर्षों में उन्हें शासन का अनुभव प्राप्त होगा। साथ ही पार्टी बिहार भर में उनके व्यापक दौरों की योजना बना रही है ताकि वे जेडीयू के जमीनी संगठन से परिचित हो सकें और एक बड़ी राजनीतिक भूमिका के लिए तैयार हो सकें।

जेडीयू के लिए अब चुनौती निशांत कुमार के इर्द-गिर्द एक नेतृत्व संरचना का तेजी से निर्माण करने की होगी। यह एक ऐसा परिवर्तन होगा, जिसके बारे में पार्टी नेताओं का कहना है कि अगर राजनीति में उनका प्रवेश इतनी देरी से न होता तो शायद ये सबकुछ इतना अचानक न होता।

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और साथ में मौजूद सम्राट चौधरी। (इमेज सोर्स- एएनआई)

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