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निर्भया केसः अंतिम न्याय में अभी वक्त लगेगा

निर्भया मामले पर शुक्रवार को आए फैसले के बाद कानूनविदों का मानना है कि फांसी मुकर्रर होने के बाद भी अभी ‘अंतिम न्याय’ में वक्त लगेगा।
Author नई दिल्ली | May 6, 2017 00:46 am

निर्भया मामले पर शुक्रवार को आए फैसले के बाद कानूनविदों का मानना है कि फांसी मुकर्रर होने के बाद भी अभी ‘अंतिम न्याय’ में वक्त लगेगा। बचाव पक्ष के पास कानूनी अधिकार हैं जिसके चलते वे इस फैसले कि खिलाफ अपील कर सकते हैं। उनके पास ‘पुनर्विचार याचिका’, ‘राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका’ ‘क्युरेटिव पिटीशन दायर करना’ जैसे अधिकार हैं।
फौजदारी मामले के वकील एमएस खान ने बताया कि सबसे पहले चारों दोषी मौत से बचने के लिए बड़ी खंडपीठ के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर कर सकते हैं। उनकी अपील पर फांसी की सजा सुनाने वाली पीठ से ज्यादा सदस्य वाली पीठ को दोबारा विचार कर सकती है। यह निर्णय की एक तरह से समीक्षा है। अगर पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई और फांसी फिर भी बरकरार रखी गई तो वह राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल कर अपनी जान बख्शने की गुहार लगा सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद-72 के अनुसार राष्ट्रपति फांसी की सजा को माफ कर सकते हैं, दोषियों को क्षमा दे सकते हैं, सजा को खारिज कर सकते हैं या फिर उसे बदल भी सकते हैं, उसे उम्रकैद में तब्दील सकते हैं। राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह पर इस बारे में फैसला लेते हैं। अगर राससीना हिल और नॉर्थ ब्लॉक ने इसे नहीं माना तो आखिर में दोषियों की ओर से एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में क्युरेटिव पिटीशन दायर कर जान बक्शने की भीख मांगी जा सकते हैं। क्यूरेटिव पिटीशन तब दाखिल की जाती है। जब किसी दोषी की राष्ट्रपति के पास भेजी गई दया याचिका और सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दोनों खारिज हो गई हों, लेकिन याचिकाकर्ता को बताना होता है कि वह किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दे रहा है। सनद रहे कि याकूब मेनन की क्यूरेटिव पिटीशन पर अंतिम वक्त तक सुनवाई की गई थी। क्यूरेटिव पिटीशन खारिज होने पर यह मामला एक बार फिर कागजी तौर पर उसी निचली अदालत में जाएगा जिसने सुनवाई की थी। इस मामले में साकेत स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट ‘डेथ वारंट’ जारी करेगी और इसके बाद का काम ‘जल्लाद’ के कोटे का है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल फैसले से नाखुश
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ खड़े लोगों की सूची लंबी है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में इस जैसे जघन्य, नृशंस और क्रूर हमले को रोकने में मदद करेगा। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस पर एतराज जताया। संस्था की महिला अधिकार कार्यकर्ता गोपिका वाशी ने फैसले पर नाखुशी जताई। उनका कहना है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल फांसी की सजा के खिलाफ है। संस्था इसे जीने के अधिकार के खिलाफ मानती है। इतना ही नहीं जस्टिस वर्मा कमेटी ने भी इस बात को माना है कि फांसी की सजा को कानून की किताब से हटा देना चाहिए। वाशी ने कहा कि फांसी से अपराधी खत्म होगा, अपराध नहीं। भारत में ऐसी वारदातों को रोकने के लिए संस्थागत सुधार की जरूरत है।

पांच दिन में पुलिस ने दाखिल कर दिया था आरोपपत्र
अदालत के बाहर आम राय थी कि इस मामले में कई नई चीजें सामने आर्इं। लोगों ने माना कि वारदात करने वाले जितने क्रूर थे, उससे ज्याद इन्हें सजा दिलाने वाले सजग दिखे। पहली बार बलात्कार के किसी मामले में संसद के स्थायी समिति की बैठक में दो नौकरशाहों तत्कालीन गृह सचिव व दिल्ली पुलिस तत्कालीन आयुक्त को तलब कर सफाई ली गई। एसीपी स्तर के दो अधिकारी को 24 घंटे के अंदर निलंबित कर दिया गया। 24 घंटे के भीतर पुलिस ने आरोपियों को दबोच लिया। पहली बार महज पांच दिन में पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल कर दिया। पहली बार हुआ जब महिला के प्रति हुए किसी अपराध पर देश के प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष समेत तमाम हस्तियां पीड़ित के पास पहुंचे। दिल्ली में त्वरित अदालत बनाने का फैसला लिया गया। नया कानून बनाकर संसद ने यह व्यवस्था कर निर्भया जैसी वारदातों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालतों में हो। इसमें 20 दिन में आरोप पत्र दाखिल करने की बाध्यता पुलिस पर है। दिल्ली की साकेत अदालत ने महज सात महीने से कम समय में ही फैसला सुना डाला और सभी आरोपियों को फांसी दी।

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