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शराब और नींद की गोली के सहारे ठंड से जूझते नौनिहाल

विकास की चकाचौंध से दूर ठंड और अंधेरे में लिपटी इस कहानी को बयान किया है पश्चिम बंगाल के प. मिदनापुर के रहने वाले राजकुमार मैती ने जो सालों से एक गैर सरकारी संगठन ‘गूंज’ के लिए स्थानीय सामुदायिक कार्यकर्ता के तौर पर काम कर हैं।

Author January 18, 2019 5:14 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

पश्चिम बंगाल के झारग्राम जिला के नयाग्राम प्रखंड के गांवों की यह कहानी मॉल्स और स्मार्टफोन के बीच पलते दिल्ली-एनसीआर जैसे मेट्रो सिटी के पाठकों को कुछ अजीब लगेगी। लेकिन, झारग्राम के आदिवासी आबादी वाले तोपबन, रखालबन और जमशोला गांवों का सच यह है कि जब बच्चा ठंड से रोता है तो उसकी मां उसे दारू पिला कर सुला देती है। और तो और, विकास की दौड़ में उन्हें कुछ मिला हो या नहीं, लेकिन अब व्यावसायिक तौर पर बनाए जा रहे चावल की शराब में नींद की गोली घुली मिल रही है जिसे आदिवासी ग्रामीण हाट-बाजार से अपने परिवार के लिए खरीदता है।

विकास की चकाचौंध से दूर ठंड और अंधेरे में लिपटी इस कहानी को बयान किया है पश्चिम बंगाल के प. मिदनापुर के रहने वाले राजकुमार मैती ने जो सालों से एक गैर सरकारी संगठन ‘गूंज’ के लिए स्थानीय सामुदायिक कार्यकर्ता के तौर पर काम कर हैं। मैती ने कहा कि गूंज के संज्ञान में यह बात 2015 में आई जब आंगनवाड़ी पर उनकी टीम का ध्यान बढ़ा और घरों का दौरा कर माताओं से बात की। उन्होंने कहा कि हालांकि, चावल की शराब (राइस बियर) आदिवासी परंपरा का हिस्सा है, लेकिन बच्चों को ये मजबूरी में देते हैं। बकौल मैती इनके पास ज्यादा कपड़े नहीं होते वैसे में बच्चे को ठंड का एहसास न हो और नींद आ जाए इसलिए माताएं उन्हें राइस बियर पिलाती हैं। खाने का भी अभाव होता है जिससे बड़ों के साथ बच्चे भी राइस बियर पीते हैं। मैती ने यह भी कहा कि राइस बियर की परंपरा में अब और भी चिंताजनक बदलाव आ रहा है। पहले बकुर पेड़ की छाल इसमें डाली जाती थी, लेकिन उसकी जगह अब नींद की गोली डाली जाने के कुछ मामले सामने आए हैं। मैती ने कहा कि जो लोग साप्ताहिक हाटों और त्योहारों में बेचने के लिए राइस बियर बना रहे हैं वो नींद की गोली का इस्तेमाल कर रहे हैं।

कोलकाता की टीम गूंज की अर्पिता पांडा ने कहा कि गूंज की पहल ‘ओढ़ा दो जिंदगी’ से काफी बदलाव आया है, लेकिन नौनिहाल अभी भी पूरी तरह से इस चंगुल से बाहर नहीं हैं। उन्होंने बताया कि गूंज 44 गांवों में काम कर रहा है और लोगों को अपने स्थानीय संसाधनों से अपने गांव-घर का विकास काम करने को प्रोत्साहित करता है और बदले में कपड़े का फैमिली कीट देता है जिसमें कंबल, दरी, बच्चों के गर्म कपड़े सभी होते हैं। बकौल अर्पिता आदिवासी ग्रामीणों ने गूंज की इस पहल का खुशीपूर्वक स्वागत किया है। दिल्ली की टीम गूंज के उत्तम सिन्हा ने कहा कि झारग्राम ही नहीं देश में कई ऐसी जगह हैं जहां लोगों के लिए कपड़ा खरीदना चुनौती है। मध्य प्रदेश के खंडवा में ब्याज पर कपड़े लेने की बात भी सामने आई है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदा की ओर सभी का ध्यान जाता है, जबकि हर साल ठंड के रूप में आने वाली पूर्वनिश्चित आपदा की वजह से हजारों जानें जाती हैं क्योंकि उनके पास पर्याप्त कपड़ों का अभाव है जिस पर गूंज पिछले 20 साल से काम कर रहा है और शहरी पुराने कपड़ों को एक व्यवस्थित तरीके से सुदूर ग्रामीण व पिछड़े इलाकों में पहुंचाकर ‘काम के बदले कपड़ा’ अभियान के सहारे समानान्तर अर्थतंत्र विकसित करने का प्रयास किया है। स्कूल ड्रेस और महिलाओं के सैनिटरी नैपकिन को भी इस अभियान का हिस्सा बनाया गया है।

अपने घर के 75 पुराने कपड़ों के साथ गूंज की शुरुआत करने वाले अंशु गुप्ता ने कहा, ‘केवल इस देश की व्यवस्थाओं की ही नहीं पूरे विश्व की विफलता है कि रोटी, कपड़ा और मकान को तीन बुनियादी जरूरत बताया गया लेकिन कपड़ा कहीं और कभी भी विकास का मुद्दा नहीं बना।
सतत् विकास या मिलेनियम डेवलपमेंट के लक्ष्यों में भी कपड़ा कहीं मुद्दा नहीं है, जबकि दुनिया में गरीबी का पहला लक्षण कपड़ा है। कपड़े से ही आर्थिक और सामाजिक स्थिति का निर्णय होता है’। उन्होंने कहा कि अक्सर हम विकास की दौड़ में अपनी पसंद के फैशनेबल मुद्दे लेते चले जाते हैं जबकि मूलभूत मुद्दे रह जाते हैं, इसलिए हर स्तर पर सोच में बदलाव जरूरी है।

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