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गोमुख से हरिद्वार तक एक फरवरी से प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूर्ण पाबंदी

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने गुरुवार को निर्देश दिया कि गंगा और उसके आसपास गोमुख से लेकर हरिद्वार तक किसी भी प्रकार के प्लास्टिक के इस्तेमाल पर एक फरवरी से पूर्ण पाबंदी होगी..

Author नई दिल्ली | December 10, 2015 23:23 pm
गंगा सफाई योजना को शुरू हुए करीब तीस साल हो गए। इस पर अब तक अरबों रुपए बहाए जा चुके हैं। (फाइल फोटो)

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने गुरुवार को निर्देश दिया कि गंगा और उसके आसपास गोमुख से लेकर हरिद्वार तक किसी भी प्रकार के प्लास्टिक के इस्तेमाल पर एक फरवरी से पूर्ण पाबंदी होगी। एनजीटी ने इस नदी में कचरा बहाने वाले दोषी होटलों, धर्मशालाओं और आश्रमों पर 5000 रुपए रोजाना जुर्माना भी लगाया। अधिकरण ने नदी को प्रदूषणमुक्त रखने के लिए कई निर्देश जारी किए।

उसने कहा कि अगर कोई भी होटल, धर्मशाला या आश्रम अपना घरेलू कचरा या जलमल गंगा या उसकी सहायक नदियों में बहाता है तो उसे नदी को प्रदूषित करने को लेकर 5000 रुपए रोजाना के हिसाब से पर्यावरण क्षतिपूर्ति का भुगतान करना होगा। हरित अधिकरण ने गंगा के सफाई कार्य को कई खंडों – गोमुख से हरिद्वार, हरिद्वार से कानपुर, कानपुर से उत्तर प्रदेश की सीमा तक, उत्तर प्रदेश की सीमा से लेकर झारखंड की सीमा तक और झारखंड की सीमा से बंगाल की खाड़ी तक में बांट दिया है।

प्लास्टिक पर पाबंदी के अलावा अधिकरण ने निगम अपशिष्ट, भवन निर्माण व तोड़फोड़ वाले मलबे को गंगा और उसकी सहायक नदियों में फेंके जाने पर रोक लगा दी और घोषणा की कि उल्लंघनकर्ता को 5000 रुपए प्रति घटना की दर से पर्यावरण मुआवजे का भुगतान करना होगा। एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अगुआई वाली पीठ ने कहा कि पहले खंड के पहले चरण में (गोमुख से हरिद्वार तक) गंगा और उसकी सहायक नदियों के आसपास बसे शहरों व नगरों में प्लास्टिक के इस्तेमाल यानी उसकी थैलियों, प्लेट, ग्लास, चम्मज, पैकेट पर पूर्ण प्रतिबंध होगा। किसी भी परिस्थिति में चाहे थैलियों की मोटाई कुछ भी क्यों न हो, उसकी इजाजत नहीं होगी। ये प्रतिबंध एक फरवरी, 2016 से लागू होगा।

उत्तराखंड में नौ पनबिजली परियोजनाओं, जिसका मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, के बारे में कोई आदेश नहीं जारी करने वाले अधिकरण ने कहा कि सभी परियोजनाओं को अपना मल शोधन संयंत्र बनाना होगा और तीन महीने में उन्हें चालू करना होगा। हरित पीठ ने कहा कि उत्तराखंड पर्यावरण सुरक्षा व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति के बगैर चल रही गंभीर प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयां तत्काल प्रभाव से बंद कर दी जाएंगी।

नदी तल में उत्खनन के मुद्दे पर अधिकरण ने कहा कि यह बिल्कुल ही नियंत्रित तरीके और कड़ी निगरानी में होगा। पीठ ने उत्तराखंड सरकार को (कपड़ा मंत्रालय के साथ मिलकर) जैविक रूप से नष्ट होने वाली सामग्री जैसे जूट बैग देने का निर्देश दिया। पीठ में विशेषज्ञ सदस्य डीके अग्रवाल और बीएस साजवान भी हैं।

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