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दिल्ली सरकार ने बुलाया बिना मुद्दे वाला विशेष सत्र, सत्ता और विपक्ष दोनों को नहीं पता किस बात पर होनी है चर्चा

पूर्व सूचना पर बिना एजंडा की जानकारी के बुलाए गए इस सत्र को जहां विपक्ष विधानसभा का अपमान बता रहा है, वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि केजरीवाल सरकार संविधान, नियमों और परंपराओं का उल्लंघन कर संविधान निर्माताओं और आंबेडकर को रुला रही है।

Author नई दिल्ली | June 27, 2017 3:28 AM
आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (PTI Photo)

केजरीवाल सरकार ने दिल्ली विधानसभा का 28 और 29 जून को विशेष सत्र बुलाया है। यह छठी विधानसभा के पांचवें सत्र का चौथा भाग है। जो दिल्ली विधानसभा के इतिहास में सबसे लंबे सत्र के सत्रावसान के बाद 6 मार्च से शुरू हुआ। दो दिनों की पूर्व सूचना पर बिना एजंडा की जानकारी के बुलाए गए इस सत्र को जहां विपक्ष विधानसभा का अपमान बता रहा है, वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि केजरीवाल सरकार संविधान, नियमों और परंपराओं का उल्लंघन कर संविधान निर्माताओं और आंबेडकर को रुला रही है।  बुधवार से बुलाए गए सत्र का मुद्दा क्या है? यह न सत्ता पक्ष के विधायकों को पता है और न विपक्ष को।

सत्ता पक्ष के विधायकों ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी शायद सोमवार को मिलेगी। वहीं विपक्ष तो केजरीवाल सरकार के विधानसभा सत्र बुलाने के पूरे रवैये से ही नाराज है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि पूर्व सूचना के बिना सदन बुलाना, सदन की अवमानना है। बकौल गुप्ता, ‘मुझे 25 तारीख, रविवार को अचानक नोटिस मिलता है कि सदन है, नियमत: 14 दिनों की पूर्व सूचना होनी चाहिए लेकिन हर बार कभी दो कभी एक दिन की सूचना पर सदन की बैठक बुलाई जा रही है।’ इस बैठक की खास बात यह है कि बैठक का कोई एजंडा किसी को नहीं पता है। गुप्ता कहते है कि नियमित सत्र एक बार भी नहीं कर रहे हैं। कहीं भी ऐसा नहीं होता है, यह पूरी तरह केजरीवाल की मनमानी है।
‘सत्रावसान तक नहीं करती केजरीवाल सरकार’

दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एसके शर्मा ने वर्तमान केजरीवाल सरकार पर संविधान, नियमों और परंपराओं के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कहा कि यह सरकार तो संविधान निर्माताओं और आंबेडकर को रुला रही है। संविधान में विधानसभाओं और संसद के साल में तीन सत्रों का प्रावधान है। जिसमें सभी मसलों पर बहस हो जाती है। बजट सत्र, मॉनसून सत्र और शीतकालीन सत्र। हर सत्र की समाप्ति सत्रावसान से किया जाता है। दिल्ली विधानसभा के संदर्भ में सत्रावसान कैबिनेट की अनुशंसा पर उपराज्यपाल की मंजूरी से होना चाहिए। पिछली सरकारों तक यही होता आया है, लेकिन वर्तमान सरकार लंबे समय तक सत्रावसान करती ही नहीं। सत्रावसान नहीं होने का मतलब है कि विधानसभा हमेशा सत्र में रहेगी और स्पीकर अपनी मर्जी से बिना उपराज्यपाल की अनुमति से सत्र बुला सकते हैं क्योंकि सत्र का स्थगन हुआ होता है, सत्रावसान नहीं।

इसके साथ ही एसके शर्मा ने सत्रावसान का नहीं किया जाना उपराज्यपाल विधायी अधिकारों का हनन बताया। शर्मा ने कहा कि केजरीवाल सरकार ने तो सत्रावसान को ही एक तरह से समाप्त कर दिया है, विधानसभा ऐसे नहीं चलती। जबकि, दिल्ली में इस सरकार के पहले तक विधानसभा के अस्तित्व के दौरान हम तो एक सप्ताह के अंदर-अंदर ही होता रहा है। एसके शर्मा विशेष सत्र पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि नियमों के मुताबिक विशेष सत्र जैसी कोई चीज नहीं होती, केवल अनिवार्य या आपात स्थिति में आपातकालीन सत्र का जिक्र संविधान में है। उन्होंने कहा अभी तक दिल्ली के विधानसभा के इतिहास में केवल शीला दीक्षित सरकार के दौरान तीन ऐसे सत्र बुलाए गए थे, जिसके पीछे कुछ अपरिहार्य कारण बने थे, न कि किसी की आलोचना के लिए सत्र बुलाया गया। शर्मा के मुताबिक, इसके अलावा न तो मदनलाल खुराना, न साहिब सिंह वर्मा और न ही सुषमा स्वराज के शासनकाल में कभी आपात सत्र बुलाया गया।गौरतलब है कि छठी विधानसभा का चौथा सत्र छह भागों में बुलाया गया था जिसका पहला भाग 9 जून 2016 से 11 जून 2016 तक चला था और सत्रावसान इस साल 1 मार्च को हुआ। वर्तमान विधानसभा का पहला सत्र भी पांच भागों में फरवरी 2015 से अगस्त 2015 तक चला था।

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