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Assembly Election Results 2016: प. बंगाल में ज्यादा ताकत से लौटीं ममता, दीदी- अम्मा अडिग

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने जहां कांग्रेस को हकीकत की जमीन दिखा दी, वहीं भाजपा के लिए नई आस जगाई है।
Author नई दिल्ली | May 20, 2016 04:31 am
असम में भाजपाराज, दीदी-अम्मा अडिग

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने जहां कांग्रेस को हकीकत की जमीन दिखा दी, वहीं भाजपा के लिए नई आस जगाई है। कांग्रेस से उकताई असम की जनता ने इस बार भारतीय जनता पार्टी को साफ जनादेश दिया है। इसके साथ ही पूर्वोत्तर में कमल ने पहली बार खिलकर भविष्य की क्षेत्रीय राजनीति की ओर संकेत कर दिया। यहां नतीजे एग्जिट पोल के मुताबिक ही रहे। लेकिन तमिलनाडु में ये चुनावी कयास और रुझान मात खा गए और यहां जे जयललिता की अगुआई में अन्नाद्रमुक ने फिर वापसी कर द्रमुक गठजोड़ के मनसूबों पर पानी फेर दिया है। बंगाल में दीदी का किला अभेद रहा। चुनावी कयासों और उम्मीदों के मुताबिक ममता बनर्जी वाम-कांग्रेस की राजनीति को ध्वस्त कर राज्य की कमान संभालने जा रही हैं। कांग्रेस को सबसे ज्यादा हताश केरल ने किया। वहां वाम गठबंधन एलडीएफ को राज्य में स्पष्ट बहुमत मिल गया है और कांग्रेस बेआबरू होकर सत्ता से बेदखल हो गई है। सांत्वना के नाम पर कांग्रेस को पुडुचेरी में कामयाबी मिली है। राज्य में वह सत्तासीन एआइएनआरसी को पराजित कर द्रमुक के साथ सरकार बनाने जा रही है।

असम में पहली बार खिला कमल

पश्चिम बंगाल की जनता ने तमाम अटकलों, अनुमानों और चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों को धता बताते हुए सत्ता फिर से ममता बनर्जी के नाम कर दी। इस बार ममता की तृणमूल कांग्रेस ने दो तिहाई से भी ज्यादा बहुमत के साथ बंगाल की बादशाहत हासिल की है। तृणमूल कांग्रेस को इस बार 211 सीटें मिली हैं। ममता को सत्ता से बेदखल करने के लिए दो धुर विरोधियों वाम मोर्चे और कांग्रेस का गठबंधन करना भी बेमानी साबित हुआ। वाममोर्चा-कांग्रेस गठजोड़ ममता की लहर के आगे टिक ही नहीं पाया।

पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में छह चरणों में हुआ इस बार का मतदान अब तक का संभवत: सबसे लंबी अवधि का रहा। हर चरण का मतदान निपटते ही सबकी नजरें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भविष्य पर टिक जाती थीं। गुरुवार को नतीजे सामने आने के साथ ही यह तय हो गया कि ममता ‘दीदी’ की पार्टी की बंगाल पर पकड़ बनी हुई है। वाममोर्चा एवं कांग्रेस गठबंधन की रणनीति सफल नहीं रही और यह बदलाव की बयार लाने में नाकाम साबित हुई। विरोधियों के सारदा चिटफंड और दूसरे घोटालों के आरोपों की मतदाताओं ने हवा निकाल दी।
तृणमूल कांग्रेस ने 211 सीटों पर जीत हासिल की है। वहीं कांग्र्रेस को 44 सीटें मिली हैं। माकपा के बाकी पेज 8 पर उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी 8
खाते में 26 सीटें आई हैं। जबकि भाकपा को एक सीट ही मिल पाई है। इनके अलावा आरएसपी, भाजपा और गोरखा जन मुक्ति मोर्चा को तीन-तीन सीटें मिली हैं।

कांग्रेस और वाम दलों में तालमेल होने के बाद उन्होंने तृणमूल के समक्ष एक मजबूत गठबंधन की चुनौती पेश करने का प्रयास किया था। लेकिन यह चुनौती ममता की आंधी में टिक न सकी और ममता दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में वापस आ गईं। इस चुनाव परिणाम ने वाम मोर्चे को रसातल में पहुंचा दिया। कम सीटें लड़ कर भी कांग्रेस अपने सहयोगी से नतीजों में आगे निकल गई।

सूबे में इस बार का विधानसभा चुनाव इस मायने में खास है कि भारतीय जनता पार्टी भी पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरी थी। पार्टी ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने अकेले दम पर चुनाव लड़ा और सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। जबकि वाममोर्चा एवं कांग्रेस के बीच गठबंधन के चलते वाममोर्चा मोटे तौर पर 200 सीटों पर और कांग्रेस करीब 80 सीटों पर चुनाव लड़ी। चुनाव में पहली बार ऐसे 9776 मतदाताओं को अपने मताधिकार के प्रयोग का हक मिला जो भारत और बांग्लादेश के बीच क्षेत्र की अदला-बदली के बाद भारत के नागरिक बने।

बंगाल में ममता बनर्जी का ‘ठंडा माथा कुल कुल, फिर आएगा तृणमूल’ का नारा असर करता दिखा। ममता ने ग्रामीण इलाकों में सड़क निर्माण, बिजली की अच्छी उपलब्धता, छात्राओं को साइकिल और दो रुपए में एक किलो चावल जैसे कार्यक्रम शुरू किए। वाममोर्चा-कांग्रेस ने तालमेल करके सत्तारूढ़ तृणमूल के सामने चुनौती पेश की और अनेक मुद्दों पर ममता बनर्ती की पार्टी को घेरा। लेकिन ममता बनर्जी की जनप्रिय छवि के आगे वाममोर्चा-कांग्रेस गठबंधन कोई ऐसा चेहरा पेश करने में विफल रहा जो राज्य में उसकी पुरानी हैसियत लौटा सके। पश्चिम बंगाल की मौजूदा विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के पास 184 सीटें हैं। कांग्रेस 42 विधायकों के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पास 40 विधायक हैं।

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