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बंद नहीं हुए विवाद के रास्ते

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही आम आदमी पार्टी (आप) नेताओं के बयान से साफ हो रहा है कि विवाद के नए रास्ते तलाश लिए जाएंगे।

Author नई दिल्ली, 4 जुलाई। | July 5, 2018 5:31 AM
Delhi AAP vs Centre Supreme Court Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली में चुनी हुई सरकार के पास असली ताकत है। (एक्सप्रेस फोटोः अमित मेहरा/पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही आम आदमी पार्टी (आप) नेताओं के बयान से साफ हो रहा है कि विवाद के नए रास्ते तलाश लिए जाएंगे। संविधान पीठ में केवल मामला संविधान की धारा 239 एए के तहत दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के अधिकार की व्याख्या करना था। अभी सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों के पीठ अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले के अधिकार और भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) पर अधिकार पर नियमित सुनवाई करके फैसला करेगा। उससे पहले ही दिल्ली के उपमुख्यमंत्री ने कह दिया कि अब अधिकारी पूरी तरह से दिल्ली सरकार के अधीन काम करेंगे। संविधान पीठ ने तो वही कहा है जो संविधान में लिखा है और जो दिल्ली में ‘आप’ की सरकार आने से पहले दिल्ली में होता था। ऐसा तब संभव है जब दोनों पक्ष सौहार्दपूर्ण माहौल में बातचीत से हर मतभेद को दूर करना चाहें।

15 सालों तक दिल्ली का शासन संभालने वालीं शीला दीक्षित ने कहा कि अगर मिल-बैठ कर काम किया जाए तो इन्हीं अधिकारों में अनेक बड़े काम हुए हैं और आगे भी हो सकते हैं। दिल्ली विधानसभा बनने के समय सचिव रहे एसके शर्मा बताते हैं कि विधानसभा की नियमावली बनाते समय सवाल आया कि आरक्षित विषयों (पुलिस, कानून व व्यवस्था और भूमि) पर विधानसभा में कैसे चर्चा होगी। तब के उपराज्यपाल ने कहा कि जैसे बाकी 63 गैर आरक्षित विषयों पर होगी। यह व्यवस्था तब से चली आ रही थी। अब मतभेद इस स्तर तक चले गए कि अभी के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने वह आदेश वापस ले लिए। दिल्ली के अधिकारी और कर्मचारी केंद्र के अधीन हैं। आला अधिकारियों की सालाना गोपनीय रिपोर्ट (जिससे उनकी प्रोन्नति होती है) उपराज्यपाल लिखते हैं। इसलिए गैर आरक्षित विषयों पर अंतिम फैसला दिल्ली मंत्रिमंडल का होने के बावजूद अधिकारियों पर पकड़ राजनिवास की ही रहेगी। 1993 में मुख्यमंत्री बने मदन लाल खुराना ने केंद्र सरकार और उपराज्यपाल से मिल कर गोपनीय रिपोर्ट खुद और मंत्रियों से लिखवानी शुरू की थी। तब उपराज्यपाल उस पर केवल अंतिम टिप्पणी करते थे। बाद में पूरी तरह से यह अधिकार उपराज्यपाल के पास चला गया। जब भी टकराव हुआ सरकार के अधिकार कम हुए।

पहले के मुख्यमंत्रियों ने दिल्ली सरकार के अधिकारों में बढ़ोतरी कराई लेकिन 2002 में गैर आरक्षित विषयों की फाइल राजनिवास न भेजने के एक पूर्व नौकरशाह रमेश चंद्रा की सलाह पर तब के उपराज्यपाल विजय कपूर ने गृह मंत्रालय से दो परिपत्र जारी करके विधानसभा में पेश होने वाले वित्तीय बिलों के प्रारूप की पहले केंद्र सरकार से मंजूरी लेने का आदेश जारी करवा दिया। इसके खिलाफ तब की शीला सरकार ने भी कुछ दिन आंदोलन चलाया। बाद में उसे स्वीकार करके शीला दीक्षित ने विजय कपूर के ही सहयोग से कई बड़े काम करवाए। उसी तरह केजरीवाल सरकार के अधिकारियों के तबादले और एसीबी से देश के हर मामले की जांच करवाने के फैसले के बाद 2015 में गृह मंत्रालय ने परिपत्र जारी करके साफ कर दिया कि अधिकारी केंद्र सरकार के अधीन हैं और एसीबी उपराज्यपाल के अधीन काम करेगा। अभी तो बड़ा सवाल यही है कि 2002 और 2015 के इन परिपत्रों को वापस लिए बिना न तो दिल्ली सरकार अधिकारियों का तबादला कर सकती है और न ही बिना केंद्र सरकार की इजाजत के विधानसभा में बिल पेश कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बावजूद ‘आप’ नेताओं ने कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का उनका आंदोलन जारी रहेगा तो क्या अब कहा जाएगा कि काम इसलिए नहीं हो पा रहे हैं कि क्योंकि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं हासिल है। दिल्ली हाई कोर्ट ने अगस्त 2016 में कहा था कि दिल्ली का उपराज्यपाल ही दिल्ली का शासक है। आज संविधान पीठ का फैसला उससे अलग है। लेकिन विवाद करने वालों को लिए दिल्ली की बहुशासन प्रणाली में अभी भी कई अवसर हैं। इसकी शुरुआती झलक तो फैसला आने के साथ ही ‘आप’ नेताओं के बयान में दिखने लगी कि वे सुप्रीम कोर्ट के सौहार्द के साथ शासन करने के सुझाव से उलट टकराव की बात करने लगे हैं। आने वाले दिनों में इसका असर सही मायने में दिखेगा।

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