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‘आप’ के खिलाफ क्यों राजनिवास!

नियमावली बनाने वाले और लंबे समय तक विधानसभा के सचिव रहे एसके शर्मा बताते हैं कि 1993 की नियमावली ही अब तक काम कर रही थी।

Author नई दिल्ली, 17 जून। | Published on: June 18, 2018 5:12 AM
2004 में केंद्र की कांग्रेस सरकार की ओर से पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग अस्वीकार होने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने सरकार के मौजूदा अधिकारों में मामूली बढ़ोतरी का प्रस्ताव दिया जिसके तहत डीडीए को दिल्ली सरकार के अधीन करना और पुलिस को तीन हिस्सों में बांटकर थाने व यातायात पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन करना था।

आइएएस अधिकारियों की कथित हड़ताल खत्म करवाने के नाम पर चल रहे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आंदोलन से यह साफ हो गया है कि दिल्ली में पांच साल पहले वाले हालात लौटना आसान नहीं है। 1993 में राजधानी में विधानसभा बनने और उपराज्यपाल के शासक होने के बावजूद दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने मुख्य सचिव समेत आला अधिकारियों की तैनाती से लेकर तबादले तक में अपनी मनमर्जी चलाकर यह जता दिया था कि दिल्ली में भी जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों का राज है। हालांकि इसमें ज्यादातर उपराज्यपालों ने सरकार का सहयोग ही किया। दिल्ली में विधानसभा बनने के बाद यह साफ हो गया था कि दिल्ली पुलिस और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) विधानसभा के दायरे में नहीं आएंगे, लेकिन तत्कालीन उपराज्यपाल पीके दवे की सहमति से इन विषयों को भी विधानसभा की नियमावली में शामिल किया गया।

दिल्ली के पास हैं सीमित अधिकार

नियमावली बनाने वाले और लंबे समय तक विधानसभा के सचिव रहे एसके शर्मा बताते हैं कि 1993 की नियमावली ही अब तक काम कर रही थी। दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की पहली सरकार में ही नियमों की अवहेलना होने लगी थी और सरकार ने जनलोकपाल विधेयक पेश करने से रोके जाने पर इस्तीफा दे दिया। फरवरी 2015 में दोबारा भारी बहुमत से दिल्ली की सत्ता में आई ‘आप’ ने फिर नियमों का उल्लंघन किया और तत्कालीन उपराज्यपाल नजीब जंग ने सरकार के कामकाज की जांच के लिए पूर्व सीएजी वीके शुंगलू की अगुआई में समिति बना दी। इसके बाद जंग ने इस्तीफा दे दिया और उनके बाद आए अनिल बैजल ने हर रोज की तनातनी के बीच आरक्षित विषयों पर विधानसभा में चर्चा कराने के पूर्व उपराज्यपाल के आदेश को वापस ले लिया। इस दौरान दिल्ली में पहली बार ऐसी लड़ाई दिखी, जिसमें दोनों पक्षों ने अपनी मर्यादा की सीमाएं लांघ दीं। इसी वजह से पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा कि केजरीवाल को संविधान ठीक से पढ़ना चाहिए। दिल्ली के पास सीमित अधिकार हैं और उन्हीं के बूते कई सरकारों ने दिल्ली के लोगों के लिए काम किया।

सचिवालय और राजनिवास में पहले था तालमेल

2004 में केंद्र की कांग्रेस सरकार की ओर से पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग अस्वीकार होने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने सरकार के मौजूदा अधिकारों में मामूली बढ़ोतरी का प्रस्ताव दिया जिसके तहत डीडीए को दिल्ली सरकार के अधीन करना और पुलिस को तीन हिस्सों में बांटकर थाने व यातायात पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन करना था। हालांकि शीला दीक्षित की इस मांग को भी नहीं माना गया, लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री को उपराज्यपाल के बराबर महत्त्व मिलता रहा। 1998 में जब शीला दीक्षित पहली बार दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं तो दिल्ली के मुख्य सचिव ओमेश सैगल थे। वे भाजपा की पसंद थे। उन्हें इस पद पर बनाए रखने के लिए भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस के भी अनेक नेता सक्रिय रहे लेकिन तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने यह कह कर पीएस भटनागर को मुख्य सचिव बनाने की स्वीकृति दे दी कि काम मुख्यमंत्री को लेना है। अधिकारियों के तबादलों या नियुक्ति का जो प्रस्ताव मुख्यमंत्री के यहां से राजनिवास भेजा जाता था, वही राजनिवास से स्वीकृत होकर आता था। अगर कुछ बदलाव भी हुए तो उसकी जानकारी सिर्फ मुख्यमंत्री कार्यालय और राजनिवास को ही रहती थी।

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