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बात मानो भाई!

जिस तरह के हालात पुरानी दिल्ली के थोक बाजार सदर की है उसे देखकर लग रहा है कि ये पूर्णबंदी को न्योता देकर ही मानेंगे।

Author नई दिल्‍ली | Updated: April 12, 2021 10:31 AM

जिस तरह के हालात पुरानी दिल्ली के थोक बाजार सदर की है उसे देखकर लग रहा है कि ये पूर्णबंदी को न्योता देकर ही मानेंगे। हालात के है कि यहां के व्यापारी भी आपस में बहस कर रहे हैं और अपने ही लोगों पर बिफर पड़ रहे हैं। भगवा दल से जुड़े रहने की पहचान वाले इस व्यापारी संगठन के नेता अपने दुकानदार भाइयों से यह कहते हुए सुने गए कि ‘फिर पैरवी लेकर मत आना, फिर न कहना की सरकार ने लॉकडाउन लगा दिए और सदर को संवेदनशील घोषित कर दिए’।

एक नेता ने तो यहां तक कहा-अभी दो ग्राहकों के लालच में रात्रि कफ्यू को हलके में ले रहे हो, कल एक-एक ग्राहक के लिए तरस जाओगे। यहां खड़े पुलिस वाले ने भी चेताया, कहा भाई- व्यापारी तो मौसम बैज्ञानिक होते हैं! लिहाजा अपने लोगों की तो बात तो मानो, बिना मास्क ग्राहकों को सामान न दो, उन्हें चलता करो!

विरोध अपना-अपना

दिल्ली में भाजपा में इधर कुछ ठीक नजर नहीं आ रहा है। यहां नेता अलग-अलग मोर्चे पर दिल्ली सरकार को घेर रहे हैं। जितने नेता उतने विरोध और सबका अपना-अपना विरोध। हालांकि दिल्ली में काबिज आम आदमी पार्टी के लिए तो यह असहनीय है ही लेकिन इससे दिल्ली भाजपा के अंदर पक रही खिचड़ी से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

इधर कुछ दिनों से दिल्ली सरकार के खिलाफ भाजपा ने कई तरह के मुद्दे अलग-अलग नेताओं के जरिए उठाए हैं। इस वजह से पार्टी तीन बड़े गुटों में बंटी नजर आ रही है। दिल्ली में कृषि, कोरोना और सिविल डिफेंस के मसले पर पार्टी के नेता अलग खड़े हो अपना-अपना विरोध कर रहे हैं। कार्यकर्ता भी हैरान हैं कि वे किस नेता के विरोध में शामिल हों।

कोरोना की मजाल

कोरोना आम लोगों को खूब शिकार बना रहा है लेकिन राजनीतिक मामलों में जैसे वह भी डर जाता है। उसकी क्या मजाल की चुनावों में या राजनीतिक दलों के विरोध प्रदर्शन में अपना डर कायम कर पाए। हां, अगर किसी आम आदमी का जमावड़ा होगा तो जरूर कोरोना का खौफ लोगों को डराता है। अब दिल्ली में ही देखिए।

यहां इन दिनों जिस रफ्तार से मामले सामने आ रहे हैं उससे एक बार फिर से आम जनता में बेचैनी बढ़ रही है। लेकिन एक दूसरे के खिलाफ विरोध कर रहे कांग्रेस, आप व भाजपा के कार्यकर्ताओं में इसका डर नजर नहीं आ रहा है। यही वजह है कि ना तो इन आंदोलनों में भीड़ के प्रावधानों का सख्ती से पालन हो रहा है और न ही नेता मास्क के नियमों का पालन कर रहे हैं। इन पर न सिविल डिफेंस की नजर है और ना ही अन्य सरकारी एजंसियों की।

मौन का दुश्मन मोबाइल

मोबाइल आज के समय में दखलअंदाजी का सबसे बड़ा हथियार हो गया है। कुछ भी हो जाए मोबाइल हाथ में हो तो शांति भंग होना पक्का है। इसका उदाहरण हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के एक विरोध कार्यक्रम में दिखा। कार्यक्रम में भाजपा नेताओं ने दिल्ली सरकार के खिलाफ एक मौन व्रत रखा था। इस मौन व्रत के मंच पर प्रदेश भाजपा के बडेÞ नेता और पदाधिकारी शामिल हुए। इरादा था मौन रहकर गांधीगिरी दिखाएंगे और दिल्ली सरकार को घेरेंगे।

लेकिन इस मोबाइल ने सारी योजना पर पानी फेर दिया। मौन व्रत शुरू होने से पहले ही नेताओं के मोबाइल की घंटी जो बजनी शुरू हुई यह कार्यक्रम के आखिर तक बजती रही। अब मोबाइल भी नेताजी का है तो सारा रंग मोबाइल की 24 घंटे टिनटिनाती घंटी से ही पड़ना है, इसलिए किसी ने इस भंग को बंद करना भी बेहतर नहीं समझा। बेदिल ने देखा कि मोबाइल फोन और आपसी कानाफुसी ने नेताओं के मौन व्रत में ही व्यवधान डाल दिया। थोड़ी देर ही में मौन व्रत छोड़कर मंच पर नेतागिरी चमकाने का नजारा साफ हो गया।

छूट की वजह!

औद्योगिक महानगर में बेलगाम होते कोरोना मामलों के चलते हाल ही में रात्रि कर्फ्यू लगाया गया है। लेकिन यहां कर्फ्यू का पालन भी पुलिस अपनी सहूलियत के अनुसार कराती है। एक तरफ तो दुकान, मॉल और रेस्तरां सायरन बजा बजाकर बंद किए जा रहे हैं लेकिन दूसरी ओर रेहड़ी पटरी दुकानों पर लगी भीड़ उनको दिखती ही नहीं। अब तो पुलिस से इस छूट की वजह भी पूछी जाने लगी है। कई व्यापारिक संगठन पुलिस से पूछ रहे हैं कि आखिर कोरोना के सभी निर्देशों का पालन करने के बावजूद उनके खिलाफ सख्ती हो रही है, जबकि पीसीआर सड़क पर गुजरते हुए फुटपाथ पर लगी भीड़ को नजरअंदाज कर देती है।

खाकी की बदनामी

दिल्ली में खाकी वर्दी को लेकर लोगों में काफी गलतफहमी पैदा होने लगी है। एक खाकी वर्दी दिल्ली पुलिस के पास है और दूसरी नागरिक सुरक्षा संगठन कर्मचारियों के पास। पिछले दिनों इसी के चलते हुए विवाद के बाद दिल्ली पुलिस अभियान चलाकर लोगों की गलतफहमी दूर कर रही है। दरअसल, दिल्ली में मास्क न लगाने पर चालान काटा जा रहा है। दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले नागरिक सुरक्षा संगठन के कर्मचारी शिद्दत से दिल्ली सरकार का खजाना भर रहे हैं वो भी खाकी वर्दी पहनकर।

पिछले दिनों किसी राहगीर से नागरिक सुरक्षा संगठन कर्मचारियों का झगड़ा हुआ तो यह मुद्दा बन गया। बदनामी हुई दिल्ली पुलिस की। ऐसे में सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले आला अधिकारियों ने निर्णय लिया कि अब खाकी को बदनाम नहीं होने दिया जाएगा, जिस विभाग के कर्मचारी खाकी को बदनाम कर रहे हैं। उस विभाग के बारे में दिल्ली की जनता को बताना होगा। इसलिए सोशल मीडिया पर अभियान चल रहा है कि हर वर्दी पहनने वाला दिल्ली पुलिस कर्मी नहीं। वैसे दिल्ली में आप सरकार के आने के बाद नागरिक सुरक्षा संगठन का काम कुछ ज्यादा बढ़ गया है।
-बेदिल

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