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नृत्यः कथक में कृष्णा और शिव की महिमा

भारत रत्न पंडित रविशंकर का आवास ‘रविशंकर केंद्र’ भारतीय शास्त्रीय कलाकारों के लिए एक तीर्थ की तरह है। पंडित रवि शंकर सालों से अपने मित्र जार्ज हैरिसन के जन्मदिन के अवसर पर यहां शास्त्रीय नृत्य व संगीत समारोह का आयोजन करते रहे थे।

भारत रत्न पंडित रविशंकर का आवास ‘रविशंकर केंद्र’ भारतीय शास्त्रीय कलाकारों के लिए एक तीर्थ की तरह है। पंडित रवि शंकर सालों से अपने मित्र जार्ज हैरिसन के जन्मदिन के अवसर पर यहां शास्त्रीय नृत्य व संगीत समारोह का आयोजन करते रहे थे। पंडित रविशंकर के निधन के बाद भी यह आयोजन जारी है। इसका श्रेय उनकी पत्नी सुकन्या राजन व पुत्री अनुष्का शंकर और प्रशंसकों को है।

चाणक्यपुरी स्थित रविशंकर केंद्र में एक ओर पंडित रविशंकर की मूर्ति स्थापित की गई है, वहीं दूसरी ओर पंडित रविशंकर को मिले भारत रत्न सम्मान, पद्मविभूषण व अन्य सम्मानों और विशेष पत्रों को प्रदर्शित किया गया है। बीच में आंगननुमा मंच बना हुआ है। मंच की ओर गणेश, कृष्ण और सरस्वती की मूर्तियां सजी हुई है। इसी से सटा ग्रीन रूम है।

तीन दिवसीय समारोह पंडित रविशंकर की 96वें और जार्ज हैरिसन के 73वें जन्मदिन के अवसर पर आयोजित था। इस समारोह में वरिष्ठ नृत्यांगना सोनल मानसिंह की उपस्थिति विशेष रही।

वरिष्ठ नृत्यांगना डा सोनल मानसिंह ने नाट्य कथा कृष्ण पेश किया। प्रस्तुति में संगीत और अभिनय की पूर्णता झलकीं। सोनल का मानना है कि नृत्य करने वाले के साथ सारा वातावरण नृत्य करता है। नटनागर कृष्ण के साथ ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, चंद्रमा, धरती, गगन सब नृत्य करते प्रतीत होते हैं। भगवान कृष्ण, राधा व गोपिकाओं का नृत्य परमानंद की पराकाष्ठा है।

समारोह की दूसरी शाम कथक नृत्य युगल अभिमन्यु लाल और विधा लाल की प्रस्तुति थी। उन्होंने हरिहर वंदना से नृत्य शुरू किया। रचना ‘वंशीधर पीनाकधर गंगाधर चंद्रमौल’ पर कृष्ण और शिव के रूप का विवेचन पेश किया गया। नृत्य में बारह व अठारह चक्कर, टुकड़े, परण और तिहाइयों का सुंदर प्रयोग किया गया था। उन्होंने तीन ताल में शुद्ध नृत्य पेश किया। इसकी शुरुआत आमद से हुई। अगले अंश में थाट पेश किया गया। सर्पण गति का प्रयोग करते हुए, उन्होंने नायिका के खड़े होने के अंदाज को दर्शाया।

उन्होंने उठान ‘दिग-धा-थेई-तत्-तत्-तत्’ के बोलों पर पलट व चक्कर का मोहक प्रयोग किया। उन्होंने रचना ‘धिर-किट-ता-थेई-थेई-थेई’ के बोल पर आधारित परण में पैर का काम पेश किया। उनकी प्रस्तुति में गोपूछा परण ‘किट-तक-गिन-तक-धूम-किट’ खास रही। इसमें उछाल के साथ चक्कर और पैर का दमदार काम पेश किया गया। परण ‘तिन-तिन-ता-गिन-नग-धलांग’ के बोलों पर भी दोनों ने पैर का काम दर्शाया।

अगले अंश में नर्तक अभिमन्यु लाल ने लयकारी में आरोह-अवरोह का अंदाज पेश किया। उन्होंने एक से सात अंकों की तिहाई को नृत्य में पिरोया। वहीं विधा ने सीधे और उल्टे चक्कर के प्रयोग को एक रचना में पेश किया। दोनों ने एक साथ ‘ना-धिंना’ के काम को प्रभावकारी अंदाज में प्रस्तुत किया।

प्रस्तुति के क्रम में कवि रसखान की रचना ‘मोर पखा सिर ऊपर राजे’ पर नृत्यांगना विधा ने भाव दर्शाया। राधिका को विरहिणी नायिका के तौर पर चित्रित किया गया। विधा ने नृत्य में कृष्ण की माखनचोरी व गोपिकाओं के वस्त्रहरण प्रसंगों को पेश किया। उन्होंने घंूघट, मृग, बांसुरी व मयूर की गतों का प्रयोग मनोरंजक अंदाज में किया।

नर्तक अभिमन्यु और नृत्यांगना विधा की जोड़ी ने जयपुर घराने की तकनीकी बारीकियों को अपने नृत्य में बखूबी तैयार किया है। उनके नृत्य में अपने घराने का काम असरदार तरीके से रूपायित होता है।

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