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डूटा पर भी सवाल उठाएंगे डीयू के तदर्थ शिक्षक!

शिक्षक दबी जुबान में कह रहे हैं कि डूटा उनकी लड़ाई ईमानदारी से नहीं लड़ रहा है। स्थायित्व की मांग को लेकर तदर्थ शिक्षकों ने एक बार फिर आंदोलन करने का फैसला किया है।

Author नई दिल्ली | April 30, 2017 2:59 AM
दिल्ली विश्वविद्यालय।

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के तदर्थ शिक्षकों का दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) से मोहभंग हो रहा है। ये शिक्षक दबी जुबान में कह रहे हैं कि डूटा उनकी लड़ाई ईमानदारी से नहीं लड़ रहा है। स्थायित्व की मांग को लेकर तदर्थ शिक्षकों ने एक बार फिर आंदोलन करने का फैसला किया है। इस कड़ी में जल्द ही कामकाज में ‘असहयोग’ को केंद्र में रखकर ‘चक्का जाम’ आंदोलन शुरू किया जाएगा। इस मुद्दे पर आमतौर पर एक स्वर में बोलने वाले विभिन्न शिक्षक गुटों में अंदर खाने भारी विरोध पनप रहा है। यह विरोध किसी भी क्षण फूट सकता है। इस मुद्दे पर ‘वाम बनाम अन्य’ की लड़ाई उभर सकती है। कई तदर्थ शिक्षकों ने कहा कि डूटा के कहने और करने में बहुत अंतर है। निश्चित तौर पर डूटा ने इस बाबत जिन आंदोलनों और विरोध के रोड मैपों की घोषणा सभाओं में की, उनमें से ज्यादा बेनतीजा रहीं। उनका मानना है कि डूटा अधिक ईमानदारी से उनके मुद्दे की लड़ाई को लड़ सकता था। इतना ही नहीं तदर्थ शिक्षकों ने यहां तक कहा कि अगले आंदोलन में डूटा को भी पार्टी बनाने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। उधर, डूटा का कहना है कि तदर्थ शिक्षकों की लड़ाई उनकी प्राथमिकता में रही है और इस मुद्दे को कैंपस में सड़क से लेकर ईसी से एसी तक में उठाया गया है। डूटा का कहना है कि तदर्थ शिक्षकों की लड़ाई जारी रहेगी।
इस मुद्दे को लेकर तदर्थ शिक्षक कई बार आंदोलन कर चुके हैं। बीते दिनों उन्होंने कला संकाय के गेट पर स्थायी व समायोजन की मांग को लेकर न केवल प्रदर्शन किया बल्कि भूख हड़ताल भी की। इस मौके पर डॉ. देवेश कुमार और मुकेश कुमार ने अदालतों के निर्णयों का हवाला देकर न्याय की मांग की। डॉ. अनिरुद्ध कुमार ने कहा कि तदर्थ शिक्षकों को गर्मियों का वेतन रोक लेना बहुत अमानवीय कार्य है। राजेश कुमार ने कहा कि यह मसला संसद तक उठा जा चुका है जिसका विश्वविद्यालय प्रशासन कोई संतोषप्रद उत्तर देने में असमर्थ रहा है।

राजधानी कॉलेज के रविंद्र के. दास ने कहा कि 4,500 तदर्थ शिक्षक जो स्थायी सेवाओं की सुविधाओं से लंबे समय से वंचित हैं। वह एकदम विपरीत परिस्थितियों में समान रूप से सेवा दे रहे हैं। उन्होंने पूछा कि जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) विश्वविद्यालय को पूरा अनुदान दे रहा है तो तदर्थ शिक्षकों को मूलभूत सुविधाओं से क्यों वंचित किया जा रहा है?
एक तदर्थ शिक्षक मुकेश कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक स्टेट प्राइवेट कॉलेज बनाम स्टेट आॅफ कर्नाटक व अन्य के मामले में तदर्थ शिक्षकों के नियमितीकरण की बात कही थी। यह आदेश सरकारी और निजी कॉलेजों के शिक्षकों के स्थायी नियोजन की बात करता है तथा इसकी प्रक्रिया को भी साफ करता है। इस फैसले में स्पष्ट किया गया है कि नियुक्ति के विभिन्न तरीके हो सकते हैं लेकिन इन तरीकों के अंतर के आधार पर किसी भी व्यक्ति को स्थायी सेवा के समान लाभ लेने से वंचित नहीं किया जा सकता है।

जो शिक्षक चयन कमिटी के आधार पर नियुक्त हुए हैं, उनकी सेवा को एक दिन के जबरदस्ती ब्रेक के कारण स्थायी नहीं मानना और उन्हें स्थायी सेवा की सुविधाओं से वंचित करना एकदम गलत है। इन्हें स्थायी किया जाना चाहिए यदि इसमें आरक्षण के नियमों का पालन कठिन होता है तो उन्हें नियोजन तक नहीं निकाला जा सकता है। तीन साल (जैसा कि निर्णय में दिया गया) से अधिक कार्य कर चुके लोगों को निश्चित उद्देश्य पूरा होने से पहले नौकरी से निकला नहीं जा सकता है। दूसरे शब्दों में तदर्थ को तदर्थ से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट हमारी न्याय व्यवस्था की सर्वोच्च संस्था है जिसका फैसला कानून बाध्य है। एक अन्य शिक्षक हिमांशु कुमार में तदर्थ शिक्षकों की सेवा को बिना उचित कारण के बीच में रोक देना एक गंभीर मामला है। यह व्यक्ति के करिअर के साथ खिलवाड़ है। 40-45 साल की उम्र में वह कहां जाए? मनोज कुमार ने प्रशासन की मनमर्जी और नियमों को सही तरीके से लागू नहीं करने को लेकर उनकी आलोचना की।

 

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