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सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में जज ने लिखा “मुकद्दर का सिकंदर” का एक गाना

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में लिखा है कि मृत्यु के बारे में एक सार्वभौमिक सत्य है जो पूरी दुनिया में लागू होता है। हर व्यक्ति स्वस्थ जीवन और सारी खुशियों के साथ जिंदगी जीना चाहता है, लेकिन जब व्यक्ति का अंत समय आता है तो जिंदगी में किसी को तकलीफ, दुख और दर्द नहीं चाहिए होता।

passive Euthanasia, Suprme court, passive Euthanasia is permissible, sc allows euthanasia, sc on passive euthanasia, इच्छा मृत्यु, हिन्दी न्यूज, Hindi news, news in Hindi, Jansattaतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फोटो सोर्स इंडियन एक्सप्रेस के लिए ताशी)

सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है। न्यायिक बिरादरी में अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले की खूब चर्चा हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक व्यक्ति को ‘सम्मान के साथ मरने का अधिकार’ है और अगर व्यक्ति डॉक्टरों के अनुसार लाइलाज बीमारी से ग्रस्त है तो वह पहले से जीवन रक्षक प्रणाली हटाने का प्रावधान कर अपनी मृत्यु की वसीयत (लिविंग विल) बना सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में लिखा है कि मृत्यु के बारे में एक सार्वभौमिक सत्य है जो पूरी दुनिया में लागू होता है। हर व्यक्ति स्वस्थ जीवन और सारी खुशियों के साथ जिंदगी जीना चाहता है, लेकिन जब व्यक्ति का अंत समय आता है तो जिंदगी में किसी को तकलीफ, दुख और दर्द नहीं चाहिए होता। इस संदेश को नीचे एक फिल्म के गाने की पंक्तियां सुंदरता से व्यक्त करती हैं।  ‘रोते हुए आते हैं सब हंसता हुआ जो जाएगा, वो मुक़द्दर का सिकंदर जानेमान कहलाएगा।’

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी

फैसले में आगे लिखा गया है कि जिंदगी नश्वर है, क्षणभंगूर है, यह एक कड़वी सच्चाई है कि कोई भी व्यक्ति, कोई भी सजीव हमेशा के लिए जिंदा नहीं रह सकता है। फैसले में महात्मा बुद्ध का भी जिक्र किया गया है। इसमें लिखा गया है कि युवा सिद्धार्थ ने जब पहली बार एक जीर्ण-शीर्ण वृद्ध व्यक्ति को देखा तो उनसे उनका दुख देखा नहीं गया और वह जीवन के सही अर्थ की खोज में निकल पड़े। सिद्धार्थ ने सत्य की खोज की और वह गौतम बुद्ध बन गये।

अदालत ने इस मामले में लाइलाज बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को अग्रिम निर्देश या ‘लिविंग विल’ बनाने की इजाजत देते हुए इसे लागू करने के लिए बेहद कड़े दिशानिर्देश जारी किए। लिविंग विल में एक व्यक्ति पहले यह बता सकता है कि उसके जीवन को वेंटिलेटर या कृत्रिम रक्षक प्रणाली के सहारे आगे नहीं बढ़ाया जाए। पीठ में शामिल न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी, न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने दिशानिर्देश जारी किए जिसमें यह बताया गया कि कौन इस ‘वसीयत’ को लागू कर सकता है और कब व कैसे मेडिकल टीम द्वारा पैसिव यूथेनेसिया की इजाजत दी जाएगी।

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