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हिमायत अभिव्यक्ति कीः विवादित उपन्यास ‘मीशा’ पर पाबंदी से कोर्ट का इनकार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- लेखक के कार्य कौशल का सम्मान हो

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार एक विवादित मलयालम पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने के लिए दायर याचिका खारिज कर दी। इस किताब में एक हिंदू महिला के मंदिर में जाने को कथित रूप से अपमानजनक तरीके से पेश किया गया था।

Author नई दिल्ली, 5 सितंबर। | September 6, 2018 3:52 AM
शीर्ष अदालत ने दो अगस्त को पुस्तकों पर प्रतिबंध के चलन की आलोचना करते हुए कहा था कि इससे विचारों का स्वतंत्र प्रवाह बाधित होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार एक विवादित मलयालम पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने के लिए दायर याचिका खारिज कर दी। इस किताब में एक हिंदू महिला के मंदिर में जाने को कथित रूप से अपमानजनक तरीके से पेश किया गया था। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाइ चंद्रचूड़ के पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि किसी लेखक के कार्य कौशल का सम्मान किया जाना चाहिए और पुस्तक को अंशों की बजाय संपूर्णता में पढ़ा जाना चाहिए। पीठ ने दिल्ली निवासी एन राधाकृष्णन की याचिका पर अपने फैसले में कहा कि किसी पुस्तक के बारे में अपने दृष्टिकोण को सेंसरशिप के लिए कानूनी दायरे में नहीं लाना चाहिए। पीठ ने कहा कि लेखक को अपने शब्दों से उसी तरह से खेलने की अनुमति दी जानी चाहिए जैसे एक चित्रकार रंगों से खेलता है। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में लेखक एस हरीश के मलयालम उपन्यास ‘मीशा’ (मूंछ) के कुछ अंश हटाने का अनुरोध किया था।

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शीर्ष अदालत ने दो अगस्त को पुस्तकों पर प्रतिबंध के चलन की आलोचना करते हुए कहा था कि इससे विचारों का स्वतंत्र प्रवाह बाधित होता है। अदालत ने यह भी कहा था कि साहित्यिक कार्य उसी समय प्रतिबंधित किया जा सकता है जब वह भारतीय दंड संहिता की धारा 292 जैसे किसी कानून का उल्लंघन करता हो। राधाकृष्णन ने याचिका में आरोप लगाया था कि पुस्तक में मंदिरों में पूजा कराने वाले ब्राह्मणों के बारे में की गई चुनिंदा टिप्पणियां ‘जातीय आक्षेप’ जैसी हैं। इसमें यह भी आरोप लगाया गया था कि केरल सरकार ने इस पुस्तक का प्रकाशन, इसकी ऑनलाइन बिक्री और उपन्यास की उपलब्धता रोकने के लिए उचित कदम नहीं उठाए। केंद्र और राज्य सरकार दोनों ने ही पुस्तक पर प्रतिबंध के लिए दायर याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि एस हरीश के इससे पहले मलयालम उपन्यास के कुछ अंशों पर दक्षिणपंथी संगठनों के उग्र तेवर और धमकियों के बाद लेखक ने इसे वापस लेने का एलान कर दिया था।

अदालत ने कहा

1. किसी लेखक के कार्य कौशल का सम्मान किया जाना चाहिए और पुस्तक को अंशों की बजाय संपूर्णता में पढ़ा जाना चाहिए।

2. पीठ ने कहा कि लेखक को अपने शब्दों से उसी तरह से खेलने की अनुमति दी जानी चाहिए जैसे एक चित्रकार रंगों से खेलता है।

3. याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में लेखक एस हरीश के मलयालम उपन्यास ‘मीशा’ के कुछ अंश हटाने का अनुरोध किया था।

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