सरकारी वकील को सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ा- टेलीफोन जानते हो? 19वीं सदी में बनाया गया था - Supreme court justice Chelameswar lambasts a public prosecutor of jharkhand High Court says use telephone and email hindi news - Jansatta
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सरकारी वकील को सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ा- टेलीफोन जानते हो? 19वीं सदी में बनाया गया था

जस्टिस कौल ने कहा, "जिस उपकरण को टेलिफोन कहा जाता है उससे आपको कुछ सेकेंड में ही निर्देश मिल सकता है, आप बाहर जाइए, केस से जुड़े सचिव को फोन कीजिए, और कुछ ही मिनट के बाद हमें बता दीजिए, लेकिन अब भी आप वक्त मांग रहे हैं ताकि निर्देश खुद चलकर आपके पास आ जाए, हमें आश्चर्य है कि कहीं आप ये ना पूछने लगें कि टेलिफोन का इस्तेमाल कैसे किया जाता है।"

सुप्रीम कोर्ट के जज चेलामेश्वर।

सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों के रवैये को देखकर जज जस्ती चेलामेश्वर और जज मदन बी लोकुर भड़क उठे। हाल ही में जज चेलामेश्वर और जज मदन बी लोकूर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर चर्चा में आए थे। पिछले दो दिनों के मामलों को देखकर सुप्रीम कोर्ट को सरकारी अधिकारियों को समझाने के लिए मजबूर होना पड़ा कि विज्ञान ने इंसान को टेलिफोन और ईमेल नाम की दो बहुत ही जरूरी चीजें दी हैं। मंगलवार (6 फरवरी) को एक सुनवाई के दौरान जस्टिस जे चेलामेश्वर और संजय के कौल की एक बेंच ने टिप्पणी की, “19वीं सदी में ग्राहम बेल ने एक मशीन बनाई थी, 130 सालों में इस मशीन ने काफी विकास किया है, इसे टेलिफोन कहते हैं।” खंडपीठ ने यह टिप्पणी तब की जब एक सरकारी वकील एक केस के सिलसिले में दो सप्ताह गुजर जाने के बाद भी निर्देश लेने के लिए और वक्त मांग रहा था। दरअसल एक केस के सिलसिले में तपेश कुमार सिंह झारखंड हाई कोर्ट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उन्होंने अदालत से कहा कि उन्होंने इस केस में राज्य सरकार से व्यक्तिगत रूप से निर्देश लेना चाहा था, लेकिन ऐसा लगता है कि इसमें और वक्त की जरूरत है।

जस्टिस चेलामेश्वर ने इसके जवाब में कहा, “पिछली सुनवाई के दौरान हमनें राज्य सरकार को जवाब देने के लिए दो हफ्ते तक केस की सुनवाई टाल दी थी. आपको निर्देश लेने के लिए कितना और वक्त चाहिए, एक साल या दो साल ?” इसके बाद जस्टिस कौल ने कहा, “जिस उपकरण को टेलिफोन कहा जाता है उससे आपको कुछ सेकेंड में ही निर्देश मिल सकता है, आप बाहर जाइए, केस से जुड़े सचिव को फोन कीजिए, और कुछ ही मिनट के बाद हमें बता दीजिए, लेकिन अब भी आप वक्त मांग रहे हैं ताकि निर्देश खुद चलकर आपके पास आ जाए, हमें आश्चर्य है कि कहीं आप ये ना पूछने लगें कि टेलिफोन का इस्तेमाल कैसे किया जाता है।”

बुधवार को भी जस्टिस मदन बी लोकूर और जस्टिस दीपक गुप्ता के सामने ऐसे ही हालत पैदा हुए थे। सुप्रीम कोर्ट की यह बेंच देश भर में विधवा महिलाओं की हालत को सुधारने से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान केन्द्र, राज्य सरकार और कई संगठन से जुड़े वकील कहने लगे कि उन्हें अबतक केस से जुड़े दस्तावेज ही नहीं मिले हैं। वकीलों की बात सुनकर जस्टिस लोकूर ने कहा कि वकील ई मेल के जरिये दस्तावेज क्यों नहीं मंगाते हैं। उन्होंने कहास “आप डिजीटाइजेशन की बात करते हैं और आप ईमेल भी इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं, आप यह क्यों चाहते हैं कि डाक के जरिये आपको दस्तावेज भेजे जाएं फिर हर बार ये मसला उठाते हैं कि आपको पेपर नहीं मिले हैं।” उन्होंने कहा कि आगे से ऐसे तर्क को तवज्जो नहीं दी जाएगी। उन्होंने इस बावत एक आदेश जारी करते हुए कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि सारे दो पक्षों के बीच सारे पत्राचार ई मेल के जरिये किये जाएं ताकि कोई संशय ना रहे और दस्तावेजों के खोने के हालात भी पैदा ना हो।”

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