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सुप्रीम कोर्ट: दिल्ली सरकार के पास कुछ शक्तियां होनी चाहिए

उपराज्यपाल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं और सभी प्रशासनिक फैसलों के लिए उनकी पूर्व रजामंदी की आवश्यकता है।

Author नई दिल्ली | December 15, 2016 04:50 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (File Photo)

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि दिल्ली सरकार के पास कुछ शक्तियां होनी चाहिए अन्यथा वह काम नहीं कर सकेगी। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ आप सरकार की अपील को अंतिम निस्तारण के लिए सूचीबद्ध करने के दौरान की जिसमें उपराज्यपाल को राष्ट्रीय राजधानी का प्रशासनिक प्रमुख बताया गया था।
न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति एएम सप्रे के पीठ ने कहा, ‘दिल्ली में निर्वाचित सरकार के पास कुछ शक्तियां होनी चाहिए अन्यथा यह काम नहीं कर सकेगी। मामले पर तेजी से फैसला करने की जरूरत है’। पीठ ने मामले के अंतिम निस्तारण के लिए 18 जनवरी की तारीख तय की। पीठ ने कहा कि चूंकि वह मामले पर विस्तार से सुनवाई करेगी और फिलहाल विभिन्न अंतरिम आवेदनों पर कोई अंतिम आदेश नहीं देगी।आप सरकार की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम ने कहा कि वे हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दे रहे हैं जिसमें कहा गया था कि उपराज्यपाल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं और सभी प्रशासनिक फैसलों के लिए उनकी पूर्व रजामंदी की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ने कहा है कि मंत्रिपरिषद की सलाह उपराज्यपाल के लिए बाध्यकारी नहीं है। सुब्रह्मण्यम ने कहा, ‘दिल्ली में निर्वाचित सरकार मुख्य सचिव की नियुक्ति नहीं कर सकती है या खुद से चतुर्थ श्रेणी के अधिकारी की भी नियुक्ति नहीं कर सकती है’। उन्होंने कहा कि मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के तहत मंत्रिपरिषद को उपराज्यपाल को परामर्श देने की आवश्यकता है। सुब्रह्मण्यम ने कहा कि संविधान कहता है कि अगर किसी मुद्दे पर राय में मतभेद है तो मामले को राष्ट्रपति के पास भेजा जा सकता है। अंतरिम राहत के तौर पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत से दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद आप सरकार की 400 फाइलों का निरीक्षण करने के लिए तीन सदस्यीय शुंगलू समिति गठित करने के उपराज्यपाल के फैसले पर रोक लगाने की मांग की। शुंगलू समिति ने पिछले महीने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। उपराज्यपाल नजीब जंग ने पिछली 30 अगस्त को आप सरकार द्वारा किए गए फैसलों पर 400 से अधिक फाइलों का परीक्षण करने के लिए शुंगलू समिति का गठन किया था। समिति की अध्यक्षता पूर्व सीएजी वीके शुंगलू ने की थी। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एन गोपालस्वामी और पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त प्रदीप कुमार इसके सदस्य थे।

उन्होंने कहा, ‘सरकार द्वारा किए जाने वाले सभी फैसले को अनिवार्य रूप से उपराज्यपाल को भेजने पर भी रोक लगाई जानी चाहिए और उपराज्यपाल को निर्देश दिया जाना चाहिए कि वह एनसीटी अधिनियम के प्रावधानों का सख्ती से पालन करें’। सॉलीसीटर जनरल रंजीत कुमार ने कहा कि कोई भी नोटिस नहीं जारी किया गया है और इसलिए दिल्ली सरकार की अपीलों पर कोई जवाब नहीं दाखिल किया गया है।पीठ ने कहा कि चूंकि मामले को अंतिम निस्तारण के लिए सूचीबद्ध किया जा रहा है इसलिए फिलहाल कोई जवाब देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दलील के दौरान सबकुछ उठाया जा सकता है। सुब्रह्मण्यम ने तब कहा कि अंतरिम उपाय के तौर पर दिल्ली सरकार द्वारा उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त वकीलों को पीठ के समक्ष काम करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

 

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