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दिल्ली: आपदा के लिए कितने तैयार हैं अस्पताल

डेंगू या चिकनगुनिया के मरीजों को अगर कोई और संक्रमण हो जाए या उनकी हालत बिगड़ने लगे तो उन्हें आइसीयू की जरूरत पड़ सकती है।

Author नई दिल्ली | September 20, 2016 2:51 AM
दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती डेंगू से पीड़ित मरीज। (फाइल फोटो पीटीआई)

डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया के खतरे से जूझ रही दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में साधारण इलाज तो किसी तरह मिल जा रहा है, लेकिन गहन चिकित्सा के इंतजाम नाकाफी हैं। ऊंट के मुंह में जीरा की तर्ज पर काम कर रहे एक-दो आइसीयू के बूते किसी गंभीर स्थिति से कैसे निपटा जाएगा, यह समझ से परे है। डेंगू या चिकनगुनिया जैसी अपेक्षाकृत कम घातक बीमारी से ही पस्त राजधानी अगर साधारण सी बीमारी का बोझ भी नहीं उठा पा रही है तो अगर कोई घातक बीमारी फैली तो क्या होगा? कई अस्पतालों के आला अधिकारी भी मानते हैं कि सरकार के पास किसी भी स्थिति से निपटने की व्यापक व समुचित योजना नहीं है। अमूमन हर बड़े अस्पताल में सामान्य दिनों में भी आइसीयू या वेंटीलेटर नहीं मिलने की वजह से मरीज दूसरे अस्पतालों में रेफर किए जाते हैं।

राजधानी के अस्पतालों में डेंगू व चिकनगुनिया के मरीजों का आना जारी है। कई तरह की बहसों के बीच सरकार से लेकर विशेषज्ञ तक सभी यह कह रहे हंै कि जब तक स्थिति ठीक रहे, लोग अस्पताल में भर्ती न हों ,तबीयत ज्यादा खराब होने पर ही अस्पताल में भर्ती हों। लोग इसका पालन कर भी रहे हैं, लेकिन हालत बिगड़ने पर अगर वे अस्पतालों में पहुंच रहे हैं तो उनके लिए क्या इंतजाम हैं, इसकी बानगी गहन चिकित्सा कक्षों (आइसीयू) की उपलब्धता में देखी जा सकती है।  कई बड़े अस्पतालों में भी आइसीयू के इंतजाम कितने खराब हैं, यह केंद्र सरकार के सबसे बड़े अस्पताल सफदरजंग को देखकर ही पता चल जाता है। यह सबसे अधिक भीड़भाड़ वाला अस्पताल माना जाता है। एम्स की इमरजंसी तक में आने वाले आधे से ज्यादा मरीज इस अस्पताल में भेज दिए जाते हैं। सामान्य दिनों में भी सफदरजंग अस्पताल के इमरजंसी वार्ड में रोजाना कम से कम 1000 मरीज आते हैं। और इसके तमाम बाह्य रोगी विभागों (ओपीडी) में आने वाले मरीजों की रोजाना की तादाद कम से कम 10000 है, लेकिन अस्पताल के आइसीयू में बिस्तरों की कुल संख्या केवल 16 है। इसलिए मरीजों की संख्या बढ़ने से सामान्य दिनों में भी वेंटीलेटर न मिलने के कारण मरीजों को दूसरे अस्पतालों में भेज दिया जाता है।

सूत्रों के मुताबिक, यहां भर्ती मरीजों के आॅपरेशन भी कई बार आइसीयू खाली न होने के कारण टालने पड़ते हैं। डेंगू या चिकनगुनिया के मरीजों को अगर कोई और संक्रमण हो जाए या उनकी हालत बिगड़ने लगे तो उन्हें आइसीयू की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि अस्पताल कितनी मदद कर पाएगा। सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ एके राय का कहना है कि यह सच है कि अस्पतालों पर मरीजों की अधिक संख्या का भारी दबाव है। इस लिहाज से जरूरत की तमाम सुविधाएं कम पड़ जाती हैं, लेकिन हम किसी को मना नहीं करते। जो संसाधन हैं उनमें अधिकतम को सेवाएं देते हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ हम बेहतरी की ओर बढ़ रहे हैं जल्द ही हमारा नया भवन शुरू होने वाला है, जहां हम आइसीयू के 70 बिस्तरों की सेवा शुरू कर पाएंगे।

उधर दिल्ली सरकार के सबसे बड़े सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल जीबी पंत का जो आलम है उस पर एक नजर डालें, तो पता चलता है कि अस्पताल में जनरल मेडिसिन विभाग तक नहीं है। जबकि किसी भी बीमारी के लिए जनरल फिजीशियन की सबसे अधिक जरूरत होती है। इस अस्पताल के पास अपना इमरजंसी वार्ड तक नहीं है। इसकी एलएनजेपी अस्पताल के साथ साझा इमरजंसी है। कुल 650 बिस्तरों वाले इस अस्पताल में सीधे भर्ती होने के लिए दिल का मरीज होना जरूरी है, या फिर एलएनजेपी के इमरजंसी वार्ड से या दूसरे अस्पताल से रेफर कराना पड़ता है। कहने को यहां मेडिकल आॅफिसर के 14 आबंटित पद हैं। इनमें से 11 मेडिकल आॅफिसर भर्ती हैं, लेकिन अधिकतम को यहां के प्रशासनिक कामों में लगाया गया है। वे साधारण बुखार वगैरह या डेंगू-चिकनुनिया के मरीज नहीं देखते। यहां तक कि अगर कर्मचारियों को भी डेंगू या चिकगुनिया हो जाए तो उनको दूसरे अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं क्योंकि यहां इलाज नहीं मिल पाता।

 

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