ताज़ा खबर
 

शुंगलू कमेटी : संकट में आई केजरीवाल की सरकार

उपराज्यपाल ने बढ़ाया तीन महीने के लिए बनी शुंगलू कमेटी का कार्यकाल।

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल। (ANI Photo)

पिछल डेढ़ साल के आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार के फैसलों की जांच कर रही शुंगलू कमेटी ने सरकार को बड़े संकट में डाल दिया है। तीन महीने के लिए बनी इस कमेटी का कार्यकाल उपराज्यपाल ने दिसंबर के पहले हफ्ते तक बढ़ा दिया है। इस कमेटी से जुड़ी जो जानकारी सामने आ रही हैं वह सरकार के लिए मुसीबत साबित होने वाली है। करीब 400 फाइलों की जांच कर रही कमेटी ने अब तक जिन फाइलों को देखा है, उनमें आर्थिक और आपराधिक दोनों गड़बड़ियां मिल रही हैं। जो फैसले राजनीतिक रूप से हुए हैं उस पर तो अलग तरह से जिम्मेदारी तय की जाने वाली है लेकिन जो अधिकारी फैसले में शामिल रहे हैं, उनकी तो शामत आ गई है। इसी के चलते अरविंद केजरीवाल सरकार की मंत्रिपरिषद ने शुंगलू कमेटी को ही भंग करने की सिफारिश कर दी जिसे उपराज्यपाल ने नहीं माना। उन्होंने अनेक मामलों में सीबीआइ जांच करवाने की सिफारिश किए जाने के संकेत दिए हैं।

यह भी तय सा लग रहा है कि समिति की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट भेजी जाएगी। संभव है इसे सार्वजनिक भी किया जाए। यह भी संभव है कि सरकार चलाने का अक्षम मान कर उनके खिलाफ चुनाव लड़ने पर स्थाई पावंदी की सिफारिश न हो जाए। जांच शुरू होने के साथ ही अफसर इन आप नेताओं को महत्व देना लगभग बंद कर चुके हैं।चौतरफा संकट झेल रही केजरीवाल सरकार इस समिति से सबसे ज्यादा परेशान लग रही है। बिना कानून बनाए संसदीय सचिव बनाए गए 21 विधायकों के मामला चुनाव आयोग में अंतिम स्थिति में है किसी भी दिन उस पर फैसला आ जाएगा। उन विधायकों की सदस्यता बचाने की कोशिश में शुक्रवार को राष्ट्रपति भवन पहुंचे आप नेताओं को इससे ज्यादा झटका लगा कि राष्ट्रपति ने एक दूसरे युवा वकील विभोर आनंद की रोगी कल्याण समिति के अध्यक्ष बनाए गए 27 विधायकों की सदस्यता समाप्त करने वाली याचिका को चुनाव आयोग को भेज दिया।

जाब विधानसभा चुनावों से पहले अरविंद केजरीवाल और कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच हुई ज़ुबानी जंग

संयोग से 70 सदस्यों वाली विधानसभा में 21 विधायकों के संसदीय सचिव बनने के विवाद में अगर उन विधायकों की सदस्यता चली गई तो उससे दिल्ली सरकार के सेहत पर कोई अंतर नहीं आएगा। उसे 70 सदस्यों वाली विधानसभा में 67 सीटों का बहुमत है। वह तो इसलिए परेशान थी कि अगर पंजाब आदि राज्यों से पहले दिल्ली में इन 21 सीटों को खाली मानकर चुनाव आयोग चुनाव करवा दे और उस चुनाव में उसे सभी सीटें नहीं मिली तो पंजाब में उसकी फजीहत हो जाएगी। अब 27 सीटों का मामला आने के बाद तो उसके पैरों तले जमान खिसक गई है। संयोग से इस 27 की सूची में 11 वे भी विधायक हैं जो संसदीय सचिव की सूची में भी हैं। यानि 16 अन्य विधायक भी इस बार सदस्यता जाने की समस्या से धिर सकते हैं। 37 विधायकों की सदस्यता खत्म होने के बाद तो सरकार बचनी कठिन हो जाएगी। इन 37 के अलावा कई बागी विधायकों के चलते पहले से ही आप में विद्रोह हो रखा है।

चार अगस्त को हाई कोर्ट ने दिल्ली के अधिकारों पर अपना फैसला सुनाया। उसके तहत दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है और उपराज्यपाल ही इसके प्रशासक हैं। इस फैसले के बाद उपराज्यपाल ने एक प्रशासनिक आदेश से पूर्व सीएजी (नियंत्रक, महालेखा परीक्षक) वीके शुंगलू की अध्यक्षता में तीन सदस्यों की एक समिति बनाई। उसके बाकी दो सदस्य-पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी और पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त प्रदीप कुमार हैं। समिति को आप सरकार के डेÞढ साल के कार्यकाल की सभी फाइलों की जांच सात बिंदुओं पर करना थी। जिनमें मंजूरी के लिए नियमों का पालन, उलंघन अनजाने में हुआ है या जानबूझकर, इसके लिए जिम्मेदार कौन, मामला अपराधिक है या आर्थिक, अगर वित्तीय है तो किससे वसूली होगी, क्या जांच किसी दूसरी एजंसी से करवाना जरूरी है आदि।

आप के नेता चाहे जो आरोप लगाएं लेकिन समिति के तीनों अधिकारियों की ईमानदारी और निष्ठा पर सवाल विरोधी भी नहीं उठा सकते हैं। दिल्ली सरकार के एक वरिष्ट अधिकारी बताते हैं कि उपराज्यपाल को संविधान के तहत ही एक प्रशासनिक आदेश से समिति बनाने का अधिकार है। वह जिसे योग्य मानेंगे उससे जांच करवा सकते हैं। जांच रिपोर्ट आने पर उसे सार्वजनिक करना या उस पर कार्रवाई करवा उनका विशेषाधिकार है। कार्रवाई तो रिपोर्ट आने के बाद होगी लेकिन दिल्ली सरकार के अफसर तो आप नेताओं से दूरी तो अभी से बनाने लगे हैं।अधिकारियों को जांच शुरू होते ही यह संदेश चला गया कि अब दिल्ली सरकार के हाथ में कुछ नहीं है। समिति को फाइलों की जांच में हर स्तर पर किए गए फैसलों में भारी अनियमितता मिली है। राजनीति में आने के साथ ही खबरों में बने रहने का सबसे बेहतर तरीका अपनाने वाले आप नेताओं के दावे चाहे जो हों लेकिन अभी से ज्यादा बेवस वे पहले कभी नहीं थे।

 

 

Next Stories
1 दिल्ली: इस दिवाली सांसों में गया ज्यादा जहर
2 दिल्ली: बेटी से बलात्कार एवं उसे गर्भवती बनाने के जुर्म एक व्यक्ति को उम्रकैद
3 मिस्त्री को टाटा के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद रतन टाटा और साइरस ने की थी पीएम मोदी से मुलाकात
यह पढ़ा क्या?
X