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नोटबंदी से यौनकर्मियों की आजीविका पर भी असर

सेक्सवर्कर अपनी बचत के बारे में अपने वेश्यालय के मालिकों को भी नहीं बता सकते क्योंकि इससे उन्हें भविष्य में अपनी आय कम होने का डर रहता है।

Author नई दिल्ली | November 22, 2016 4:36 AM
सेक्सवर्कर।

सरकार के हालिया बड़े मूल्य के नोट चलन से बाहर करने के फैसले से कुछ अन्य वर्गों के साथ ही सेक्सवर्कर की आजीविका भी बड़े पैमाने पर प्रभावित हुई है। यह वर्ग भारतीय समाज का वह निचला तबका है जिसे वास्तव में समाज का हिस्सा ही नहीं माना जाता।  पुराने नोट चलन से बंद किए जाने के बाद दिल्ली के जीबी रोड रेड लाइट एरिया में ग्राहकों की आवक कम होने के साथ-साथ सेक्सवर्कर्स की जमा की गई पूंजी अब किसी काम की नहीं है। यहां एक वेश्यालय में सेक्सवर्कर के तौर पर काम करने वाली रेशमा (बदला नाम) ने कहा कि लंबे समय से अपने ग्राहकों से बख्शीश में मिलने वाले नोटों को वह अलग से जमा कर रखती हैं। अभी उनकी बचत में पांच हजार रुपए के बड़े मूल्य के नोट भी हैं। अब वह इस बचत का क्या करे, यह उसकी समझ से बाहर है। उनके पास कोई बैंक खाता भी नहीं है।

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सेक्सवर्कर्स के अधिकारों के लिए काम करने वाले गैरसरकारी संगठन आॅल इंडिया नेटवर्क आॅफ सेक्सवर्कर्स (एआइएनएसडब्लू) की अध्यक्ष कुसुम ने कहा कि यह समस्या यहां काम करने वाली करीब 50 फीसद सेक्सवर्कर्स की हैं। यहां अधिकतर के पास बैंक खाता नहीं है। इसलिए वह अपनी इस बचत के उपयोग को लेकर असमंजस में हैं। कुसुम ने कहा कि सेक्सवर्कर अपनी बचत के बारे में अपने वेश्यालय के मालिकों को भी नहीं बता सकते क्योंकि इससे उन्हें भविष्य में अपनी आय कम होने का डर रहता है। वह अपने इन 500 और 1000 के नोटों को चाय की दुकान चलाने वालों इत्यादि के माध्यम से खपा रही हैं। उन्होंने बताया कि अभी 15 दिन में वेश्यालय मालिकों से मिलने वाले अपने मेहनताने को या तो वह छोटे मूल्य के नोटों में ले रही हैं या उसे बाद में लेने के वादे पर छोड़ दे रही हैं। लेकिन ग्राहकों से मिलने वाली बख्शीश का उपयोग जो वह रोजमर्रा के कामकाजों, दवाओं इत्यादि को खरीदने में करती थीं, उसमें उन्हें काफी दिक्कत आ रही है। एक और सेक्सवर्कर ने बताया कि बैंक खाता नहीं होने की वजह से उन्हें अपने नोटों को बदलने में दिक्कत हो रही है। उसने बताया कि उनकी कुछ साथियों के खाते गांवों में हैं और अब अपनी बचत के नोटों का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें उन्हीं खातों का उपयोग करना पड़ रहा है।

इसके अलावा एक और समस्या नए बैंक खाते नहीं खुलवा पाने की है क्योंकि उन जैसी अधिकतर महिलाओं के पास ‘ग्राहक को जानो’ नियम (केवाइसी) की पूर्ति करने के लिए मान्य दस्तावेज ही नहीं है।नोटबंदी से रेड लाइट एरिया में ग्राहकों की आवक कम होने से भी सेक्सवर्कर्स की आजीविका पर फर्क पड़ा है। एआइएनएसडब्लू की कुसुम ने बताया कि दिल्ली के रेड लाइट एरिया में आने वाले अधिकतर ग्राहक आसपास के राज्यों मसलन हरियाणा, उत्तर प्रदेश के नजदीकी जिलों से आने वाले छोटे कामकाज करने वाले लोग हैं। अब नोटबंदी के बाद उनके स्वयं के रोजमर्रा के खर्च की दिक्कतें हैं तो वे यहां क्यों आएंगे?

 

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