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रुख भांपते नेता

जमीनी नेता वही है जो हवा का रुख पहले ही भांप ले!

रुख भांपते नेता

जमीनी नेता वही है जो हवा का रुख पहले ही भांप ले! तब उसे ज्यादा पछतावा नहीं होता। राजेंद्रनगर विधानसभा सीट के उपचुनाव में कुछ ऐसा ही होता दिखा। यहां चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों में तीन बड़ी पार्टी से थे। तीनों अपने हिसाब से एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए थे, लेकिन जमीन पर हवा कुछ और ही बह रही थी। इसका अंदाजा एक उम्मीदवार को हो गया। इसलिए प्रचार भी उसी अंदाज में दिखा। पदयात्रा और जनसंपर्क दिन भर होता रहा लेकिन जानकारी तभी मिलती जब आप लेना चाहें, वरना ज्यादा पैसा न तो प्रचार पर खर्च किया गया और न ही रोड शो पर। बाकी बड़ा-बड़ा जुलूस निकालते रहे और अपने रोड शो को ‘सितारों’ से सजाते रहे। किसी ने ठीक ही कहा- कोई पहले ही हार का अंदाजा लगाकर बैठा हो तो क्या कर सकते हैं! दूसरे ने टिप्पणी की कि जब कार्यकर्ताओं की भीड़ बड़े नेता ने बटोर ली तो छोटे नेताओं को प्रचार के लिए लोग कहां से मिलते।

आराम का काम

नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद व्यक्ति क्या करते हैं। ज्यादा से ज्यादा आराम या फिर अपना कोई शौकिया काम। लेकिन दिल्ली के नगर निगम के पूर्व कर्मचारी आजकल वाट्सऐप ग्रुप बनाकर उसमें अपनी ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं। यह ज्ञान कर्मचारियों को दिया जा रहा है। दरअसल, जब से नगर निगम का एकीकरण हुआ तो इसके कुछ फायदे और नुकसान भी धीरे-धीरे सामने आ रहे हंै। लेकिन वाट्सऐप ग्रुप पर सबसे ज्यादा नुकसान ही सामने आ रहे हैं। बेदिल को एक परेशान कर्मचारी ने बताया कि सेवानिवृत्त कर्मचारी ग्रुप के एडमिन बने हैं और वे ही निगम एकीकरण की जानकारी दे रहे हैं। बेदिल को पता चला कि साहब सुबह से ही फोन लेकर बैठ जाते हैं और फिर संदेश रुकने का नाम नहीं लेता।

मुखिया से मनमुटाव

नई दिल्ली नगर पालिका परिषद में इन दिनों शह मात का खेल चल रहा है। दरअसल, दिल्ली की सत्ता संभालने वाले मुखिया ही इसके प्रमुख होते हैं और दूसरी तरफ नगर निगम की कुर्सी पर देश की सत्ता संभालने वाली पार्टी के हाथ में है। ऐसे में दोनों में टकराव न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। यह होता दिखता भी है। अभी हाल ही एक वाकया नई दिल्ली नगरपालिका परिषद में दिखा। यहां बड़ी पार्टी से ऐसे नेता भेजे गएं जो निगम के मुखिया की किरकिरी कराने में जरा भी नहीं चूकते। रोज आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहता है। मुखिया से मनमुटाव तो विपक्षी पार्टी होने के नाते होगा ही लेकिन यह इस कदर बढ़ गया है कि परिषद की बैठक के बाद एक सदस्य ने मुखिया से ही इस्तीफा मांग लिया। बेदिल को किसी ने बताया कि मुखिया के लिए यह नया नहीं है।

वफादारी और गिरफ्तारी

पिछले दिनों राजधानी में देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के अंदर अलग नजारा दिखा। पार्टी के बड़े नेता को पूछताछ के लिए सरकारी एजंसी के दफ्तर जाना पड़ा। इसका विरोध करने के लिए पूरे देश के नेता जुटे और सड़कों पर खूब प्रदर्शन हुआ। दिल्ली प्रदेश कार्यालय के नेता भी सबसे आगे दिखे। कोई अवरोधक पर चढ़कर विरोध जता रहा था तो कोई सुरक्षा बल से जूझता नजर आ रहा था। बेदिल को पता चला कि इस दौरान कुछ ऐसे नेता भी थे, जो जानबूझ कर अपनी गिरफ्तारी दे रहे थे, ताकि आला कमान के बीच यह संदेश पहुंचा सकें कि वह संकट के समय पार्टी के साथ खड़े रहे।

हालांकि इसके बाद दिल्ली प्रदेश पार्टी कार्यालय में चर्चा जोरों पर रही। बेदिल ने जहां कान लगाया कुछ न कुछ सुनने को मिला। पार्टी के नेता यह कहते दिखे कि यही समर्पण यदि प्रदेश स्तर पर पार्टी को मजबूत करने को लेकर होता तो शायद पार्टी के साथ ही नेताओं का भी भला होता। किसी ने कहा कि जो नेता गिरफ्तारियां देकर अपनी वफादारी का प्रमाण दे रहे हैं वे प्रदेश स्तर के मामले पर ऐसे नहीं दिखाई देते। प्रदेश स्तर पर आयोजित होने वाले विरोध प्रदर्शन में कुछ गीने-चुने नेता और पदाधिकारी नजर आते हैं। कई तो ऐसे नेता भी हैं, जो पार्टी कार्यालय में आयोजित बैठकों तक में हिस्सा नहीं लेते थे और इस बार आला कमान को खुश करने के लिए सड़कों पर लाठी-डंडा खाने को तैयार थे।

मेट्रो की मुश्किलें

सिर मुड़ाते ही ओले पड़े। यह कहावत एक सार्वजनिक परिवहन प्रणाली के अलाकमान पर बिल्कुल सटीक बैठ रही है। मामला महकमे के सर्वोच्च पद पर आए एक अफसर का है। इस महकमे में लंबे समय से काम कर रहे एक अधिकारी जैसे ही सबसे बड़ा पद खाली करके गए इस पद के लिए चुने गए दूसरे अधिकारी के आते ही एक-एक कर इस परिवहन प्रणाली की सेवाएं गच्चा देने लगीं। एक महीने में तीन से चार बार सेवाएं ठप हुई तो यात्री परेशान हो गए। मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में परिवहन प्रणाली की बुराई दिखने लगी। हालांकि यह खराबी पहले भी आती थीं लेकिन नए साहब के आते ही उनके कुछ समझने से पहले ही यह शुरू हो गया तो यहां उनकी भी काम नहीं आई।

गड्ढों में सड़क!
दिल्ली में मानसून सिर पर है लेकिन यहां लोगों को न तो तैयारियां जलभराव को रोकने के लिए दिख रही है और न ही गड्ढों में समाई सड़कों को भरने में। मुख्य दिल्ली को छोड़ दें तो बाकी दिल्ली की सड़कें और बारिश के बाद जलभराव गांव से भी ज्यादा खराब हालत में दिखती हैं। बेदिल से किसी दिल्लीवाले ने कहा, मौसम विभाग ने मानसून आने की घोषणा कर दी है लेकिन दिल्ली सरकार ने अभी तक इससे निपटने की खास घोषणा नहीं की। मार्गों पर एक से दो फुट तक के गड्ढे हैं और जगह-जगह जल बोर्ड समेत बिजली कंपनियों ने भी काम के लिए खुदाई की है। ऐसा लग रहा है जैसे गड्ढों में सड़क है। अगर ये अब भी नहीं बने तो मानसून का मजा खराब होगा।

तबादलों का असर

उत्तर प्रदेश में अधिकारियों के होने वाले तबादलों की संभावना के चलते अमूमन हर सरकारी महकमे का काम तकरीबन ठप पड़ गया है। इस संभावना के चलते विकास कार्यों के टेंडर लेने से ठेकेदार कतरा रहे हैं। नया कौन अफसर आएगा, उसकी क्या मांग होगी और उसका कैसा बर्ताव होगा, इसको ध्यान में रखते हुए ठेकेदार कंपनियां फिलहाल टेंडर लेने से कतरा रही हैं। यहां तक कि सामान्य सालाना नवीनीकरण होने वाली अनापत्ति प्रमाण पत्र के लिए भी संस्थान आवेदन नहीं कर रहे हैं। तीस जून या जुलाई के पहले सप्ताह तक अधिकांश स्थानांतरण होने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची सार्वजनिक होने की उम्मीद जताई जा रही है। उसके बाद नए अधिकारियों की तैनाती होगी। बेदिल को पता चला है कि इन दिनों सरकारी महकमों के अधिकारी और कर्मचारी भी नेताओं और मंत्रियों के नजदीक रहने वालों की तलाश कर मनचाही जगह पर अपना स्थानांतरण कराने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार हैं।
-बेदिल

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