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सज्जन कुमार: चाय की दुकान से सियासत तक का सफर

1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में ताउम्र कैद की सजा पाने वाले सज्जन कुमार को लेकर कांग्रेस में सन्नाटा है। उनके मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद पार्टी की तीन राज्यों की चुनावी जीत के जश्न में खलल पड़ गया है। अदालती फैसले के बाद पार्टी नेताओं ने कुमार से प्रत्यक्ष तौर पर एक मुकम्मल दूरी कायम कर ली है।

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जनसत्ता संवाददाता
1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में ताउम्र कैद की सजा पाने वाले सज्जन कुमार को लेकर कांग्रेस में सन्नाटा है। उनके मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद पार्टी की तीन राज्यों की चुनावी जीत के जश्न में खलल पड़ गया है। अदालती फैसले के बाद पार्टी नेताओं ने कुमार से प्रत्यक्ष तौर पर एक मुकम्मल दूरी कायम कर ली है। पार्टी की किरकिरी भी हुई है। शायद इसी वजह से कुमार ने खुद ही पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने खुद को कांग्रेस से अलग कर लिया है लेकिन यह सच है कि बीते पांच दशक में सूबे की सियासत में उनकी तूती बोलती रही। दंगों के दाग के मद्देनजर वे खुद तो कभी दिल्ली कांग्रेस के मुखिया नहीं बन पाए, लेकिन किंगमेकर की भूमिका में हमेशा रहे।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के बाद साल 1984 में दिल्ली व देश के कुछ अन्य हिस्सों में भड़के सिख विरोधी दंगों के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट से ताउम्र कैद की सजा पाने वाले सज्जन कुमार सियासी दुनिया में कदम रखने से पहले करोल बाग के प्रसाद नगर की झुग्गियों में चाय की एक छोटी सी दुकान चलाते थे। सरकार ने जब प्रसाद नगर की झुग्गियों को मादीपुर में बसाया तो वे भी अपनी दुकान लेकर वहां चले गए और कुमार स्वीट्स के नाम से नई दुकान खोल ली। तीन-तीन बार देश के सबसे बड़े लोकसभा क्षेत्र (बाहरी दिल्ली) से चुनाव जीतकर लोकसभा तक का सफर तय करने वाले कुमार ने अपने सियासी जीवन की शुरुआत दिल्ली नगर निगम का चुनाव जीतकर की। कांग्रेस नेताओं की मानें तो उस जमाने में चौधरी हीरा सिंह जाट समाज के कद्दावर नेताओं में शुमार किए जाते थे। वे दिल्ली के सबसे कद्दावर कांग्रेसी नेता एचकेएल भगत के करीबियों में शुमार थे। मेट्रोपॉलिटन काउंसिल में कार्यकारी पार्षद रह चुके हीरा सिंह ने भगत से अपनी करीबी के दम पर सज्जन कुमार को दिल्ली नगर निगम का टिकट दिलवाया जहां कुमार को जीत हासिल हुई। उसके बाद उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि साल 1977 में देशभर में चली जनता पार्टी की लहर के बाद दिल्ली में भी कांग्रेस का सफाया हो गया। पार्टी सभी लोकसभा सीटों पर हार गई। उसके बाद से पार्टी संगठन को मजबूती देने में जुटे संजय गांधी ने 1980 के लोकसभा चुनाव में बाहरी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से सज्जन कुमार को प्रत्याशी बनाया। कुमार उस चुनाव में जीतने में सफल रहे। हालांकि 1984 में सिख विरोधी दंगों के बाद पार्टी ने उनका टिकट काट दिया। उसके बाद 1991 में वे फिर से संसद का चुनाव जीतने में सफल रहे। साल 2003 के लोकसभा चुनाव में भी उन्हें बाहरी दिल्ली से सफलता मिली। 2009 में भी पार्टी ने उनको टिकट दिया, लेकिन एक सिख पत्रकार द्वारा तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंके जाने के बाद पार्टी ने कुमार का टिकट काट दिया। उनके बदले उनके भाई ने चुनाव लड़ा और विजयी रहे।

सियासी पंडितों की मानें तो इसमें कोई दो राय नहीं कि सत्तर के दशक से अब तक सज्जन कुमार का दिल्ली की सियासत में जबरदस्त दबदबा रहा। उन्हें राजनीति में लेकर आने वाले एचकेएल भगत के संसदीय क्षेत्र पूर्वी दिल्ली में तब 20 विधानसभा सीटें आती थीं, जबकि कुमार की बाहरी दिल्ली में सबसे ज्यादा 21 विधानसभा सीटें थीं। पार्टी के हर फैसले में उनकी राय शामिल रही। सिख विरोधी दंगों में उनका नाम आने के बाद पार्टी ने उनको कोई भी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं सौंपी, लेकिन पर्दे के पीछे वे हमेशा किंगमेकर का किरदार निभाते रहे।

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