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एमएचआरडी की हरी झंडी के इंतजार में शिक्षा का अधिकार की हेल्पलाइन

देश के नौनिहालों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के लिए एक अप्रैल 2010 को शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया।

Author नई दिल्ली | May 11, 2016 04:17 am
प्रस्ताव के अनुसार हेल्पलाइन को जुलाई 2016 से शुरू किया जाना है, लेकिन एमएचआरडी की चुप्पी से इसमें देरी की आशंका है।

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) द्वारा अतिरिक्त फंड को लेकर हरी झंडी नहीं मिलने के कारण बच्चों के लिए प्रस्तावित शिक्षा का अधिकार हेल्पलाइन अधर में लटका है। सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने हेल्पलाइन का प्रस्ताव तैयार कर फरवरी में मंत्रालय को सौंप दिया था जिसके अनुसार इसके लिए 3.81 करोड़ रुपए की अतिरिक्त फंड की जरूरत है। प्रस्ताव के अनुसार हेल्पलाइन को जुलाई 2016 से शुरू किया जाना है, लेकिन एमएचआरडी की चुप्पी से इसमें देरी की आशंका है।

सूत्रों के मुताबिक, आयोग को आरटीई कानून की मॉनीटरिंग के लिए वर्तमान में दिया जा रहा फंड भी अपर्याप्त है। देश के नौनिहालों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के लिए एक अप्रैल 2010 को शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया जिसकी निगरानी की कमान राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) को सौंपी गई। निगरानी को अंजाम देने के लिए आरटीई नियम, 2010 के अनुच्छेद 26 में एक हेल्पलाइन बनाने का प्रावधान किया गया था। लेकिन आरटीई कानून के लागू होने के छह साल बाद भी यह हेल्पलाइन अस्तित्व में नहीं आ पाई है।

हाल ही में आयोग की नई टीम के नेतृत्व में हेल्पलाइन का प्रस्ताव तो तैयार किया गया है, लेकिन यह प्रस्ताव फरवरी से केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की मंजूरी की राह देख रहा है। प्रस्ताव के मुताबिक, अप्रैल से जुलाई तक हेल्पलाइन के लिए एजंसी के चयन, इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने, संसाधन जुटाने, स्टाफ की नियुक्ति सहित अन्य काम पूरे कर इसे शुरू कर देना था। सूत्रों के मुताबिक, यह हेल्पलाइन एनसीपीसीआर के शिक्षा प्रभाग द्वारा संचालित किया जाएगा जिसकी फंडिग केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा की जाएगी। लेकिन, वर्तमान में आयोग को जो फंड मिल रहा है उससे इसका संचालन संभव नहीं है।

आरटीई कानून के तहत आयोग को देश भर के 14 लाख से अधिक स्कूलों की यह निगरानी करनी है कि 6-14 साल के बच्चों को मुफ्त, अनिवार्य और गुणवत्ता की शिक्षा मिल रही है या नहीं और अन्य बुनियादी सुविधाएं उन्हें मुहैया हो रही हैं या नहीं। सूत्रों की मानें तो आयोग को प्रति स्कूल निगरानी के सालाना 50 रुपए मिलते हैं। इस हिसाब से सलाना बजट लगभग सात करोड़ का बनता है। हेल्पलाइन चलाने के लिए सालाना प्रति स्कूल 25 रुपए अतिरिक्त फंड की जरूरत होगी। आयोग ने अपने प्रस्ताव में हेल्पलाइन के लिए 2016-17 के लिए 3.81 करोड़ रुपए के फंड की मांग रखी है। लेकिन आयोग के एक अधिकारी के अनुसार, ‘आयोग को आरटीई कानून के तहत स्कूलों की मॉनीटरिंग, शिकायत निवारण और अनुसंधान-अध्ययन करना है जिसके लिए मौजूदा बजट ही अपर्याप्त है, ऐसे में हेल्पलाइन चलाना नामुमकिन है’। इतना ही नहीं, आयोग के लिए 2015-16 में 4 करोड़ रुपए का बजट अनुमोदित किया गया। लेकिन 2 करोड़ का फंड ही जारी किया गया।

हेल्पलाइन का मॉड्युल आयोग द्वारा नेशनल स्मॉल इंडस्ट्रीज कॉरपोरेशन, रेल टेल, टेलिकॉम कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया लि., सी-डैक, एनआइसी, नेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ स्मार्ट गवर्नेंस के प्रतिनिधियों को मिलाकर गठित तकनीकी टीम ने तैयार किया है। हेल्पलाइन के माध्यम से न केवल शिकायतें सुनी जाएंगी बल्कि शिकायतों का निवारण भी किया जाएगा। आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि पढ़ाई, शिक्षक, कॉपी-किताब, मीड डे मील अर्थात आरटीई कानून के दायरे में आने वाली किसी भी तरह की शिकायत बच्चा खुद या उसके अभिभावक कर सकते हैं। शिकायत मिलते ही उसे ई-मेल और फोन के जरिए उसे पहले स्कूल प्रिंसिपल को भेजा जाएगा। अगर वहां सुनवाई नहीं होती तो प्रखंड, फिर जिला, राज्य और अंतत: एनसीपीसीआर के स्तर पर शिकायत का निवारण किया जाएगा। हेल्पलाइन से 18 भाषाओं में मदद मुहैया कराई जाएगी। साथ ही जमीनी हकीकत की जानकारी के लिए अपनी तरफ से औचक कॉल भी किए जाएंगे।

फिलहाल, इस तरह की हेल्पलाइन केवल ओडिशा सरकार चला रही है जिसे काफी सफल माना जा रहा है। आयोग का आकलन है कि प्रस्तावित हेल्पलाइन पर सालाना एक लाख से ज्यादा शिकायतें आ सकती हैं जिससे आरटीई कानून को मजबूती से लागू करने में काफी बड़ी मदद मिलेगी, बशर्ते एमएचआरडी इसे हरी झंडी दे।

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