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श्याम और कबीर के रंग राची

कला कुंज और जयजयवंती की ओर से नृत्य समारोह का आयोजन किया गया।

कथक नृत्यांगना ऋचा जैन

कला कुंज और जयजयवंती की ओर से नृत्य समारोह का आयोजन किया गया। इंडिया हैबिटाट सेंटर के स्टेन आॅडिटोरियम में हुए कार्यक्रम में नृत्य रचना श्याम रंग राची और तुमएकम पेश की गई। इसे कथक नृत्यांगना ऋचा जैन और भरतनाट्यम नृत्यांगना स्नेहा चक्रधर ने प्रस्तुत किया। दरअसल, कला जगत में ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि दो कलाकार एक साथ एक मंच पर प्रस्तुत हों। लेकिन उस शाम गुरु रवि जैन व नलिनी जैन की शिष्या ऋचा जैन ने अपने मोहक कथक नृत्य से समां बांधा। वहीं, स्नेहा चक्रधर ने भरतनाट्यम के रस से अभिभूत अभिनय से सभा को जीनत बख्शी। उन्होंने अपने नृत्य का आरंभ पुष्पांजलि से आरंभ किया। यह राग श्री और आदि ताल में निबद्ध था। तुलसीदास कृत रूद्राष्टक में शिव के रूपों को विवेचित किया। यह राग मालिका और खंडम जाति में निबद्ध था।
उन्होंने मीरा बाई के पद ‘कोई कहियौ रे प्रभु आवन की’, कबीर के पद ‘मोको कहां ढूंढे’ और तिल्लाना पर अलग-अलग भावों के साथ भरतनाट्यम की बारीकियों को दर्शाया। स्नेहा ने राग कल्याणी और आदि ताल में निबद्ध मीरा की रचना पर नायिका को बखूबी विवेचित किया। साथ ही कबीर में निर्गुण भावों का समावेश करते हुए, नव प्रयोग की ओर कदम बढ़ाया है। इस तरह के प्रयोग उनकी गुरु गीता चंद्रन भी करती रहीं हैं। वास्तव में लोकप्रिय रचनाओं पर नृत्य करने से कलाकार सहजता से दर्शक को बांध लेते हैं। ऐसे प्रयास सराहनीय हैं। समारोह के आरंभ में ऋचा ने कथक नृत्य का आरंभ कृष्ण की वंदना से किया।

यह रचना ‘तोरे बिना मोहे चैन नहीं’ और ‘सुध-बुध खोई नैना मिलाइके’ पर आधारित थी। उन्होंने मटकी, बांसुरी, घंूघट की गतों का प्रयोग करते हुए, उठान, परण, टुकड़े और तिहाइयों को मंझे अंदाज में पेश किया। पैर के काम में खड़े पैर के साथ पंजों का महीन काम दिखाया। उन्होंने तीन ताल में शुद्ध नृत्य में लखनऊ, जयपुर और बनारस घराने की चीजों को नृत्य में पिरोया। बनारस घराने के जानकी दास की नटवरी, मिश्र जाति, फरमाइशी परण और झूलना परण को ऋचा ने अपने नृत्य में विशेष तौर पर प्रभावी अंदाज में पेश किया। कथक नृत्य में कथा कथन की परंपरा है। इसे हिरण्यकश्यपु और भक्त प्रहलाद की कथा के जरिए पेश किया।

गीत ‘होलिका ने ऐसो जुलम गुजारो’ पर आधारित नृत्य में प्रसंग को चित्रित किया गया। संकीर्तन ‘श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी’ के बोल पर दशावतार के संक्षिप्त चित्रण से प्रस्तुति को और समृद्ध बना दिया। नृत्य में 21चक्कर के साथ रथ के चलन का प्रयोग मार्मिक था। ऋचा नृत्य करने के साथ गाती भी हैं, इससे वह अपनी प्रस्तुति को एक अलग प्रवाह प्रदान करने में सक्षम होती हैं। इस समारोह में दोनों कलाकारों को सहयोग देने वाले में गुरु गीता चंद्रन और गुरु नलिनी जैन शामिल थीं। इनके अलावा, सुधा रघुरामन, जी रघुरामन और मनोहर बालचंद्रन ने भरतनाट्यम प्रस्तुति के लिए संगत की, जबकि, जहीर खां, जकी अहमद व मुदस्सर खां ने कथक प्रस्तुति में सहयोग किया।

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