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पुस्तक समीक्षाः जिंदा इतिहास का नया पाठ

इतिहास न तो माफी के लिए है और न बदले के लिए है। इतिहास, इतिहास के लिए है। शशि थरूर अपनी किताब ‘अंधकार काल : भारत में ब्रिटिश साम्राज्य’ में इस बात को लेकर चिंता जताते हैं कि कई देश अपने औपनिवेशिक काल का इतिहास भूल चुके हैं।

Author नई दिल्ली | January 26, 2018 2:08 AM
कांग्रेस नेता डा. शशि थरूर

इतिहास न तो माफी के लिए है और न बदले के लिए है। इतिहास, इतिहास के लिए है। शशि थरूर अपनी किताब ‘अंधकार काल : भारत में ब्रिटिश साम्राज्य’ में इस बात को लेकर चिंता जताते हैं कि कई देश अपने औपनिवेशिक काल का इतिहास भूल चुके हैं। 1600 में रानी एलिजाबेथ के द्वारा सिल्क, मसालों और अन्य भारतीय वस्तुओं के व्यापार के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के साथ भारतीय उपनिवेशवाद की शुरुआत और इसकी शेष समस्याओं को शशि थरूर अपनी किताब में रखते हैं। इसके लिए वे इतिहासविदों, साम्राज्यवादी अधिकारियों के पत्रों, गजटों और अन्य समकालीन स्रोतों के अध्ययन से अपना पाठ रचते हैं।

थरूर वाणी प्रकाशन की ओर से आई अपनी किताब की प्रस्तावना में बताते हैं कि किताब की भूमिका आॅक्सफोर्ड में दिए उनके उस भाषण के बाद शुरू हुई जिसमें उन्होंने कहा था कि ब्रिटेन अपने पूर्व उपनिवेशों की क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी है और इसके लिए वह प्रायश्चित करे। उन्होंने अपने भाषण में ब्रिटेन से उपनिवेशवाद का हर्जाना भी मांगा। कांग्रेस नेता ने प्रस्ताव रखा कि भारत को एक पाउंड प्रति वर्ष की दर से 200 वर्ष तक भुगतान की प्रतीकात्मक क्षतिपूर्ति से संतुष्ट हो जाना चाहिए। इस भाषण को मिली देशव्यापी तारीफ के बाद थरूर यह सोचने के लिए मजबूर हुए कि जिन बातों को वे बहुत बुनियादी समझते थे और जिन्हें रोमेश चंद्र दत्त, दादाभाई नौरोजी और जवाहरलाल नेहरू बहुत पहले कह चुके थे उससे आज भी बहुत से भारतीय अनजान थे। बकौल थरूर, ‘आज के भारतीय और ब्रिटिश नागरिकों को उपनिवेशवाद की भयानकता के बारे में बताने की नैतिक आवश्यकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता’।

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थरूर कांग्रेस के एक अनुभवी नेता हैं और तथ्यों, मिथकों और पूर्वग्रहों के साथ वे अपनी पूरी राजनीतिक समझ के साथ तर्क करते हैं। औपनिवेशिक काल के अंधकार का यह लेखक कल की गलतियों को इसलिए समझना चाहता है ताकि यह जान सके कि वर्तमान वास्तविकता के लिए कौन सा तत्त्व जिम्मेदार है। लेखक इतिहास को लेकर अपनी समझ स्पष्ट करते हैं, ‘अतीत अनिवार्य रूप से भविष्य का मार्गदर्शक नहीं होता, परंतु यह वर्तमान की व्याख्या में आंशिक सहायता अवश्य करता है। कोई व्यक्ति इतिहास से प्रतिशोध नहीं ले सकता, इतिहास स्वयं अपना प्रतिशोध होता है’। थरूर द्वारा वर्णित औपनिवेशिक गुलाम देश आज तीन देशों में बंट चुका है। आज के संदर्भ में इतिहास का यह नया पाठ इन तीन स्वतंत्र देशों से संवाद करता है। लेखक कहते हैं कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने जहां पैर रखे थे वह आदिकालीन अथवा बंजर भूमि नहीं थी अपितु मध्यकालीन विश्व का एक चमचमाता रत्न था। ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापार चौकियां मजबूत किले बन गर्इं और स्थानीय व्यापारियों को सेना द्वारा उजाड़ा जाने लगा।

यह किताब थरूर की मूल अंग्रेजी में लिखी किताब का अनुवाद है। यह सुखद है कि अगर किताब के शुरुआती पन्नों पर अनुवादक के तौर पर नीरू और हिंदी अनुवाद संपादन के तौर पर युगांक धीर का नाम नहीं पढ़ा हो तो भाषाई सहजता एक बार भी यह अहसास नहीं होने देती कि यह मूल रूप से हिंदी में नहीं लिखी गई है। थरूर ब्रितानियों की लूट का वर्णन कुछ यूं करते हैं, ‘एक स्पंज की तरह गंगा के तटों से सारी समृद्धि चूस कर उसे थेम्स के तटों पर निचोड़ रहे हैं’। हॉरेस वालपोल के 1790 में किए गए व्यंग्य को उद्धृत करते हुए कहते हैं, ‘इंग्लैंड अब क्या है? भारतीय दौलत की हौदी’।

लॉर्ड विलियम बेंटिक की पंक्तियां, ‘सूती कपड़े के बुनकरों की हड्डियां भारत के मैदानों में बिखरी पड़ी थीं’ से लेखक बताते हैं कि ब्रिटिश शासकों द्वारा भारत में कपड़ा उद्योग को नष्ट किया जाना आधुनिक विश्व में औद्योगिकीकरण के बड़े पैमाने पर विनाश की पहली घटना थी। 1600 से लेकर 1947 तक के काल को समेटती हुई यह किताब ब्रितानी शासन के पूरे अंधेरे राज को एक नई रोशनी के साथ सामने लाती है। थरूर कहते हैं, ‘कंपनी चूंकि भारतीयों से उनके सामर्थ्य से अधिक भुगतान लेती थी अत: अतिरिक्त रकम रिश्वतखोरी, लूटपाट और हत्या तक से जुटाई जाती थी।’

थरूर किताब में उपनिवेश-उपरांत की समस्याओं पर बात करते हुए कहते हैं कि इन समाजों में अपेक्षाकृत कम विकास भी संघर्ष का कारण है। और, इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में प्रवेश के पहले इस इतिहास का क्या महत्त्व है? लेखक कहते हैं, ‘कल की आनेवाली अराजकता संभवत: कल की औपनिवेशिकता के व्यवस्था के प्रयासों के कारण होगी…। बनाने एवं लगभग तोड़ देने वाली ताकतों को समझते दिखाई देते हुए एवं नई सहस्राब्दि में संघर्ष अथवा झगड़े के संभव भारी स्रोतों को पहचानने की आशा में हमें यह समझना है कि कई बार पीछे देखने वाला दर्पण क्रिस्टल की उत्तम गेंद होता है’। लेखक मानते हैं कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का इतिहास जिंदा इतिहास है। आज भी लाखों ऐसे भारतीय जीवित हैं जिन्हें भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अन्याय याद हैं। इतिहास का संबंध अतीत से होता है, लेकिन इसे समझने का कर्तव्य वर्तमान का होता है। सवाल यह भी है कि इतिहास की ओर से लिख कौन रहा है? इसे शशि थरूर लिख रहे हैं पूरी राजनीतिक, ऐतिहासिक, आर्थिक, सांस्कृतिक समझ के साथ। लेखक औपनिवेशिक अतीत से औपनिवेशिक-उपरांत तक जो सतत संवाद कर रहे हैं वह इसे इतिहास की पठनीय पुस्तकों की कड़ी में खड़ा करता है।

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