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दिल्ली: स्कूलों में गरीब बच्चों के दाखिले की धांधली पर सख्त हुआ आयोग

एनसीपीसीआर ने दिल्ली के शिक्षा निदेशालय से मांगे गरीब बच्चों के निजी स्कूलों में दाखिले के पांच साल के आंकड़े।

Author नई दिल्ली | September 12, 2016 3:56 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने दिल्ली के सभी जिलों के शिक्षा उपनिदेशकों को नोटिस भेजा है और उनके क्षेत्रों के निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित (ईडब्लूएस/डीजी) वर्ग के बच्चों को लेकर शिक्षा का अधिकार कानून के तहत नामांकन संबंधी पिछले पांच साल का रिकार्ड मांगा है। 9 सितंबर को जारी नोटिस के मुताबिक, अगर शिक्षा अधिकारी सात दिनों के भीतर आयोग के समक्ष आंकड़े नहीं पेश करते तो उन्हें ‘समन’ किया जाएगा। आयोग ने इस साल जून में ही आंकड़ों के संबंध में दिल्ली के शिक्षा निदेशालय को पत्र लिखा था, लेकिन उसके जवाब में केवल तीन जिलों के 498 स्कूलों से ही आंकड़े मिले थे। आयोग ने इस वर्ग के कोटे में दाखिले में गड़बड़ी के अंदेशे को देखते हुए यह पहल की है।

एनसीपीसीआर ने इस साल 8 जून को दिल्ली के शिक्षा निदेशक को पत्र लिखकर शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के सेक्शन 12(1)(सी) के तहत ईडब्लूएस/डीजी वर्ग के विद्यार्थियों के निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में वर्ष 2010-11 से 2015-16 के बीच दाखिले संबंधी आंकड़े तलब किए थे। आयोग ने यह भी पूछा था कि अभी तक आरटीई के तहत कितने बच्चों को दाखिला दिया गया है, दाखिले के कितने आवेदन आए, कितनी सीटें खाली रहीं और फिलहाल कितने बच्चे पढ़ रहे हैं? आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा, ‘दिल्ली में निजी स्कूलों के ईडब्लूएस/डीजी वर्ग में फर्जी दाखिले का अंदेशा है, इस संबंध में कई सूचनाएं और शिकायतें आर्इं जिसके कारण यह कदम उठाया गया।’
हालांकि, आयोग की ओर से मांगे गए आंकड़ों के जवाब में केवल तीन जिलों के स्कूलों से जवाब आए हैं। दिल्ली में कुल 12 जिले हैं। दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग की वेबसाइट के अनुसार कुल 1187 स्कूल हैं जिनमें से 501 अल्पसंख्यक स्कूल हैं, जिन पर आरटीई कानून लागू नहीं होता। बाकी बचे 686 स्कूलों में से पिछले तीन महीनों में 498 स्कूलों से ही आंकड़े मिल सके, जबकि 188 स्कूलों ने आंकड़े नहीं भेजे हैं। आयोग ने प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण नहीं किया है जिससे इन स्कूलों में आरटीई के अनुपालन का अंदाजा मिल सके। प्रियंक कानूनगो ने कहा, ‘सभी स्कूलों से आंकड़े इकट्ठे होने के बाद ही विश्लेषण कर किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकेगा, इसलिए हमने अभी प्री-समन नोटिस भेजा है, बाद में समन भेजेंगे। लेकिन कहीं न कहीं गड़बड़ी का अंदेशा है जिस कारण स्कूल सूचना छुपा रहे हैं।’

निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में ईडब्लूएस/डीजी वर्ग के दाखिले में गड़बड़ी का मामला हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा सत्र में भी उठा था। सीमापुरी से विधायक राजेंद्र गौतम ने इस धांधली का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए बताया कि कैसे एंट्री लेवल पर स्कूल आंकड़े दुरुस्त रखते हैं, लेकिन बाद में उनमें गड़बड़ी करते हैं। गौतम के अनुसार उनके विधानसभा और आसपास के क्षेत्र में 8 बड़े निजी स्कूल हैं और लगभग सभी में यही तरीका अपनाया जाता है। गौतम ने कहा, ‘आरटीई के तहत एंट्री लेवल में कक्षा एक तक दाखिला लिया जाता है। इस लेवल पर स्कूल अधिकतर 2 सेक्शन दिखाते हैं, सीटों की संख्या भी कम होती है, लेकिन एंट्री लेवल के ऊपर कक्षा 2 में 8-8 सेक्शन हो जाते हैं और एक सेक्शन में बच्चों की संख्या भी दुगनी हो जाती है।’ एनसीपीसीआर की पहल पर गौतम ने कहा कि एंट्री लेवल के आंकड़ों की तुलना उसके ऊपर की कक्षाओं से किए जाने पर ही स्थिति साफ हो पाएगी। 2009 के शिक्षा के अधिकार के कानून के तहत ईडब्लूएस/डीजी वर्ग में दाखिला लेने वाले बच्चे मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और लेखन सामग्री के हकदार हैं, लेकिन, इसके लिए विद्यार्थियों को जो पैसा दिया जा रहा है वह नाकाफी है।

यह बात न्यू सीमापुरी की ई-44 झुग्गी में कई परिवारों से बातचीत में सामने आई। सिद्धार्थ इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ने वाली सायरा का कहना है कि पढ़ाई में अव्वल रहने के कारण उसे पांच मेडल मिले हैं। सायरा को ईडब्लूएस/डीजी वर्ग में दाखिला तो मिला, लेकिन कॉपी और स्कूल ड्रेस जैसी सहूलियतें नहीं मिली। मजदूरी करने वाले सायरा के पिता फिरोज खान के लिए तीन बच्चों के स्कूल बैग, कॉपियां और ड्रेस का इंतजाम करना मुश्किल है। दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने विधानसभा में आश्वासन दिया था कि ईडब्लूएस/डीजी वर्ग में दाखिले में गड़बड़ी करने वाले स्कूलों की शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। मुफ्त किताब-कॉपी के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह मामला हाई कोर्ट में है, सरकार जल्द ही कोर्ट के सामने एक नीति पेश करेगी कि किस फॉर्मूले के तहत पैसा दिया जाए। फिलहाल, ईडब्लूएस/डीजी वर्ग के हजारों बच्चों निजी स्कूल में पढ़ने का सपना बहुत हद तक इन गड़बड़ियों के निवारण पर निर्भर है।

 

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