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कायाकल्प: लाल किले की दीवारें बयां करेंगी मुगलिया दौर की दास्तां

दिल्ली और देश की शान ऐतिहासिक लाल किला छह महीने के भीतर नए रंग-रूप में नजर आएगा। लाल किले के लाहौरी गेट से दाखिल होकर छत्ता बाजार होते हुए नौबत खाना की तरफ बढ़ने पर आप मुगलकालीन दौर को महसूस कर सकेंगे।

Author नई दिल्ली, 29 मई। | May 30, 2018 4:38 AM
भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग पूरे देश में ऐतिहासिक महत्‍व की इमारतों और स्‍मारकों के संरक्षण का कार्य करता है। (फाइल फोटो)

दिल्ली और देश की शान ऐतिहासिक लाल किला छह महीने के भीतर नए रंग-रूप में नजर आएगा। लाल किले के लाहौरी गेट से दाखिल होकर छत्ता बाजार होते हुए नौबत खाना की तरफ बढ़ने पर आप मुगलकालीन दौर को महसूस कर सकेंगे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की ओर से की जा रही किले की व्यापक मरम्मत के जरिए इसे आंतरिक और बाह्य तौर पर मूल स्वरूप देने की कोशिश की जा रही है। इसी क्रम में छत्ता बाजार की दीवारों पर प्लास्टर की सात तहों से ढकी मुगलकालीन चित्रकारी को फिर से उभारा गया है। किले के लिए तैयार समग्र संरक्षण और प्रबंधन योजना के मुताबिक सैन्य शासनकाल (2007 तक यहां छावनी थी) के दौरान निर्मित सभी संरचनाओं को ढहाकर केवल मुगलकालीन और ब्रिटिशकालीन संरचनाएं रखी जाएंगी।

किले की दीवारों पर चढ़ी इतिहास की धूल

मुगल बादशाह शाहजहां के जरिए साल 1638 में बनवाया गया ‘किला-ए-मुबारक’ आज लाल किले के नाम से मशहूर है, जिसकी प्राचीर से देश के प्रधानमंत्री हर साल 15 अगस्त को राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। चार सौ सालों के धूलकण, लगभग सौ साल से यहां बसे बाजार की गतिविधियों, टिशकालीन हस्तक्षेप और आजाद भारत में दशकों तक सेना की छावनी बने रहने के कारण किले की दीवारों व अन्य जगहों पर मोटी परतें चढ़ गर्इं और किले का मूल स्वरूप धूमिल हो गया। किले का छत्ता बाजार भी समय के साथ अपनी पुरानी रौनक (भित्ति चित्र और मेहराब) खो चुका है। छत्ता बाजार का शाब्दिक अर्थ है ढका हुआ बाजार, जो सत्रहवीं सदी के भारतीय परिवेश में और मुगलकालीन स्थापत्य कला में अनूठा था। किले में लाहौरी दरवाजे के अंदर पहुंचते ही ढका हुआ रास्ता मिलता है जिसके दोनों तरफ दोमंजिले मेहराबदार कक्षों की शृंखला है। दोनों तरफ 32 कक्ष हैं जो आज भी दुकानों के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं।

भित्ति चित्रों को दिया जा रहा मूल स्वरूप

एएसआइ के संयुक्त महानिदेशक जान्हवीज शर्मा ने कहा, ‘सन् 1843, 1860 और 1870 ई. की कुछ पेंटिंग्स हैं जिनमें छत्ता बाजार की दीवारों और छत पर भित्ति चित्र दिखते हैं। पांच-छह महीने पहले छत्ता बाजार से गुजरते हुए दीवारों पर धुंधली चित्रकारी झलकती थी, जिसे हमारे विज्ञान विभाग ने बहुत चुनौतीपूर्ण काम कर फिर से उभारा है। इसके लिए प्लास्टर की सात सतहों को हटाया गया। अभी भी बहुत सारी तस्वीरें बची हुई हैं जिन्हें दुरुस्त किया जाएगा और जिन भित्ति चित्रों के हिस्से गायब हैं उन्हें मूल तकनीक और पदार्थ से फिर वास्तविक स्वरूप दिया जाएगा। शर्मा ने कहा इस काम के लिए अलग-अलग दौर के चित्रों के अलावा दीवारों में मौजूद प्रमाणों का सहारा भी लिया जाएगा। शर्मा ने कहा कि लाल किला बाजार संघ से बात कर उन्हें इस बात के लिए तैयार किया गया है कि दुकानों के अग्रभाग को मूल स्वरूप में ले जाया जाएगा। एएसआइ के दिल्ली मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ नवरत्न पाठक ने कहा कि बाजार संघ के साथ एक समझौता किया जाएगा ताकि दुकानों को नियमित किया जा सके।

साल के अंत तक पूरा हो जाएगा जीर्णोद्धार

एएसआइ के संयुक्त महानिदेशक ने बताया, ‘लाहौरी गेट से छत्ता बाजार और नौबत खाना की तरफ जाते हुए पर्यटकों को 19वीं सदी का माहौल महसूस कराने की कोशिश की जा रही है। हम पर्यटकों को 19वीं सदी में जाने का एक अनोखा और विश्वसनीय अनुभव देंगे’। उन्होंने कहा कि 50-55 करोड़ की अनुमानित लागत से किले के जीर्णोद्धार काम इस साल के अंत तक पूरा किए जाने की कोशिश है। शर्मा ने आगे बताया कि पिछले सौ साल में पहली बार लाहौरी गेट पर जमे मलबे और मिट्टी को हटाने का काम किया जा रहा है। गेट की छत से 8-10 फीट ऊंचा मलबा हटाया गया है।

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