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पड़ोस की पराली से ज्यादा दोषी हैं अपने धूल-धुआं

दिल्ली-एनसीआर में इस जहरीली हवा में धूल और वाहनों के धुएं बड़े कारक हैं।

Author नई दिल्ली | November 9, 2017 2:28 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर। (ANI Photo)

रुबी कुमारी

इस समय राजधानी में फैले प्रदूषण और धुंध की चादर के पीछे पंजाब-हरियाणा में पराली का जलाए जाए को बड़ा कारण ठहराया जा रहा है। लेकिन पर्यावरण और मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर में इस जहरीली हवा में धूल और वाहनों के धुएं बड़े कारक हैं। हालांकि, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर पराली जलाने के मुद्दे पर उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की है।
जहरीले धुंध के पीछे बड़ा कारण स्थानीय
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव ए सुधाकर ने वर्तमान धुंध के चादर को पिछले साल के नवंबर के पहले हफ्ते के धुंध जैसा ही गहरा बताया। लेकिन उनका कहना है कि इस बार इस धुंध में जहरीली गैसों की मात्रा काफी कम है, लेकिन धूल कण ज्यादा हैं। उन्होंने कहा कि स्थानीय कारक ज्यादा हैं जो वायु की गति और दिशा के कारण कुहासे में फंसे हुए हैं जिससे भू-स्तर पर धुंध की स्थिति बन रही है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के प्रोग्राम मैनेजर विवेक चट्टोपाध्याय का कहना है कि धूल कण प्लेटफॉर्म की तरह काम करते हैं जिसपर धुआं के जहरीले कण जम जाते हैं और स्थिति घातक हो जाती है। निजी मौसम एजेंसी स्काइमेट के वरिष्ठ वैज्ञानिक महेश पलावत का कहना है कि पंजाब-हरियाणा के पराली जलाने से आए धुएं का इस धुंध में मात्र 25 फीसद योगदान है, बाकि स्थानीय धूल, वाहनों के धुएं और अन्य कारण दोषी हैं।

सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के मुताबिक दिल्ली वर्ष 2013 से बसों की सवारी में सलाना औसतन 9 फीसद की दर से कमी आ रही है। तब से अब तक 3 फीसद कम लोग बसों में सवारी कर रहे हैं। नवंबर 2016 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक प्रतिदिन मात्र 30.33 लाख लोग बसों की सवारी करते हैं। सीएसइ की अनुमिता रॉय के मुताबिक केवल दिल्ली मेट्रो से लोगों के आवागमन की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इंटर-सिटी परिवहन व्यवस्था को व्यापक रूप से बढ़ाने की जरूरत है। लेकिन पिछले तीन सालों में एक भी बस नहीं खरीदा गया है जिसका असर प्रदूषण संकट के रूप में देखने को मिल रहा है।

 

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