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नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए पूर्ण राज्य का मुद्दा उठा रही आप : शीला दीक्षित

दिल्ली के अधिकारों को लेकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर पलटवार करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा कि केजरीवाल अपने गिरेबां में झांकें और बताएं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि वे सरकार चलाने के बजाए पहले दिन से ही हर स्तर पर विवाद कर रहे हैं।

Author नई दिल्ली, 11 जून। | June 12, 2018 5:48 AM
शीला दीक्षित

दिल्ली के अधिकारों को लेकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर पलटवार करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा कि केजरीवाल अपने गिरेबां में झांकें और बताएं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि वे सरकार चलाने के बजाए पहले दिन से ही हर स्तर पर विवाद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि क्या उनके मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद दिल्ली के विधान में कोई बदलाव किया गया, जिससे पहले मिले अधिकारों में कोई कटौती हुई? दीक्षित ने कहा कि अपनी नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए आंदोलन की घोषणा कर रही है, जबकि उसे यह पता है कि न तो विधानसभा में प्रस्ताव पास करने से और न ही आंदोलन करने से दिल्ली पूर्ण राज्य बन सकती है।

लगातार 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित ने कहा कि शासन चलाने का एक विधान है, मतभेद होने पर उसमें से ही कोई रास्ता निकाला जाता है न कि मतभेद को सार्वजनिक करके उसे और हवा दी जाती है। संभव है कि ‘आप’ में बढ़ रहे मतभेद से पार्टी के लोगों का ध्यान हटाने के लिए इस समय यह मुद्दा उठाया जा रहा हो। अगर सरकार अच्छे काम करना चाहती है तो वह दिखना भी चाहिए। पहले दिन से ही कानून को दरकिनार करके मनमाने तरीके से काम करने का प्रयास ही यह बताने के लिए काफी है कि ‘आप’ सरकार की नीयत में खोट है। अगर स्कूलों में बड़े सुधार हुए हैं तो नतीजे पहले क्यों बेहतर आते थे।

भाजपा सरकार में दिल्ली की सरकार चलाने की केजरीवाल की चुनौती का जबाव देते हुए शीला दीक्षित ने कहा कि ऐसा नहीं है कि उनके मुख्यमंत्री रहने के दौरान केंद्र में केवल कांग्रेस की ही सरकार थी। दिल्ली में अनेक विकास कार्यों की बुनियाद तब डाली गई, जब केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली सरकार थी। उन्होंने कहा कि सरकार को पता है कि अगर कोई विधेयक पास करने से पहले केंद्र की अनुमति नहीं मिली तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा, इसके बावजूद दर्जन भर विधेयक बिना केंद्र की जानकारी के पास किए गए गए, जो कानून बन ही नहीं पाए।

दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार साल 2003 में दिल्ली राज्य विधेयक लेकर आई थी, लेकिन उस समय लोकसभा भंग होने से वह प्रवर समिति में भेजी गई और फिर यह विधेयक कागजों में ही दबकर रह गया।
इस विधेयक में नई दिल्ली नगर पालिका क्षेत्र (एनडीएमसी) को छोड़ कर बाकी दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का प्रस्ताव था। हालांकि इसमें भी कई चीजें सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में थीं, लेकिन तब दिल्ली विधानसभा को कई और अधिकार मिल रहे थे जो अब नहीं हैं। इस तरह का विधेयक एक बार फिर संसद में लाना संभव नहीं है। भाजपा की सरकार में दिल्ली के पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग करने वाली कांग्रेस अब खुल कर इस बारे में नहीं बोल रही है। वास्तव में जिस तरह से आप सरकार पहले दिन से उप राज्यपाल, मीडिया और अधिकारियों से झगड़ रही है उसमें लगता नहीं कि दिल्ली विधानसभा के अधिकार आसानी से बढ़ने वाले हैं।

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