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उड़ानः किसी से कम नहीं ये ई-रिक्शेवालियां

तांगा, बसंती और धन्नो। हिंदी फिल्म ‘शोले’ की बसंती बहुत अलग थी क्योंकि वह तांगा चलाती थी। बसंती अपनी बातों से सवारियों को प्रभावित करती थी और पुरुषों के प्रभुत्व वाले इस क्षेत्र में अपनी रोजी-रोटी चला रही थी।

Author June 7, 2018 5:28 AM
तांगा से लेकर रिक्शे तक में अभी तक यही देखा गया कि यह महिलाओं का रोजगार नहीं बन रहा था।

मीना

तांगा, बसंती और धन्नो। हिंदी फिल्म ‘शोले’ की बसंती बहुत अलग थी क्योंकि वह तांगा चलाती थी। बसंती अपनी बातों से सवारियों को प्रभावित करती थी और पुरुषों के प्रभुत्व वाले इस क्षेत्र में अपनी रोजी-रोटी चला रही थी। तांगा से लेकर रिक्शे तक में अभी तक यही देखा गया कि यह महिलाओं का रोजगार नहीं बन रहा था। साइकिल रिक्शा श्रमसाध्य होने के कारण महिलाओं से दूर ही था। लेकिन ई-रिक्शा के आने के बाद से बहुत सी महिलाओं ने इसे रोजगार का माध्यम बनाया है। रिक्शा के साथ ‘ई’ जुड़ने का असर यह है कि अब महिलाएं भी बोल रही हैं मयूर विहार फेज दो, गांधीनगर, मुखर्जी नगर…।

ई-रिक्शा बना है मेरा पंख

मालती कहती हैं कि ई-रिक्शा केवल एक मशीन नहीं बल्कि मेरे पंख हैं जिसके सहारे मैं उड़ पाती हूं। इससे मैं इतना कमा लेती हूं कि मेरा घर आराम से चल जाता है। 38 साल की मालती सवारियों को बुलाते हुए कहती हैं कि इतने सारे पुरुषों के बीच काम कर पाना इतना आसान भी नहीं होता। कई बार पुरुषों को हम औरतों से दिक्कत हो जाती है। इन्हें लगता है कि सारी सवारियां हमारे ई-रिक्शा में आकर बैठ जाती हैं। हम इनसे ज्यादा कमा लेते हैं। लेकिन मेरा मानना यह है कि पुरुष सुबह से शाम तक काम करते हैं। हम औरतें सुबह अपने घर संभालती हैं और दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक ई-रिक्शा चलाती हैं। हम इतने कम समय के लिए गाड़ी चलाते हैं उसमें भी इन पुरुषों को दिक्कत हो जाती है। मालती कहती हैं कि उन्हें हर रोज पुरुष चालकों से अपने हक के लिए झगड़ना पड़ता है। इससे मुझे खुद को मजबूत साबित करना पड़ता है।

महिला चालकों को मिले सुरक्षित माहौल

भारतीय मजदूर संघ दिल्ली प्रदेश संगठन के मंत्री ब्रजेश कुमार का कहना है कि दिल्ली में उत्तर पूर्वी जिले में करीब 20 से 25 महिलाएं ई-रिक्शा चलाती हैं। हम महिला और पुरुष दोनों को प्रशिक्षण देते हैं। उन्हें बताते हैं कि आपको बाहर किस तरह से व्यवहार करना है? साथ ही उनकी सरकार से अगर कोई मांग है तो वह अभ्यास के दौरान रखी जाती है। ब्रजेश कुमार बताते हैं कि महिला चालकों को सुरक्षित माहौल दिलाने का हम प्रयास कर रहे हैं। स्त्री और पुरुष दोनों के लिए हफ्ते में एक या दो बार अभ्यास कराया जाता है। हम पुरुषों को बताते हैं कि महिलाओं के साथ सभ्य व्यवहार करें। अभी भी पुरुष चालकों के मुकाबले महिला चालकों की संख्या कम है। हम कोशिश कर रहे हैं कि महिलाओं की भागीदारी और बढ़े।

सवारियां बुलाने में शर्म आती थी…

पुरुषों की भारी आवाज के संबोधनों के बीच वंदना की महीन आवाज भी जल्दी ही अपना ई-रिक्शा भरवा लेती है। वंदना की उम्र अभी 35 है और घर की आर्थिक स्थिति खराब है। वंदना कहती हैं कि हमें मजबूरी में ई-रिक्शा चलाना पड़ रहा है। लेकिन वे अब इस काम का आनंद उठाने लगी हैं। वे बताती हैं कि शुरू-शुरू में आदमियों के बीच ई-रिक्शा लाकर खड़ा कर देने से और सवारियों को बुलाने में बहुत शर्म आती थी। पर अब आदत हो गई है। पहले दायरा केवल घर तक था और अब पूरी दिल्ली मुझे अपनी लगने लगी है। जब वंदना सवारियों को बुलाकर ई-रिक्शा में बैठा रही थीं उसी बीच उनके एक और पुरुष चालक साथी आकर उनका रिक्शा भरवाने में मदद करते हैं। वे बताती हैं कि यहां सभी साथी भाई जैसे हैं और बहुत मददगार हैं। वंदना बताती हैं कि अब जब सवारियां आकर मैडम बोलती हैं तो अच्छा लगता है। बतौर चालक अपने अनुभव को साझा करते हुए वंदना कहती हैं कि एक बार तो एक बुजुर्ग सवारी ने मेरे पैर छुए, और मुझे आशीर्वाद दिया कि तुम ऐसे ही मेहनत से काम करती रहो। वंदना कहती हैं कि अब लोग हमें और हमारे काम को सराहते हैं।

मध्य वर्ग और महिला चालक

आजाद फाउंडेशन में कार्यक्रम अधिकारी ब्राह्ममी चक्रवर्ती कहती हैं कि ‘सर’ और ‘मैडम’ की संस्कृति मध्यवर्गीय संस्कृति है, जिसे अब निम्न मध्य वर्ग भी अपना रहा है। निम्न मध्य वर्ग का मध्य वर्ग की ओर आने का विश्लेषण करते हुए ब्राह्ममी कहती हैं कि निम्न वर्ग अब मध्यवर्गीय छुअन की ओर बढ़ रहा है। इसके पीछे एक बड़ा कारण है मध्य वर्ग को मिलने वाले विशेषाधिकार। यही कारण है कि ई-रिक्शा चलाने वाली महिलाएं भी मध्यवर्ग को कॉपी करती हैं। ब्राह्ममी कहती हैं कि महिलाओं को घर से बाहर निकलने के जब भी मौके मिलते हैं तो वे खुद को बेहतर साबित करना चाहती हैं। महिला जब कमाने लगती है तो उन्हें परिवार में तो महत्त्व मिलता ही है साथ ही पुरुषों के साथ बराबरी का अहसास भी होता है। ब्राह्ममी बताती हैं कि महिला सवारी सुरक्षा के नजरिए से भी सुरक्षित महसूस करती हैं।

हमारी लक्ष्मण रेखा है

वहीं अपना ई-रिक्शा लिए खड़े शमशाद कहते हैं कि हम लोग तो शांत हो जाते हैं जब ये महिला चालक आती हैं। वे अपने ई-रिक्शा के आगे वाले पहिए के पास लगे पत्थर को हटाते हुए कहते हैं कि ये हमारी लक्ष्मण रेखा है हम इससे आगे गाड़ी नहीं बढ़ाते। हम औरतों से ज्यादा पंगे नहीं लेते।

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