हंगामा भी सत्र का हिस्सा

दिल्ली विधानसभा का बजट सत्र हाल ही में समाप्त हुआ। सत्र के दौरान कुछ दिन दर्शक दीर्घा में विद्यार्थीगण भी देखे गए जो शायद विधानसभा की कार्यवाही को देखने आए होंगे। वैसे, अन्य सत्रों की तरह इस सत्र की खासियत भी यही रही कि सदन की कार्यवाही पहले दिन ही हंगामे से हुई और समापन भी हंगामे से। पहले दिन उपराज्यपाल के अभिभाषण के पहले ही हंगामा शुरू हुआ और विपक्षी विधायकों को मार्शलों द्वारा बाहर किया गया।

दिल्ली विधानसभा (फाइल)

दिल्ली विधानसभा का बजट सत्र हाल ही में समाप्त हुआ। सत्र के दौरान कुछ दिन दर्शक दीर्घा में विद्यार्थीगण भी देखे गए जो शायद विधानसभा की कार्यवाही को देखने आए होंगे। वैसे, अन्य सत्रों की तरह इस सत्र की खासियत भी यही रही कि सदन की कार्यवाही पहले दिन ही हंगामे से हुई और समापन भी हंगामे से। पहले दिन उपराज्यपाल के अभिभाषण के पहले ही हंगामा शुरू हुआ और विपक्षी विधायकों को मार्शलों द्वारा बाहर किया गया। वैसे मार्शलों द्वारा विपक्षी विधायकों को सदन से बाहर किया जाना हर दिन का हिस्सा रहा। ऐसे में दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों ने यही सोचा होगा शायद यह हंगामा और मार्शल सदन की कार्यवाही का अनिवार्य हिस्सा है। तभी किसी चित्रकार ने एक चित्र बनाया, जिसमें किसी कक्षा के विद्यार्थियों को दो भाग में बांट कर विधानसभा की नकल करने को कहा गया, फिर क्या था पूरा क्लास एक दूसरे के ऊपर चिल्लाने में जुट गया।

विरोध प्रदर्शन की कला
कई बार आंखों देखी घटना भी झूठी साबित होती है! ऐसा ही एक वाकया दिखा बीते दिनों जंतर मंतर पर। यहां निजी अस्पतालों की मनमानी के खिलाफ देश भर से लोग जुटे थे। मानव शृंखला बनाई जानी थी। पुलिस भी चुस्त थी। इतने में एक साथ कई लोग इधर-उधर भागते नजर आए। ज्यादातर के माथे पर पट्टी बंधी थी मानो खून टपक रहा हो। भगदड़ देख कुछ दूर खड़े मीडिया वाले भी दौड़े। सबको लगा कि पुलिस ने शायद लाठियां भांजी है। लेकिन चंद मिनट में माजरा साफ हो गया। सरकार का ध्यान खींचने के लिए सब ने माथे पर लाल रंग से रंगी रूई लगाकर सफेद पट्टी बांधी है। यह सब प्रदर्शन के कला का हिस्सा है। दरअसल, वो दिखाना चाहते हैं कि घायल लोगों को निजी अस्पताल और भी घायल कर देते हैं। एक ने कहा-माथे पर तो बंधी पट्टी की बात समझा लेकिन हाथ में पट्टी क्यों? महिला ने जवाब दिया-केवल माथा ही फटता है क्या? हाथ नहीं टूटता क्या! दुर्घटना के समय लगी चोट से निजी अस्पताल के मनमाने बिल की चोट ज्यादा बड़ी हो जाती है।

बिना तैयारी, फैसला लागू
उच्च शिक्षण संस्थानों में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर उम्मीदवारों को 10 फीसद आरक्षण को लागू करने के सरकार के निर्णय पर कई संस्थानों ने ऊंगली उठानी शुरू कर दी है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले एक स्वायत्त संस्थान के प्रमुख का कहना है कि सरकार बिना तैयारी इस निर्णय को लागू करने जा रही है। इससे भविष्य में बहुत परेशानी होने वाली है। उनका तो यहां तक कहना था कि सरकार ने यह निर्णय सिर्फ मतों के चक्कर में लिया है और इससे शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट आएगी।

सोशल मीडिया की माया
नाच न जाने आंगन टेढ़ा। यह कहावत इन दिनों दिल्ली पुलिस के उपायुक्त पर लागू होती दिख रही है। दरअसल, सोशल मीडिया और अत्याधुनिक तकनीक को अपनाने के नाम पर दिल्ली पुलिस मुख्यालय ने कुछ समय पहले सारे पुलिस उपायुक्तों को अपने-अपने यूनिट की खबरें और अन्य जानकारी देने के लिए एक वाट्सएप ग्रुप बनाने के निर्देश दिए थे। कई उपायुक्तों ने इसका प्रमुखता से पालन किया तो कई बहानेबाज की लाइन में शामिल हो गए। लेकिन एक पुलिस उपायुक्त ने पहले तो अपने वाट्सएप ग्रुप पर सुबह से लेकर देर रात की गतिविधियां देकर वाहवाही बटोरी। कुछ दिन बाद वह कभी-कभार सक्रिय हुए और अंत में ग्रुप ही बंद कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि यह कोई निर्देश नहीं है कि हम ग्रुप चलाएं ही। वैसे उनके ग्रुप में जिसका जो मन होता था लिख देता था। उससे परेशानी हो रही थी। बेदिल ने पता किया कि उपायुक्त को गुरेज था कि उनके अलावा कोई भी इसमें सक्रिय न दिखे। इसलिए बहाना बनाया कि जानकारी सीधे मुख्यालय भेज दी जाएगी। वहीं से सभी को जानकारी मिल जाएगी।

राजनीति का निराला खेल
राजनीति के खेल निराले हैं। एक तरफ दिल्ली में लोकसभा की सात सीटों पर एक साथ चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) में शह और मात का खेल चल रहा है। वहीं दूसरी तरफ ‘आप’ ने अपने छह उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए। सातवें के लिए भी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल को जिम्मेदारी दी गई है। तीन महीने से दोनों दलों में गठबंधन का प्रयास चल रहा है। दिल्ली कांग्रेस के पुराने अध्यक्ष अजय माकन और नई अध्यक्ष शीला दीक्षित दिल्ली के नेताओं की राय लेकर पार्टी हाई कमान को बार-बार बताती हैं कि पार्टी अपने बूते ही चुनाव लड़ेगी, लेकिन हाई कमान के करीब रहने वाले कुछ बड़े नेता शुरू से ही गठबंधन के पक्ष में पार्टी हाई कमान पर दबाव बना रहे हैं। उन नेताओं में से एक दिल्ली से खुद चुनाव लड़ना चाहते हैं दूसरे कांग्रेस को मिली सीटों के बूते ऊपर की राजनीति करने का सपना देख रहे हैं। यह कहा जाता है कि दिल्ली और पंजाब में ‘आप’ कांग्रेस के वोटों के बूते ही राजनीति कर रही है और दिल्ली की सत्ता को भोग रही है। दिल्ली कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि समझौते में जो भी नतीजे आएंगे उसका श्रेय ‘आप’ को मिलेगा। कांग्रेस ‘आप’ की राजनीति से पहले से ही कमजोर हो चुकी है, अब समझौता करने के बाद तो हाशिए पर ही पहुंच जाएगी। इस राजनीति में सबसे अजूबा यह है कि एक तरफ तो ‘आप’ के नेता समझौते के प्रयास में लगे हुए थे, वहीं दूसरी तरफ केजरीवाल कांग्रेस पर तरह-तरह के आरोप लगा रहे थे। अब जब कांग्रेस में समझौते की बात गंभीरता से होने लगी तो ‘आप’ ने एक तरफा अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए।

केजरीवाल का अनशन
भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ने की आशंकाओं के बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री और ‘आप’ प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने पहली मार्च से दिल्ली को पूर्ण राज्य दिलवाने के लिए शुरू करने वाले बेमियादी अनशन को टाल दिया। उनके इस फैसले की जितनी सराहना की जाए कम है। पहली बात तो किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री अनशन पर बैठे यह ही अपने आप में अनहोनी है, दूसरा वे जिस मांग के लिए अनशन करने वाले थे, वह अभी के हिसाब से असंभव मांग है। इसलिए मधुमेह से पीड़ित केजरीवाल का अनशन खत्म करवाना कठिन होता। कायदे में दिल्ली को विधानसभा तो संसद ने संविधान में संशोधन करके दिया है, अब उसमें कोई बदलाव संसद ही कर सकती है। संसद तो भंग होने वाली है, ऐसे में अनशन केवल चुनावी स्टंट बन जाता। इसलिए केजरीवाल के स्वास्थ्य के खातिर व दिल्ली के राजनीतिक माहौल के खातिर उनका अनशन टालना सही रहा।

सेवा में तत्पर
शांति, सेवा और न्याय की बात करने वाली दिल्ली पुलिस पीड़ित की समस्याओं को सुनने के लिए उनके पास जाने की बजाय पीड़ित को थाना या फिर चौकी में पहुंचने की सलाह देती है, जबकि पीसीआर में तैनात पुलिस अधिकारियों को पीड़ित के पास जाकर समस्या सुनने का प्रावधान है। पिछले दिनों ऐसा ही वाकया एक पीड़ित के सामने आया। शख्स की मोटरसाइकिल पार्क के सामने से चोरी हो गई और पीड़ित ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर इसकी जानकारी दी तो उसे सलाह दी गई कि वहां से चंद कदम की दूरी पर एक पुलिस चौकी है। वहां जाकर लिखित में शिकायत करें। हालांकि जब पीड़ित ने इसकी सूचना जिला पुलिस के आला अधिकारियों को दी तो काफी समय बीतने के बाद पुलिस की एक टीम पीड़ित के पास पहुंची। यह कोई पहली घटना नहीं है। कई बार पीड़ित जब बच्चे के गुम होने की सूचना अपने थाना क्षेत्र के पुलिस को देता है तो उसे एक थाने से दूसरे थाने या फिर पुलिस चौकियों का चक्कर काटने को मजबूर किया जाता है।

प्रशिक्षण की पहल
लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा सके इसके लिए पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने सोशल मीडिया सेल के कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की पहल की थी। मकसद गैर सक्रिय कार्यकर्ताओं में लगी ‘जंग’ को खत्म कर उनको फिर से सक्रिय करना था। लेकिन 65 कार्यकर्ताओं में से 27 ही सक्रिय तौर पर इस कार्यशाला में सामने आए। इनमें भी अधिक संख्या में भाजपा के प्रदेश स्तरीय प्रवक्ता शामिल थे। इसलिए सोशल मीडिया से लड़ाई का मकसद पूरा नहीं हो सका।

चेहरा तो दिखाओ
दिल्ली नगर निगम के एक जनसंपर्क अधिकारी को इस बात का मलाल रहता है कि संबंधित लोग उन्हें अपना चेहरा नहीं दिखाते। उक्त अधिकारी इस बात से बहुत खुश होते हैं कि कोई उनके साथ फोटो खिंचाए। हालांकि महाशय को अपने निगम की जानकारी रत्ती भर भी नहीं रहती। बेदिल ने पता किया कि दरअसल अब उनकी नौकरी के कुछ ही दिन शेष बचे हैं। सालों से वे सहायक ही हैं। अब वे रस्सी तोड़कर आगे बढ़ जाना चाहते हैं। लेकिन विभाग है कि उन्हें पूर्ण दायित्व नहीं दे रहा है। इस खीझ में वे हमेशा यही कहते हैं कि ‘यार चेहरा भी तो दिखाओ। महीनों से नहीं देखा। सरकार को आती जाती रहती है। हमें तो यहीं रहना है’।

संकल्प के आगे भूले सुरक्षा
देश में विंग कमांडर अभिनंदन की पाकिस्तान से वापसी के बाद चारों तरफ जश्न का माहौल है। इसे भाजपा ने देश भर में विजय संकल्प यात्रा के तौर पर आयोजित किया। ये रैली मोटरसाइकिल के माध्यम से हुई। इसमें खुले आम भाजपा के नेता बिना हेल्मेट दोपहियां वाहन दौड़ाते नजर आए। हालांकि जानकार बताते हैं कि इससे पूर्व हुई रैलियों से सबक लेते हुए पार्टी के शीर्ष नेतृत्त्व ने पहले ही कार्यकर्ताओं को हिदायत जारी की थी कि वे हेल्मेट के साथ ही सड़कों पर उतरें। लेकिन विजय संकल्प रैली के आगे नेताजी और उनके कार्यकर्ता सुरक्षा को लेकर सचेत नजर नहीं आए।
-बेदिल

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