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दिल्ली मेरी दिल्ली: किसका कटेगा टिकट

दिल्ली की सात लोकसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव में सभी दलों की अपनी-अपनी परेशानी है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) में तालमेल पर अनिश्चितता दोनों दलों के नेताओं की ओर से बार-बार हो रहे इनकार के बावजूद खत्म होने का नाम नहीं ले रही है।

Author February 11, 2019 5:40 AM
दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित और सीएम अरविंद केजरीवाल।

दिल्ली की सात लोकसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव में सभी दलों की अपनी-अपनी परेशानी है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) में तालमेल पर अनिश्चितता दोनों दलों के नेताओं की ओर से बार-बार हो रहे इनकार के बावजूद खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। वहीं भाजपा की समस्या है कि इन सभी सीटों पर उसके ही सांसद हैं और चर्चा है कि कुछ सांसदों का टिकट कट सकता है। सात सीटों में से ज्यादातर पर हाई प्रोफाइल नेता काबिज हैं जिनका टिकट काटना मुश्किल माना जा रहा है। दिल्ली में भाजपा और आरएसएस के ज्यादातर बड़े नेता आसानी से मिल जाते हैं, इसलिए दिल्ली के ज्यादातर सांसदों का उनसे सीधा संपर्क है। इसी को भांपकर शायद पार्टी ने रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को चुनाव प्रभारी बनाया है जो अन्य नेताओं की तरह दिल्ली के नेताओं से कम ही राब्ता रखती हैं। दिल्ली कांग्रेस में गुटबाजी इस कदर है कि एक तरफ तो कई सांसदों की सीट बदलने की खबर है तो दूसरी तरफ सभी सांसदों के टिकट कटने की चर्चा चल रही है। चुनाव की इस तैयारी में न तो संगठन को दुरुस्त करने पर जोर दिया जा रहा है और न ही गुटबाजी कम करने की कवायद होती दिख रही है।

किसानों के हितैषी
दिल्ली-हरियाणा सीमा के करीब सौ गांवों में कहने को तो अभी भी खेती होती है, लेकिन शहरीकरण ने दिल्ली के 1483 वर्ग किलोमीटर के ज्यादातर इलाकों को कंक्रीट का जंगल बना दिया है। जिन लोगों के पास खेती लायक जमान बची है उन पर भी लगातार अतिक्रमण करके अनधिकृत कॉलोनी बनाने का काम जारी है, इसलिए लंबे समय तक दिल्ली के उपराज्यपाल रहे विजय कपूर का मानना था कि सरकार खेती के लिए बची जमीन का अधिग्रहण करके लैंड पूल बनाए और बचे हुए इलाके को सुनियोजित तरीके से विकसित करे। अभी तक इस पर ठोस काम शुरू नहीं हुआ है। वोट और नोट की राजनीति में खेती करने वालों को कई सहूलियतें मिलती रही हैं और अवैध निर्माण होते रहे हैं। फिलहाल दिल्ली पर राज कर रही आम आदमी पार्टी की सरकार किसानों को फसल का वाजिब दाम देने की कवायद शुरू कर यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि सिर्फ वही किसानों की असली हितैषी है।

गुम होते निर्देश
देश के विश्वविद्यालय संकाय आरक्षण की व्यवस्था पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देश नहीं मान रहे हैं। दूसरी ओर, सरकार के मंत्री की ओर से संसद में कहा जा रहा है कि इस मसले के हल होने तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से सभी विश्वविद्यालयों से नियुक्तियां नहीं करने के लिए कहा गया है। इसके बावजूद कुछ विश्वविद्यालयों ने नियुक्तियों के लिए विज्ञापन जारी किया है। अब यह समझ से परे है कि मंत्री संसद को सही स्थिति नहीं बता रहे हैं या विश्वविद्यालयों तक यूजीसी के निर्देश नहीं पहुंच रहे हैं।

शौचालयों की सुध
शहर को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) बनाने के लिए सड़कों के किनारे रखे गए सामुदायिक शौचालय गंदगी की बड़ी वजह बनते जा रहे हैं। स्वच्छता सर्वेक्षण के दौरान साफ-सफाई पर जोर देने के अलावा खुले में शौच करने वालों पर अंकुश लगाने के लिए इन्हें भीड़-भाड़ वाली जगहों पर अस्थायी तौर पर रखा गया है, लेकिन लापरवाही और अनदेखी का आलम यह है कि कई अस्थायी सामुदायिक शौचालयों में चढ़ने के लिए सीढ़ी तक नहीं है। इसके कारण जनता इनका इस्तेमाल नहीं कर पा रही है। साथ ही जिन जगहों पर ये शौचालय प्रयोग में हैं, वहां इतनी गंदगी है कि वहां तक जाने में लोगों के जूते से लेकर कपड़े तक कीचड़ में सन रहे हैं। लोगों के मुताबिक, 31 जनवरी तक ही इन शौचालयों की साफ-सफाई समेत अन्य व्यवस्थाएं ठीक थीं। उसके बाद से कोई इनकी सुध नहीं ले रहा है।

मुद्दे की तलाश
दिल्ली के कांग्रेस पार्षदों को फिलहाल एक अदद मुद्दे की तलाश है। सालों तक दिल्ली की सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस इस वक्त दिल्ली में सरकार चला रही आम आदमी पार्टी और नगर निगम में सत्तारूढ़ भाजपा में हो रहे घमासान को मूक दर्शक बनकर देख रही है है। वह जबरन विरोध भी नहीं कर सकती, लिहाजा अपनी बात रखने के लिए एक अदद मुद्दे की तलाश कर रही है। बीते दिनों पूर्वी निगम में ‘आप’ और भाजपा के पार्षदों के बीच हुई भिडंÞत के बाद कांग्रेस के एक पार्षद ने कहा कि हम लोग तो कहीं के नहीं रहे। विधानसभा में भी ‘आप’ और भाजपा और निगम में भी इन्ही दोनों दलों की चल रही है। हमें तो मुद्दे भी नहीं मिल रहे कि विरोध कर सुर्खियां बटोरी जाएं। तो क्या हम लोग घर बैठ जाएं या फिर इंतजार करें उस दिन का, जब हमारी भी सुनी जाएगी। मतलब कांग्रेस के पास पछताने के सिवा कोई चारा नहीं बचा है।

अदालत की धौंस
दिल्ली यातायात पुलिस अपनी करतूतों से बाज नहीं आने वाली है। सड़क पर छिपकर चालान काटना और फिर विरोध करने पर हाथापाई पर उतर पाना उसका रोज का काम हो गया है। बीते दिनों प्रगति मैदान के भैरो रोड और अक्षरधाम मंदिर के पास ऐसे ही दो मामले सामने आए, जहां यातायात पुलिस की दादागीरी देखने को मिली। प्रगति मैदान के पास भैरो रोड पर पेड़ की ओट में छिपे यातायात पुलिसकर्मी अपने शिकार की तलाश में रहते हैं। फिर जैसे ही कोई वाहन निशाने पर आता है तो सिर्फ उसका चालान ही नहीं काटा जाता बल्कि चालान के नाम पर और भी बहुत कुछ किया जाता है, जिसके लिए पुलिस अधिकृत भी नहीं है। इसी तरह अक्षरधाम मंदिर के पास यातायात पुलिस ने एक गाड़ी का दो बार चालान काटा और विरोध करने पर गाड़ी में रखा सामान सड़क पर बिखेर दिया। ऊपर से पुलिसकर्मियों ने धमकी भी दी कि वे अदालत के आदेश पर चलते हैं न कि अपने अधिकारियों के निर्देश पर।

औचित्य पर सवाल
तुगलकी फैसले कई बार नेताओं की फजीहत कराते नजर आते हैं। ऐसा ही एक मामला दिखा दरियागंज में। मौका था गोलचा सिनेमा के नजदीक की सड़क पर स्पीड ब्रेकर बनाने के काम की शुरुआत का। इस सड़क पर अमूमन हर वक्त वाहन धीमी गति से रेंगते रहते हैं। हमेशा जाम में फंसी रहने वाली इस सड़क पर स्पीड ब्रेकर बनाने का काम शुरू हुआ तो इसके औचित्य पर ही सवाल उठने लगे। बहरहाल दोनों तरफ की आधी-आधी सड़क पर स्पीड ब्रेकर बन चुके हैं और इन्हें जल्द से जल्द पूरा भी किया जाना है। लेकिन इस सड़क से गुजरने वाला हर इंसान यही कहता है कि जिस सड़क पर हमेशा गाड़ियां रेंगती नजर आती हों वहां स्पीड ब्रेकर का क्या काम? इस पर किसी ने कहा कि बजट बनाया गया है तो काम तो होगा ही और काम होगा तभी तो पद और सत्ता वालों का भी ‘काम’ चलेगा! पैसा जनता का है तो क्या हुआ आखिर वे भी तो जनता के ही प्रतिनिधि हैं। और फिर चुनाव भी सिर पर हैं तो वोट भी तो चाहिए।
-बेदिल

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