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कब खत्म होगी सरकारी कागजों पर बेदाग होने की जंग!

गीता के यथारूप काव्यात्मक निरूपण प्रज्ञा वेणु और रुद्रावतार जैसे महाकाव्य को रचने वाले और जीवन के 70 बसंत देख चुके उद्भ्रांत आज युवाओं की तरह लिखते हैं लेकिन सरकारी भ्रष्टाचार से पार पाने में नाकाम हो रहे हैं।

Author नई दिल्ली | November 19, 2017 03:16 am
रमाकांत शर्मा उद्भ्रांत ।

रमाकांत शर्मा उद्भ्रांत की पहचान एक ऐसे साहित्यकार के रूप में है जो खूब लिखते हैं। गीता के यथारूप काव्यात्मक निरूपण प्रज्ञा वेणु और रुद्रावतार जैसे महाकाव्य को रचने वाले और जीवन के 70 बसंत देख चुके उद्भ्रांत आज युवाओं की तरह लिखते हैं लेकिन सरकारी भ्रष्टाचार से पार पाने में नाकाम हो रहे हैं। 31 मई 2010 को सेवानिवृत्ति के बाद आज तक ये उस मामले को अपने कंधे पर ढो रहे हैं जिसमें वे प्राथमिक स्तर पर ही पाक-साफ बता दिए गए थे। दूरदर्शन के सेवानिवृत्त उपमहानिदेशक उद्भ्रांत प्रधानमंत्री कार्यालय तक शिकायत पहुंचा चुके हैं। लेकिन साढ़े चार सालों में ये अदालत के कठघरे में खुद को बेदाग साबित नहीं कर पाए हैं। जुलाई 2009 में उद्भ्रांत ने ‘किरण’ नाम के एक कमीशंड कार्यक्रम को प्रसारित किया। आरोप लगाया गया कि उन्होंने यह कार्यक्रम आला अधिकारियों की नाफरमानी कर प्रसारित किया। लेकिन उद्भ्रांत का कहना है कि उन्होंने यह कार्यक्रम तत्कालीन डीजी के ही कहने पर चलाया था। इसके बाद मई 2010 में उनकी सेवानिवृत्ति होती है। सेवानिवृत्ति के समय उनकी सेवानिवृत्ति पुस्तिका को बेदाग बताया गया। लेकिन उनकी सेवानिवृत्ति के तीन साल बाद और चार साल पूरा होने के थोड़ा पहले उन्हें सूचना व प्रसारण मंत्रालय की तरफ से आरोपपत्र भेजा गया। उद्भ्रांत के मुताबिक, नियम कहता है कि सेवानिवृत्ति के चार साल पूरे होने के बाद किसी तरह की जांच नहीं हो सकती है।

उद्भ्रांत कहते हैं कि मार्च 2013 के बाद अक्तूबर तक यह जांच प्राथमिक अवस्था में ही थी। सुप्रीम कोर्ट तक ने यह कहा है कि कोई गंभीर मामला नहीं हो तो घरेलू जांच छह महीने या अधिकतम एक साल में पूरी हो जानी चाहिए। वे कहते हैं कि जिस कार्यक्रम के प्रसारण के लिए मुझे आरोपी बनाया गया है उसे लेकर दूरदर्शन की तत्कालीन डीजी अरुणा शर्मा ने फरवरी 2010 में एक फाइल में लिखा था कि कार्यक्रम समिति ने ‘किरण’ की लोकप्रियता को देखते हुए इसके विस्तार को मंजूरी दी। इस समिति की बैठक के मिनट पर डीजी समेत सभी सदस्यों के हस्ताक्षर भी हैं। और इसी आधार पर अरुणा शर्मा ने मुझे और मेरे साथ एक और अधिकारी को दिया गया नोटिस वापस ले लिया था। उद्भ्रांत कहते हैं कि सेवाकाल में ही मैं बेदाग साबित कर दिया गया था। मैंने इस मामले में दस्तावेज मुहैया कराने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय को लिखा था और मंत्रालय ने प्रसार भारती को निर्देश भी दिया था कि मुझे सारे दस्तावेज मुहैया करा दिए जाएं। उद्भ्रांत ने कहा कि मैंने प्रसार भारती से एक फाइल का ब्योरा मांगा था जिसमें डीजी दूरदर्शन ने नोटिस वापस लेते हुए फाइल प्रसार भारती के तत्कालीन सीईओ बीएस लाली को भेजी थी। लेकिन प्रसार भारती ने यह जानकारी नहीं दी कि सीईओ ने डीजी के फैसले पर क्या रुख अपनाया। वे कहते हैं, ‘मेरे लिए यह जानकारी अहम है ताकि मैं अपना पक्ष रख सकूं’।

उद्भ्रांत ने सूचना व प्रसारण मंत्रालय के निर्देश की प्रसार भारती द्वारा नाफरमानी पर प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र भी लिखा। उन्होंने कहा कि चूंकि प्रसार भारती मुझ पर लगे आरोपों को न तो साबित कर सका और न ही मुझे दस्तावेज मुहैया कराए। जब खुद को बेदाग होने की पहल की तो अमला जागा और इन सबके बाद पिछले महीने 19 अक्तूबर को मुझे जांच अधिकारी की तरफ से पत्र मिलता है कि मेरे मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को तय की गई है। और ऐसा तब किया गया जब कार्रवाई स्थगित करने की मेरी अर्जी न केवल स्वीकृत हुई बल्कि उस पर बहस के लिए 30 अक्तूबर की तारीख भी तय की गई। मैंने 20 अक्तूबर को सुनवाई फिर से जारी करने के खिलाफ स्टे एप्लीकेशन दिया था। स्टे की अपील इस साल 31 अक्तूबर को सूचीबद्ध भी हो गई थी और प्रसार भारती ने इसका जवाब देने के लिए समय भी मांगा था। उद्भ्रांत सवाल उठाते हुए कहते हैं कि क्या हम जैसे लोगों को प्रताड़ित करने के लिए ही सरकारी विभागों में सतर्कता शाखा की स्थापना की गई थी। यह विभाग एक बेदाग सरकारी अधिकारी के सेवानिवृत्ति के चार साल पूरे होने के पहले उसे पेंशन कटौती जैसी सजा का आरोपपत्र देता है। प्रधानमंत्री कार्यालय और सूचना व प्रसारण मंत्रालय के निर्देशों की भी इन्हें परवाह नहीं है। मेरे जैसा पढ़ने-लिखने और सामाजिक, सांस्कृतिक रूप से सक्रिय व्यक्ति जब इंसाफ पाने में बुरी तरह थक चुका है तो आम लोगों का क्या हाल होता है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

 

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