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पंजाब चुनाव के नतीजे तय करेंगे दिल्ली नगर निगमों का भविष्य

पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे दिल्ली नगर निगमों के चुनाव को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले हैं।

Author नई दिल्ली | February 5, 2017 2:51 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (PTI File Photo)

पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे दिल्ली नगर निगमों के चुनाव को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले हैं। दिल्ली और पंजाब के मतदाताओं और राजनीति का समीकरण भी कमोबेश एक जैसा ही है। इससे पहले पंजाब के कांग्रेस और अकाली-भाजपा के नेता दिल्ली सरकार की ओर से बनाए गए 21 संसदीय सचिवों की सदस्यता रद्द होने की स्थिति में उपचुनाव का इंतजार कर रहे थे, लेकिन सुनवाई पूरी होने के बाद आज तक इस मामले में चुनाव आयोग का फैसला ही नहीं आया। आरोप लग रहा था कि इसी कारण दिल्ली सरकार में काबिज आप के नेता निगमों के परिसीमन में जान-बूझ कर देरी करवा रहे हैं, जिससे निगम चुनाव समय पर न हो पाए।

4 फरवरी को पंजाब में चुनाव होने की सूचना के बाद आनन-आनन में परिसीमन की फाइल उपराज्यपाल को भेजी गई और अब लगता है कि निगमों के चुनाव अगले महाने के अंत तक हो जाएंगे, जिससे नए वित्त वर्ष में तीनों निगमों का गठन हो सके। अनुमान है कि सीटों के आरक्षण का काम भी 15 फरवरी तक पूरा कर लिया जाएगा। निगम की आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं और पहले साल तीनों निगमों में महिला पार्षद ही मेयर चुनी जाती हैं। दस साल से निगमों में भाजपा का शासन है। उत्तरी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली नगर निगम में तो भाजपा को पूरा बहुमत मिला था, लेकिन दक्षिणी दिल्ली में वह 44 सीटें लेकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और पांच साल तक सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर भाजपा के ही पार्षद चुने जाते रहे हैं। अब तक कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुकाबला होने से दोनों पार्टी बारी-बारी से सत्ता में आती रहीं। 1993 में संविधान में स्थानीय निकायों के लिए हुए 73वें संशोधन के बाद दिल्ली नगर निगम की 13 सीटों में से एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित की गर्इं और हर साल मेयर आदि के चुनाव का विधान बना। इसके तहत 1997 में हुए पहले चुनाव में भाजपा और 2002 में कांग्रेस जीती। 2007 के निगम चुनाव में सीटों की संख्या 13 से बढ़ाकर 272 कर दी गई और आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गर्इं। इस चुनाव में भी कांग्रेस की हार हुई और भाजपा जीती। उसके बाद दिल्ली सरकार के समानांतर निगम की सत्ता से परेशान तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने निगम के बंटवारे के लिए कमेटी बनाई और केंद्र सरकार की मदद से एक के बजाए तीन निगम बनवा दिए। संयोग से 2012 के चुनाव में भी गैर-भाजपा मतों के विभाजन के कारण भाजपा चुनाव जीत गई।

वहीं पहली बार राजनीति में आई आम आदमी पार्टी ने 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में 28 और 2015 के चुनाव में 70 में से 67 सीटें जीत कर तहलका मचा दिया, लेकिन दिल्ली की राजनीति को करीब से न जानने वाले नेताओं की बहुतायत के कारण आप के एजंडे से निगमों के परिसीमन आदि बाहर रहे। मई 2016 के निगम उपचुनाव ने पहली बार आप को निगम की ताकत का एहसास कराया। इस चुनाव में आप को 13 में 6 सीटें तो मिलीं, लेकिन विधानसभा चुनाव जैसी सफलता नहीं मिली। वहीं आप को परेशान करने वाली खबर यह रही कि जिस कांगे्रस के वोटों पर आप की बुनियाद खड़ी हुई, उसकी वापसी होती दिखने लगी। कांग्रेस को एक बागी समेत पांच सीटें मिलीं। इस चुनाव के बाद आप का तंत्र परिसीमन में पूरी तरह सक्रिय हो गया। निगम के विधान के मुताबिक हर दस साल पर नई जनगणना के हिसाब से निगमों की सीटों का परिसीमन किया जाता है और उसके हिसाब से नया चुनाव होता है।

दिल्ली के उपराज्यपाल की 18 सितंबर 2015 की अधिसूचना से परिसीमन का काम शुरू हुआ. जिसे जुलाई 2016 में पूरा किया जाना था। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त राकेश मेहता ने ऐसे दावे भी किए थे, लेकिन उपचुनाव के बाद अचानक काम की गति धीमी हो गई और समय पर रिपोर्ट दिलवाने के लिए कांग्रेस ने आयोग के दफ्तर पर प्रदर्शन किया। मेहता ने रिटायर होने से पहले नवंबर की शुरुआत में अपनी रिपोर्ट दिल्ली सरकार को सौंप दी, जिसे सरकार ने पिछले महीने उपराज्यपाल को भेजा और उन्होंने परिसीमन की मंजूरी दी। इससे यह तो तय हो गया कि अब चुनाव तय समय पर ही होंगे। माना जा रहा है कि अगर पंजाब विधानसभा के नतीजे आप के अनुरूप आए तो इसका सीधा लाभ उसे निगम चुनाव में मिलेगा और भाजपा का पत्ता साफ हो जाएगा। वहीं अगर कांग्रेस पंजाब में जीती तो उसकी भी दिल्ली में निगमों के रास्ते सत्ता में वापसी हो सकती है। वैसे राजनीतिक विशेषज्ञों को उम्मीद तो नहीं है, लेकिन फिर भी अगर पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन वापस आता है तो दिल्ली में भी भाजपा बनी रहेगी। भाजपा ने अपने तय 36 फीसद वोटों को बढ़वाने के लिए ही बिहार के लोकप्रिय भोजपुरी गायक मनोज तिवारी को दिल्ली की कमान सौंपी है।

 

 

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