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तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाने वाला अध्यादेश मंजूर

केंद्रीय कैबिनेट ने एक साथ तीन तलाक (तलाके-बिद्दत) को दंडनीय अपराध बनाने के लिए बुधवार को एक अध्यादेश को मंजूरी दे दी।

Author नई दिल्ली, 19 सितंबर। | September 20, 2018 9:36 AM
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से तीन तलाक की कुप्रथा पर पाबंदी लगाए जाने के बाद भी यह जारी है, जिसके कारण अध्यादेश लागू करने की आवश्यकता महसूस हुई।

केंद्रीय कैबिनेट ने एक साथ तीन तलाक (तलाके-बिद्दत) को दंडनीय अपराध बनाने के लिए बुधवार को एक अध्यादेश को मंजूरी दे दी। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से तीन तलाक की कुप्रथा पर पाबंदी लगाए जाने के बाद भी यह जारी है, जिसके कारण अध्यादेश लागू करने की आवश्यकता महसूस हुई। प्रस्तावित अध्यादेश के तहत एक साथ तीन तलाक देना अवैध और निष्प्रभावी होगा और इसमें दोषी पाए जाने पर पति को तीन साल जेल की सजा का प्रावधान है। प्रस्तावित कानून के दुरुपयोग की आशंकाएं दूर करते हुए सरकार ने इसमें कुछ सुरक्षा उपाय भी शामिल किए हैं। जैसे ट्रायल से पहले आरोपी के लिए जमानत का प्रावधान किया गया है। इन संशोधनों को कैबिनेट ने 29 अगस्त को मंजूरी दी थी। प्रसाद ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा-अध्यादेश लाने की अत्यधिक अनिवार्यता थी क्योंकि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी यह कुप्रथा धड़ल्ले से जारी है। कानून मंत्री ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा कि वह वोट बैंक के दबावों के कारण राज्यसभा में लंबित विधेयक का समर्थन नहीं कर रही।

उन्होंने कहा- यह मेरा गंभीर आरोप है कि सोनिया गांधी जी ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। वे चुप हैं। राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लैंगिक न्याय और गरिमा से जुड़ा है। प्रसाद ने लैंगिक न्याय, लैंगिक समानता और लैंगिक गरिमा की खातिर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, बसपा सुप्रीमो मायावती और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से अपील की कि वे संसद के अगले सत्र में विधेयक का समर्थन करें। प्रस्तावित कानून में अपराध को गैर-जमानती बनाया गया है, लेकिन आरोपी ट्रायल से पहले भी मजिस्ट्रेट की अदालत में जमानत की गुहार लगा सकता है। गैर-जमानती अपराध में आरोपी को पुलिस थाने से जमानत नहीं दी जाती। इसके लिए अदालत का रुख करना होता है। प्रसाद ने कहा कि मजिस्ट्रेट आरोपी की पत्नी का पक्ष सुनने के बाद जमानत मंजूर कर सकते हैं। बहरहाल सूत्रों ने बताया कि मजिस्ट्रेट को सुनिश्चित करना होगा कि जमानत तभी दी जाए जब पति विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक पत्नी को मुआवजा देने पर सहमत हो जाए। मुआवजे की राशि मजिस्ट्रेट को तय करना है।

पुलिस तीन तलाक के मामलों में प्राथमिकी तभी दर्ज करेगी जब पीड़िता, उसके सगे-संबंधी या उसकी शादी की वजह से रिश्तेदार बन चुके लोग पुलिस का रुख करें। प्रस्तावित कानून के मुताबिक पड़ोसी और अन्य शिकायत नहीं दाखिल कर सकते। प्रसाद ने कहा कि ऐसे अपराध के मामलों में किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष समझौता भी हो सकता है। बशर्ते प्रभावित महिला इसके लिए रजामंद हो। तीन तलाक की प्रथा को बर्बर और अमानवीय करार देते हुए उन्होंने कहा कि करीब 22 देशों ने तीन तलाक का नियमन किया है, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के कारण भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में लैंगिक न्याय की पूरी अनदेखी की गई। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल तीन तलाक की कुप्रथा पर पाबंदी लगा दी थी। लेकिन यह कुप्रथा अब भी जारी रहने के कारण इसे दंडनीय अपराध बनाने के लिए एक विधेयक लाया गया था।

अध्यादेश को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हस्ताक्षर किए

प्रस्तावित कानून में अपराध को गैर-जमानती बनाया गया है, लेकिन आरोपी ट्रायल से पहले भी मजिस्ट्रेट की अदालत में जमानत की गुहार लगा सकता है। ’गैर-जमानती अपराध में आरोपी को पुलिस थाने से जमानत नहीं दी जाती। इसके लिए अदालत का रुख करना होता है। ’मजिस्ट्रेट आरोपी की पत्नी का पक्ष सुनने के बाद जमानत मंजूर कर सकते हैं। जब पति विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक पत्नी को मुआवजा देने पर सहमत हो जाए, तभी मिलेगी जमानत। मुआवजे की राशि मजिस्ट्रेट को तय करना है।

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