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प्रणब मुखर्जी ने लौटा दिया था बिल, वरना आप के सामने यह समस्‍या ही नहीं आती

उसके 20 विधायकों को दिल्ली हाईकोर्ट ने राहत देते हुए उनकी सदस्यता बहाल करने का आदेश दिया और चुनाव आयोग को फिर से उनके मामले की सुनवाई करने को कहा। चुनाव आयोग की सिफारिश पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 22 जनवरी को 20 आप विधायकों की सदस्यता रद्द करने संबंधी नोटिफिकेशन पर हस्ताक्षर किया था।

Author नई दिल्ली | March 23, 2018 5:06 PM
भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी। (फाइल फोटो)

माफीनामा प्रकरण में लोगों के निशाने पर आए अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी (आप) के लिए आज (23 मार्च) का दिन थोड़ा सुकून लेकर आया। उसके 20 विधायकों को दिल्ली हाईकोर्ट ने राहत देते हुए उनकी सदस्यता बहाल करने का आदेश दिया और चुनाव आयोग को फिर से उनके मामले की सुनवाई करने को कहा। चुनाव आयोग की सिफारिश पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 22 जनवरी को 20 आप विधायकों की सदस्यता रद्द करने संबंधी नोटिफिकेशन पर हस्ताक्षर किया था। बता दें कि आप का मौजूदा संकट पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा एक बिल पर हस्ताक्षर नहीं करने से उत्पन्न हुआ है।

दरअसल, अरविंद केजरीवाल सरकार ने 13 मार्च, 2015 को एक नोटिफिकेशन जारी कर 21 आप विधायकों को मंत्रियों का संसदीय सचिव नियुक्त किया था। तब इस मामले पर खूब हंगामा हुआ और इसे लाभ का पद कहा गया। नियमों के मुताबिक दिल्ली के मुख्यमंत्री का ही संसदीय सचिव अब तक होता आया था लेकिन केजरीवाल सरकार ने उस परंपरा से आगे जाकर 21 विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया था। लाभ का पद मामले में बढ़ते बवाल को देखते हुए केजरीवाल सरकार ने 24 जून 2015 को दिल्ली विधानसभा में कानून संशोधन करके संसदीय सचिवों के पद को लाभ का पद के दायरे से बाहर कर दिया और इस बिल को मंजूरी के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भेज दिया।

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इसके बाद करीब एक साल बाद 13 जून, 2016 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस बिल पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और बिल लौटा दिया। इसी बीच प्रशांत पटेल नाम के वकील ने राष्ट्रपति के यहां याचिका दायर कर आप के सभी 21 विधायकों को लाभ का पद का आरोपी ठहराते हुए उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की। प्रणब मुखर्जी ने तब उनकी याचिका चुनाव आयोग को भेज दी थी और उस पर कार्रवाई रिपोर्ट भी तलब किया था।

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