ताज़ा खबर
 

दिल्ली: पार्क में लगती है गरीब बच्चों की पाठशाला, आपसी मदद से दी जा रही है अमीरों वाली सुविधाएं

इस स्कूल में बिल्कुल ‘गुरूकुल की तरह’ पेड़ों की छांव में बतरा इन बच्चों बच्चों की पाठशाला चलातीं हैं। इतना ही नहीं वह इन बच्चों के पोषण का भी ख्याल रखतीं हैं और इसके महत्त्व को भी बतलाती हैं।

Author नई दिल्ली | March 13, 2017 2:52 AM

 

अमेलश राजू

गरीब बच्चों तक अमीरों के बच्चों को मिलने वाली सुविधाएं पहुंचाने का सपना तो देश की लगभग सभी पार्टियों ने दिखा। लेकिन कूड़ा चुनकर जीवन जीने के लिए अभिशप्त बच्चों के जीवन स्तर में वाकई सुधार करने का जज्बा देखना हो तो कभी इंदिरापुरम के हाथी पार्क में आकर 64 साल की जया बतरा से मिलिए। जब लोग सुबह सुबह इस सैर करने जा रहे होते हैं तो अक्सर जया को यहां बच्चों के बीच गर्म दूध से भरी बाल्टी और स्टील का गिलास लिए देखा जा सकता है। इस पार्क में उनकी यह आवाज अक्सर पूछती सुनाई देती है ‘सभी बच्चे ने दूध और प्रोटीनेक्स बिटामिन पी लिया ना? कोई छूटा तो नहीं? बच्चों के जिस झुंड से जया घिरीं हैं वह झुग्गी झोपड़ी और कूड़ा बिनने वाले बच्चों का समूह है। वह इन बच्चों को विटामिन युक्त दूध पिलाकर शिक्षा का अलख जगाने का प्रयास कह रही हैं। जया बतरा की कोशिश है कि वे बच्चे जिनके माता पिता झुग्गी-झोपड़ी में रहकर जीवन यापन करते हैं या कूड़ा चुनने को अपना भाग्य समझते हैं, उन्हें भी बड़े लोगों के बच्चों की तरह सभी मूलभूत सुविधाएं मिले। वे भी पढ़ लिखकर एक सभ्य नागरिक बने और मुख्य धारा में शामिल हों। दिल्ली से सटे इंदिरापुरम का हाथी पार्क जिससे अवंतिका पार्क के नाम से भी जाना जाता है। यह एक अच्छे स्कूल की शक्ल अख्तियार करता नजर आ रहा है। जया शिक्षा के साथ खेलकूद के वे तमाम उपकरण यहां उपलब्ध करने की कोशिश में हैं। ताकि कूड़ा चुनने वाले उन बच्चों को भी वो सुविधा मिल सके जो अच्छे घरों के बच्चों को मिला करतीं हैं। इस स्कूल में बिल्कुल ‘गुरूकुल की तरह’ पेड़ों की छांव में बतरा इन बच्चों बच्चों की पाठशाला चलातीं हैं। इतना ही नहीं वह इन बच्चों के पोषण का भी ख्याल रखतीं हैं और इसके महत्त्व को भी बतलाती हैं।

यह सब देख कर बतरा से कुछ पूछने की कोशिश की तो एकबारगी तो चौंक गई। हमने उनसे उनके बारे में जानने की कोशिश की बतरा ने कहा कि वह दिलशाद गार्डन के ग्रीन फिल्ड स्कूल में 30-35 साल तक बतौर शिक्षिका रहीं। उन्होंने यह बात सालती रही कि आखिर शिक्षा में बच्चों में भेदभाव क्यों? कोई बच्चा एयरकंडीशन बस से स्कूल जाता है। खेलने के लिए जूड़ो, टेबल टेनिस, वॉलीबाल आदि के लिए सर्वोत्तम सुविधाएं मिल जाती हैं। उसी उम्र के सैकड़ों बच्चे कूड़ा बिनने और मजदूरी करने को अभिशप्त होते हैं। पढ़ाई क्या होती है और पढ़ाई के क्या साधन हो सकते हैं, इसके बारे में न तो उन्हें कोई बताने वाला होता है और नहीं उनके पास इसे समझने का वक्त ही होता है। बतरा कहती हैं बच्चों के लिए ऐसा करने की प्रेरणा उन्हें अपने पति से मिली है। उन्होंने बताया कि वे एक बड़े मीडिया हाउस में काम करते थे। वे कहते थे कि समाजसेवा भी हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है। तब यह बात समझ में ज्यादा नहीं आती थी। लेकिन पति के असमय निधन के बाद एक बेटा और एक बेटी को पढ़ाने का जिम्मा उनके ऊपर आया तब लगा कि वे (पति) सही कहते थे। बेटा नमन बतरा और बेटी अन्नपूर्णा को समय देने के बाद जो समय मिला वह इन बच्चों को सौंप दिया। दोनों बच्चे पांच सितारा होटलों में अच्छे पदों पर हैं। वह कहती हैं ‘मेरे लिए पार्क में पढ़ रहे इन बच्चों का भविष्य संवारना चुनौती है। अब कई लोग मेरे साथ आगे आए हैं।

वो आर्थिक मदद के लिए भी तैयार हैं। कई पढ़ी लिखी महिलाएं भी उनके साथ सहयोग दे रही हैं। इनमें देवयानी चक्रवर्ती, मंजू सिंह और अनिता वत्स शामिल हैं। कोर्स की पढ़ाई अलावा चंदन और गजेंद्रइन बच्चों को स्केटिंग सिखाते हैं। उमेश जूड़ो व अन्य खेल सिखाते हैं। स्वाति ने योगा के लिए ड्रेस उपलब्ध कराए हैं। इतना ही नहीं बतरा के प्रयास से इन बच्चों को दो बार पांच सितारा होटलों में भोजन करने और अन्य बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम में सिरकत करने का मौका भी मिल चुका है।

 

 

विधानसभा चुनाव 2017: पांचों राज्यों के नतीजे आने के बाद किसने क्या कहा

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App