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दिल्ली: पांचसितारा अस्पतालों में गरीब मरीजों के लिए जगह नहीं, गरीब कोटे से नहीं मिल रहा इलाज

पापड़ बेलने के बाद मरीज को जो सुविधा मुफ्त मिलती है वह यह है कि मरीज को अस्पताल के डॉक्टर का परामर्श शुल्क नहीं देना होगा, जो गरीब मरीजों के लिहाज से काफी मोटी रकम होती है।
Author नई दिल्ली | July 31, 2017 00:27 am
दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में बुखार से पीड़ित मरीज। (AP Photo/Manish Swarup/15 Sep, 2016)

सरकारी जमीन पर चल रहे पांचसितारा अस्पतालों में गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज आज भी नामुमकिन है। किसी अधिकारी या नेता की सिफारिश के बिना कोई गरीब मरीज इन अस्पतालों में घुस तक नहीं पाता और अगर कोई छोटी-मोटी सिफारिश लगाकर यहां आ भी जाए तो उसे कभी लंबी तारीख के नाम तो कभी दूसरे कारण गिना कर टालने की पूरी कोशिश की जाती है। इतने पर भी अगर कोई मरीज मजबूरी में अस्पताल के चक्कर लगाने को तैयार हो जाए तो उसे नाममात्र की ही सुविधाएं मुफ्त मिलती हैं। बाकी के मोटे खर्च की रकम उसे अपनी जेब से ही चुकानी पड़ती है, फिर चाहे उसे किसी से कर्ज लेना पड़े या अपना घर या जेवर बेचना पड़े।

ऐसा ही एक वाकया तब सामने आया जब मरीज धर्मनारायण मिश्र किडनी (गुर्दे) के इलाज के लिए अपोलो अस्पताल पहुंचे। लेकिन इसके लिए उनको बीमारी की हालत में ही पहले दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री से इलाज की गुहार लगानी पड़ी। मंत्री के विशेष कार्याधिकारी निकुंज अग्रवाल ने मंत्री की चिट्ठी दी और जुलाई 2016 में अपोलो अस्पताल को गरीब कोटे (ईडब्लूएस) के तहत मिश्र का इलाज करने के निर्देश दिए, जिस पर उसी समय पंजीकरण हो गया था। लेकिन सहायक नोडल अधिकारी की ओर से डी श्रेणी में पंजीकरण किया गया था। इतना ही नहीं, इलाज के लिए अस्पताल ने तीन साल की प्रतीक्षा सूची बता कर मरीज को टरका दिया। इस बीच मरीज को दूसरे निजी अस्पतालों से भी मदद लेनी पड़ी।

कुछ दिन पहले तबीयत बिगड़ जाने के कारण मरीज को दोबारा भर्ती करने की नौबत आई। तो फिर सिफारिश के लिए दिल्ली जल बोर्ड से लेकर दूसरे विभागों के कई अधिकारियों के यहां गुहार लगानी पड़ी। काफी कोशिशों के बाद किसी तरह सिफारिश लगा कर मरीज की सुनवाई हुई तो भी इलाज शुरू करने से पहले अस्पताल प्रशासन ने मुफ्त इलाज कराने के बाबत चिट्ठी लाने को कहा। अबकी बार अतिरिक्त स्वास्थ्य सचिव डॉ आरएन दास की ओर से एक सर्टिफिकेट देने के लिए कहा गया। इसके बाद भी मरीज का मुफ्त इलाज शुरू नहीं किया गया। मरीज के रिश्तेदार रमेश ने बताया कि किसी तरह रिश्तेदारों ने वह सर्टिफिकेट भी लाकर दे दिया। उसके बाद भी मरीज को इलाज के लिए 2.40 लाख का बिल थमा दिया गया, जिसमें 40 हजार मरीज ने किसी तरह जमा करा दिए। काफी दौड़-भाग करने और तमाम अधिकारियों से फोन कराने के बाद अब अस्पताल कह रहा है कि वर्तमान शुल्क पूरा जमा करा दीजिए। आगे के मुफ्त इलाज की स्वीकृति मिल गई है।

इतने पापड़ बेलने के बाद मरीज को जो सुविधा मुफ्त मिलती है वह यह है कि मरीज को अस्पताल के डॉक्टर का परामर्श शुल्क नहीं देना होगा, जो गरीब मरीजों के लिहाज से काफी मोटी रकम होती है। दूसरी मुफ्त सुविधा यह मिलती है कि मरीज को लेटने के लिए एक अदद बिस्तर मिल जाता है जिसका किराया उसे नहीं देना पड़ता। इसके अलावा हर चीज का पैसा लगता है जो पांचसितारा अस्पतालों के ऊंचे रसूख के हिसाब से तय है। जांच और दवाएं सभी बाजार दाम से कई गुना ज्यादा महंगी होती हैं। यहां दवाओं की कीमत और जांच शुल्क के मामले में अस्पताल का अपना कायदा-कानून चलता है। इस मामले में अस्पताल प्रशासन से बात करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं हो पाई।

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