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दिल्ली: फैसला खारिज होने के बाद भी बिजली पर राजनीति

बिजली वितरण करने वाली तीनों कंपनियों के खातों की कैग(सीएजी)से जांच करवाने के दिल्ली सरकार के फैसले को तीस अक्तूबर को हाई कोर्ट से खारिज होने के..

Author नई दिल्ली | November 4, 2015 12:19 AM

बिजली वितरण करने वाली तीनों कंपनियों के खातों की कैग(सीएजी)से जांच करवाने के दिल्ली सरकार के फैसले को तीस अक्तूबर को हाई कोर्ट से खारिज होने के बावजूद बिजली पर राजनीति होनी बंद नहीं हुई है। दिल्ली सरकार हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना है कि वे उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली देने के लिए वचनबद्ध हैं।

विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि मुकदमा ठीक से नहीं लड़ा गया। लेकिन अब सत्ता में बैठी आम आदमी पार्टी(आप) की ओर से बार-बार आरोप लगाया जाए कि राष्ट्रपति शासन में मुकदमे की ठीक से पैरवी न करके मुकदमे को कमजोर किया गया, अपने आप में अजीब है। हालात यही दिख रहे हैं कि इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप से सही मायने में आगे भी मुकदमा कमजोर ही होगा। समस्या यही है कि सीएजी आडिट के नाम पर आप ने उपभोक्ताओं को इतने ज्यादा सपने दिखा दिए थे कि उससे पीछा छुड़ाने के लिए उनको कोई और तरीका नहीं मिल रहा है।

अब तो यह भी खबर बेदम लगती है कि कैग ने अपनी शुरुआती जांच में यह पता लगा लिया था कि निजी कंपनियों ने अपना घाटा बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया है। करीब आठ हजार करोड़ की गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं। 2002 में बिजली के निजीकरण के पक्ष में खड़े लोगों का तर्क यही था कि इससे बिजली बेहतर होगी और हर साल विद्युत बोर्ड को डेढ़ हजार करोड़ रुपए की सहायता देने सरकार को छुटकारा मिलेगा। जिस तरह से आप ने चुनाव में वादा किया था कि वह सत्ता में आते ही निजीकरण पर श्वेत पत्र जारी करेगी, इसी तरह 1998 के चुनाव में कांग्रेस ने यही वायदा किया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की ओर से जारी श्वेत पत्र आने के समय दिल्ली में बिजली की मांग तीन हजार मेगावाट से भी कम थी, जबकि श्वेत पत्र में बताया गया कि बिजली चोरी(ए टी एंड लास)56 फीसद से ज्यादा है। यह भी बताया गया कि एक फीसद बिजली चोरी का मतलब है 90 करोड़ रुपए का नुकसान और इस नुकसान की भरपाई के लिए निजी कंपनियों को 3850 करोड़ रुपए की सबसिडी दी गई।

लगातार बिजली की मांग बढ़ने और उसके चलते प्रणाली(सिस्टम) को अप ग्रेड करने के नाम पर हजारों करोड़ रुपए निजी कंपनियां अपनी ही पूरक कंपनियों से करवाने का दावा करने लगी और डीईआरसी के पास कोई जांच का तंत्र न होने से उसका लाभ लेती रही। इसको 2008 के चुनाव से पहले तत्कालीन बिजली मंत्री अशोक कुमार वालिया ने इसके साथ-साथ बिजली खरीदने-बेचने के धंधे को भांप लिया और नकेल कसना शुरू कर दिया। उसका लाभ दिल्ली की जनता को और 2008 के चुनाव में कांग्रेस को मिला। उन्होंने ही निजी कंपनियों को कर्ज लेने के लिए गारंटी देने का विरोध किया था, जिसे अब आप की सरकार में मुद्दा बनाया गया। बिजली के निजीकरण में गड़बड़ी हुई यह आरोप केवल विपक्षी दलों ने तब नहीं लगाए थे। कांग्रेस की बहुमत वाली विधानसभा की लोक लेखा समिति(पीएसी) ने इसकी जांच सीबीआइ से करवाने की सिफारिश की थी। तब सीएजी से लेकर सीवीसी(केंद्रीय सतर्कता आयोग) ने निजीकरण में गड़बड़ी की बात मानी थी। तब से लेकर आप की सरकार आने तक के चुनावों में भी यह मुद्दा बना था। लेकिन सही मायने में उस मुद्दे का लाभ आप को मिला।

समस्या यह है कि आप ने बिजली पर लोगों को सपने ज्यादा दिखा दिए हैं। हर महीने 400 यूनिट तक उपयोग करने वालों को आधी दाम पर बिजली देने का फैसला अभी तो सबसिडी के जरिए हो रहा है सीएजी जांच के बाद दाम घटने पर बिना सबसिडी सस्ती बिजली दी जाएगी। बिजली के दाम बढ़ने नहीं दिया जाएगा। अब हाई कोर्ट के आदेश के बाद चाहे जो दावे किए जाएं, सरकार और आप के नेताओं की परेशानी बढ़ गई है। शीला दीक्षित सरकार भी सीएजी जांच के लिए अदालत गई लेकिन अदालत की अनुमति नहीं मिली। इस बात को आप के नेता गंभीरता से नहीं ले रहे थे। यह समझ से परे है कि अगर अदालत की अनुमति भी मिल जाए तो अरबों रुपए वाली कंपनी क्या लिखित में बड़ी चोरी करेगी जो सीएजी पकड़ ले। अब तो यह लगने लगा है कि सरकार ने अदालत में जाकर समय और पैसा दोनों बरबाद किया। उसके बजाए निजीकरण के समय(2002) के वित्त मंत्री मोहिंदर सिंह साथी के सुझाव पर अमल किया जाता कि उपभोक्ता को यह सुविधा दी जाए कि वह जिस कंपनी से चाहे उसकी सेवा ले, डीईआरसी को पूरी तरह से स्वायत्त और ताकतवर बनाया जाए और जनता की ओर से निजी कंपनियों पर निगरानी रखने के लिए दिल्ली के सबसे अच्छे चार्टर एकाउंटेंट(सीए) सरकार अपने खर्चे पर उपलब्ध करवाए।

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