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चीन से कड़वे रिश्ते का असर दिखा राखी के बाजार पर

भारत-चीन के बीच मचे हालिया डोकलाम विवाद का राखी के त्योहार पर सीधा असर देखने को मिल रहा है। इस बार चीनी राखी की आवक और स्थानीय बाजारों में इसकी मांग दोनों काफी हद तक नदारद दिखीं।

Author नई दिल्ली | August 7, 2017 4:35 AM
अपने भाई को राखी बांधती एक छोटी बच्ची।

रक्षाबंधन का त्योहार न केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है बल्कि यह आपसी भाईचारे और सौहार्द का भी संदेश देता है। दशकों पहले आए ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे के बंधन के तार तो काफी पहले ही चटक चुके हैं, लेकिन भारत-चीन के बीच मचे हालिया डोकलाम विवाद का राखी के त्योहार पर सीधा असर देखने को मिल रहा है। इस बार चीनी राखी की आवक और स्थानीय बाजारों में इसकी मांग दोनों काफी हद तक नदारद दिखीं।  मुझे चीनी राखी बिल्कुल पसंद नहींं, गुणवत्ता का मुद्दा तो है ही लेकिन यह भावनाओं का भी मुद्दा है, चीन हमारी अर्थव्यवस्था बिगाड़ रहा है।’ पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 के आचार्य निकेतन बाजार में अपने भाइयों के लिए खूबसूरत राखियां तलाश कर रही दमयंती ने चीनी राखी के सवाल पर अपनी भावनाएं कुछ ऐसे ही जाहिर कीं। वहीं पास में एक दूसरी दुकान पर अपनी पत्नी के भाई के लिए राखी पसंद कर रहे भरत ने कहा कि राखी ही क्यों, हमें खिलौने और रोजमर्रा के अन्य चीनी सामानों का भी बहिष्कार करना चाहिए। हमारे देश में इतनी श्रमशक्ति है कि सस्ते और अच्छे उत्पाद बना सकें फिर सस्ते सामानों के लिए चीन पर निर्भरता क्यों।

चीन के साथ भारत के तनावपूर्ण रिश्तों का असर राखियों के बाजार पर भी पड़ा है। दुकानदारों के मुताबिक, हर साल जहां 40 से 70 फीसद चीनी राखियां आती थीं, वो आज घटकर 10-20 फीसद रह गई हैं, उसमें भी ज्यादातर पिछले साल की राखियां हैं। आचार्य निकेतन में ही अपनी चादर और पर्दे की दुकान के आगे हर साल राखियां सजाने वाले राम प्रवेश का कहना है, ‘पीछे से माल ही नहीं आ रहा है। जो खिलौने और लाइट वाली राखियां मेरी दुकान में दिख रही हैं वो पिछले साल की हैं। ग्राहक चीनी माल खरीदने को तैयार ही नहीं हैं, नाम सुनते ही लेने से मना कर देते हैं’। इसी दुकान से राखी खरीद रही दमयंती ने कहा कि दुकानदारों को चीनी और गैर-चीनी मालों की असलियत बतानी चाहिए, क्योंकि कई लोग गलतफहमी में सस्ते चीनी सामान ले जाते हैं। चावला स्पोर्ट्स पर काम करने वाले राजू ने कहा कि हालांकि चीनी राखियां 10 से 20 रुपए में मिल जाती हैं, इसके बावजूद लोग इस बार भारतीय राखियों की मांग कर हैं जो अपेक्षाकृत महंगी होती हैं। उन्होंने कहा कि पिछले साल हमने 70 फीसद चीनी राखी रखी थी दुकान पर, लेकिन इस बार 15 फीसद ही हैं, वो भी सिर्फ कार्टून वाली। पहचान के सवाल पर राजू कहते हैं कि भारतीय राखियां ज्यादातर ब्रांड के नाम से बिकती हैं, जैसे श्री, वीरा और अन्य जबकि चीनी राखियों का कोई ब्रांड नहीं होता।हर साल ठेले पर राखी का बाजार सजाने वाले विनीत ने कहा कि वह सदर बाजार से राखियों का माल खरीदते हैं, लेकिन इस बार वहां चीनी राखियां मिलीं ही नहीं। फैशनेबल चीनी राखियों के दिन लद गए हैं। दुकानदारों की इन बातों को सही साबित करते हुए श्रावणी पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन से एक दिन पहले रविवार को बहनें अपने भाइयों के लिए देसी नगों, जरी, मोतियों, रूद्राक्षनुमा मोतियों और छोटे पत्थरों से सजी राखियों की खरीदारी करती दिखीं।

 

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